चलो दूर कहीं.. 19सुमी की चुप्पी प्रतीक्षा को खाए जा रहा था, प्रतीक्षा की सिसकियां रात के उस निरव वातावरण में प्रतिध्वनित होकर ऐसे गूंज रही थी मानो पुरी कायनात सिसक रही हो..। प्रतीक्षा रवि का एक झलक पाने के लिए व्याकुल थी..वह लगातार रोते हुए सुमी से रवि के बारे में पूछ रही थी, लेकिन सुमी की चेतना जैसे निष्ठुर हो गई थी , उसके बातों का उसपर कोई असर नहीं हो रहा था। वह दीवार पर टेक लगाए पथराई आंखों से फूस के छप्पर में बने सुराख को घूर रही थी..जैसे उसकी सारी आशाएं, उमंगें और खुशियां इस सुराख से ही उससे दूर भाग गए हो..उसकी दशा ऐसी थी जैसे उस पर बज्रपात हो गया हो..।
सहसा बाहर शेरु के जोर जोर से तेज आवाज में भौंकने से प्रतीक्षा की सिसकियां उस शोर में कहीं गुम हो गई थी.. शेरु के एकाएक भौंकने से उसके कान खड़े हो गए थे, उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर शेरु अचानक क्यों भौंक रहा है। उसमें इतनी शक्ति न बची थी कि वह बाहर जाकर देखे कि शेरु लगातार क्यों भौंक रहा है ? उसपर उसकी अकर्मण्यता हावी थी, उसने शेरु का बिना परवाह किए उसके कर्कश तेज आवाज के बीच सुमी को झकझोरते हुए कहा, " चुप क्यों हो सुमी बताओ न कहां है रवि..?" उस कच्चे घर के अंदर बुत बनी बैठी सुमी से प्रतीक्षा रवि के बारे में पूछती रही और बाहर शेरु अपनी पुरी ताकत से भौंकता रहा... और फिर वातावरण में एकाएक शांति छा गई... लगा जैसे कोई बहुत बड़ा तुफान थम गया हो। प्रतीक्षा अभी कुछ समझ पाती उससे पहले ही वहां एक तेज रोशनी फैली और अनाह का बेहद मधुर स्वर गूंजा, " इस बेचारी से क्यों पूछ रही हो प्रतीक्षा.. इस पर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है, तेरे कारण इसे अपने आशिक को खोना पड़ा..! बेचारा रवि.. बेमौत मारा गया। अब तुम्हीं बताओ ये बेचारी किससे इश्क लड़ाएगी.. किससे मीठी-मीठी बातें करेंगी ?"
"अनाह तुम यहां..?तुमने रवि को मार दिया मैं तुम्हें नहीं छोडूंगी..!" चीखते हुए प्रतीक्षा ने उसका गर्दन दबोचना चाहा तो वह उसके हाथ को पकड़ कर मरोड़ते हुए कहा," इन नाजुक हाथों को इतना तकलीफ क्यों दे रही हो मेरी जान..! रवि को मैंने नहीं तुमने मारा है.. क्या जरूरत थी उससे नैन मटकाने की.. उससे मीठी-मीठी बातें करने की ..? तुम्हें मालूम है उस हराम जादे ने जब तुम्हारे नाजूक बदन पर पड़े खरोंच में लेप लगा रहा था और तुम जिस प्रकार सिसकारी मार रही थी..उस वक्त जैसे मेरे तन बदन में आग लग गया था ! मैं उसी समय उसका टेंटुआ दबा देता..!" कहते कहते वह प्रतीक्षा के हाथ को इतना जोर से मरोड़ा कि वह दर्द से बिलबिलाते हुए बोली,"अनाह मेरा हाथ छोड़ो दर्द हो रहा है..! आखिर तुम चाहते क्या हो..? प्लीज़ मेरा पीछा छोड़ दो.. मुझे मेरे घर जाने दो..!"
अनाह ने कहा, " घर जाने की बड़ी बैचैनी है.. अकेले ही घर जाओगी? हमें भी ले चलो तो कुछ बात बने..!"
