अयन धीरे-धीरे सोनाई की तरफ बढ़ा। उसकी आँखें अब भी गुस्से से जल रही थीं, लेकिन होंठों के किनारे हल्की सी मुस्कान खेल रही थी।
अयन : “वाह… अब तो मुँह लगाकर जवाब देना भी सीख गई हो।”
सोनाई थोड़ा पीछे हट गई। उसका गला सूख चुका था।
— “मैं… मैंने तो कुछ गलत नहीं कहा…”
अचानक अयन ने दोनों हाथ उसके पास दीवार पर रख दिए और उसे अपने बीच कैद कर लिया।
— “गलत नहीं कहा… लेकिन किसने परमिशन दी मुझसे इस तरह बहस करने की?”
सोनाई का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
— “आप… हमेशा मुझे डाँटते रहते हैं… इसलिए…”
अयन थोड़ा झुककर धीमी आवाज़ में बोला—
— “और तूने सोच लिया, इसलिए मुझे पलटकर जवाब देगी?”
कुछ पल चुप रहकर फिर बोला—
— “काफ़ी बड़ी हो गई हो, है ना?”
सोनाई ने नज़रें झुका लीं।
— “मैं अब छोटी नहीं हूँ…”
अयन हल्का सा मुस्कुराया। उसने उँगली से उसकी ठुड्डी उठाकर चेहरा ऊपर किया।
— “छोटी नहीं हो? तो मुझे इग्नोर करने का प्लान क्या था?”
सोनाई हैरान रह गई।
— “आपको कैसे पता चला?”
अयन उसकी आँखों में देखते हुए बोला—
— “तुझे समझे बिना मैंने इतने साल बिताए हैं क्या?”
कुछ देर दोनों चुप रहे। सिर्फ़ एक-दूसरे की साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
फिर अयन थोड़ा पीछे हटकर बोला—
— “और एक बात… ये साड़ी…”
सोनाई घबरा गई।
— “क्या हुआ?”
अयन ने धीरे से उसे देखा।
— “बहुत खूबसूरत लग रही हो… लेकिन…”
वो फिर उसके करीब आकर फुसफुसाया—
— “इस तरह सबको दिखाने के लिए नहीं।”
सोनाई का चेहरा पूरी तरह लाल हो गया।
— “मैं… मैंने जानबूझकर नहीं किया…”
अयन हल्का हँस पड़ा।
— “मुझे पता है… तू अभी इतनी smart नहीं हुई।”
फिर दरवाज़े की तरफ बढ़ते-बढ़ते रुक गया।
— “और हाँ… मुझे ignore करने का मिशन कैंसल कर दे।”
सोनाई ने हैरानी से पूछा—
— “क्यों?”
अयन पीछे मुड़कर आँख मारते हुए बोला—
— “क्योंकि… मैं इतनी आसानी से हार नहीं मानता।”
ये कहकर अयन जाने लगा, लेकिन अचानक कुछ सोचकर वापस आया। उसने झट से सोनाई के हाथ से फोन लिया, उसमें कुछ किया और वापस उसके हाथ में दे दिया।
फिर गंभीर नज़रों से उसकी तरफ देखते हुए सख्त आवाज़ में बोला—
— “अगर फिर कभी तेरा नंबर बदला… या मेरा नंबर डिलीट हुआ ना… तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।”
इतना कहकर वो तेज़ कदमों से बाहर निकल गया।
सोनाई उसकी जाती हुई पीठ को देखती रही और सूखे गले से धीरे से निगल गई।
इधर…
निशा वॉशरूम से बाहर आई, लेकिन सोनाई उसे कहीं दिखाई नहीं दी। वो घबराकर चारों तरफ उसे ढूँढने लगी।
निशा : “ये लड़की अकेले कहाँ चली गई? ऐसा तो कभी नहीं करती। मेरे हाथ-पैर ठंडे हो रहे हैं। अगर अयन भैया को पता चल गया कि सोनाई नहीं मिल रही, तो मेरी ज़िंदगी खत्म! ये लड़की एक दिन ना एक दिन मुझे मरवाकर ही छोड़ेगी।”
अचानक उसे अपनी गर्दन पर किसी का हाथ महसूस हुआ।
निशा डरकर उछल पड़ी।
— “हे भगवान!”
सोनाई हँसते हुए बोली—
— “अरे क्या हुआ? भूत देख लिया क्या?”
निशा ने लंबी साँस छोड़ी।
— “ओह! तू थी! मुझे लगा अभी सीधा स्वर्ग पहुँच गई।”
सोनाई : “क्या-क्या बोल रही है? पागल हो गई है क्या?”
निशा : “वो सब छोड़। तू थी कहाँ? पता है मैं कितना डर गई थी? बस थोड़ी देर और होती तो मेरा हार्ट हाथ में आ जाता।”
सोनाई थोड़ा रुककर क्यूट सा चेहरा बनाकर बोली—
— “सॉरी बाबू… गुस्सा मत हो। मुझे पता है तू मेरी बहुत केयर करती है। लेकिन मैं अब बच्ची नहीं हूँ, इतना मत डर।”
निशा ने शक भरी नज़रों से पूछा—
— “कहीं तू चोरी-छिपे प्यार-व्यार तो नहीं कर रही?”
सोनाई धीरे से बड़बड़ाई—
— “प्यार? मेरी लाइफ में लॉकडाउन लगाने वाला इंसान लंदन से वापस आ चुका है। प्यार तो दूर, पता नहीं अब मेरे आसपास कोई लड़का दिखेगा भी या नहीं।”
निशा : “अरे तब से क्या बड़बड़ा रही है? सीधे-सीधे जवाब दे।”
सोनाई : “धत्! पागल हो गई है क्या? मैं तो झिलिक के रूम में साड़ी ठीक करने गई थी। और सच कहूँ तो अब यहाँ एक मिनट भी अच्छा नहीं लग रहा। चल घर चलते हैं।”
निशा मन ही मन बुदबुदाई—
— “पागल तो नहीं हूँ… लेकिन तेरे चक्कर में जल्दी स्वर्ग ज़रूर पहुँच जाऊँगी।”
सोनाई : “क्या हुआ? कुछ बोल क्यों नहीं रही?”
निशा : “हाँ हाँ चल।”
फिर दोनों कॉलेज के बाहर से रिक्शा लेकर घर चली गईं।
दूसरी तरफ…
Sengupta Mansion
शहर की भीड़भाड़ से दूर, विशाल लोहे के गेट के पीछे खड़ी थी वो आलीशान हवेली। गेट खुलते ही दोनों तरफ कतार में लगे शाही पाम के पेड़ और हल्की रोशनी से जगमगाता रास्ता ऐसा लग रहा था जैसे किसी सपने की दुनिया में प्रवेश हो रहा हो।
सफेद मार्बल के चिकने रास्ते पर आगे बढ़ते ही नज़र पड़ी तीन मंज़िला विशाल महल पर—इटालियन आर्किटेक्चर से बना, हल्के क्रीम रंग की दीवारें और बड़ी