उसे मालूम था कि अनाह उसे इतनी आसानी से छोड़ने वाला नहीं है इसलिए उसने उसके बात को अनसुना करते हुए कहा," रवि कहां है अनाह..? "
" बहुत याराना है.. आ..हा .. कभी हमारे लिए भी इतनी तड़प होती तो क्या बात होती.. दिल बाग़ बाग़ हो जाता..मैं तो धन्य हो जाता..! कोई बात नहीं मैं इतना निर्दयी नहीं हूं कि तुम्हें तड़पाऊं.. लो ये रहा तुम्हारा रवि...! " कहकर वह एक विचित्र सी हंसी हंसा और उसने अपने माथे से निकलते लाइट को जमीन पर डाला तो उस प्रकाश के घेरे के अंदर रवि का शरीर शिथिल पड़ा था।
रवि को देखते ही प्रतीक्षा चीख पड़ी,", रवि.. क्या हुआ तुम्हें..? "और उसके ओर लपकी लेकिन प्रकाश के उस गोल घेरे को पार नहीं कर पाई.. वह लगातार चीखते हुए उस गोले को पार कर रवि के पास पहुंचने का प्रयास कर रही थी लेकिन हर बार उसका प्रयास विफल हो जाता और वह उस अदृश्य घेरे से टकराकर धड़ाम से जमीन पर गिर रही थी..!वह जितनी बार जमीन पर गिरती उतनी ही बार अनाह के चेहरे पर जहरीली मुस्कान तैर जाती..! जब वो थक हार कर चुपचाप बैठ गई तो उसे घूरते हुए उसने कहा,"रुक क्यों गई जारी रखो.. ये इश्क बड़ा ज़ालिम है अब किससे हो जाय कहना मुश्किल है..बड़ी बेमरौवत है रे तू इतनी तड़पाती है .. अगर इसका एक अंश भी मेरे लिए होता तो मैं तो निहाल हो जाता..! बैठ क्यों गई जारी रखो .. मैं भी तो देखूं कि तुम्हारा प्यार मेरे कवच को भेद पाता है या नहीं..?"
"तुम्हारे जैसा कमीना मैंने नहीं देखा.. आखिर तुम्हारा क्या बिगाड़ा था इसने..? " प्रतीक्षा ने लाल लाल आंखों से घूरते हुए कहा तो उसने बेहद भद्दी हंसी हंसते हुए कहा, "और मुझसे कमीना देखोगी भी नहीं.. इस कमीने ने मुझसे तुम्हें छीनने का प्रयास किया और इसकी सजा इसे मिलनी ही थी.. लेकिन तुम नाराज़ क्यों होती हो..? तुम्हारी ये रोनी सूरत मुझे पसंद नहीं.. एक बार मुस्कुरा दो..? " प्रतीक्षा ने उसे खा जाने वाली नेत्रों से घूरते हुए कहा,"तुम कभी किसी को खुश देख सकते हो..? कभी नहीं.. तुम्हारे जैसा ज़ालिम जो दुसरे को तकलीफ़ देकर खुश होता हो..वह कभी किसी को खुश नहीं देख सकता..! मैं तुम्हें भगवान समझती थी लेकिन तुम तो हैवान हो हैवान..!"प्रतीक्षा के तमतमाए चेहरे को देखते हुए अनाह ने बेहद ठंडे स्वर में कहा," इतना गुस्सा सेहत के लिए अच्छा नहीं होता.. चलो अब गुस्सा थूक कर एक बार मुस्कुरा दो तो मैं तुम्हें रवि से मिलने दुंगा और जिंदा भी कर दूंगा..!" इतना सुनते ही प्रतीक्षा के आंसूओं से भरे चेहरे खिल उठे और पपड़ी पड़े होंठों पर एक फिकी मुस्कान तैर गई..! अनाह उसे ध्यान से देख रहा था, उसने उसके होंठों पर तैरते मुस्कान को देखते ही कहा,"बहुत खूब.. मुझे पता था तुम रवि के लिए जरुर मुस्कुराओगी ..जाओ मिल लो अपने रवि से..!"
प्रतीक्षा को जैसे कोई सुध न थी,अनाह के बोलते ही वह बदहवास दौड़ पड़ी और इस बार बिना किसी बाधा के वह रवि के शिथिल पड़े शरीर से लिपट कर उसके चेहरे को अपने हाथों से सहलाते हुए फूट फूट कर रो रही थी, और बोल रही थी," तुम्हें क्या हुआ रवि..उठो रवि..उठो.. मुझे भी अपने साथ ले चलो.. तुम्हारे बिना मैं जिंदा नहीं रह सकती..!
उसके क्रंदन से पुरा वातावरण दहल रहा था लेकिन अनाह के चेहरे पर एक सिकन तक न थी.. प्रतीक्षा को रोता बिलखता देख उसे असीम आनंद की प्राप्ति हो रही थी..!
क्रमशः...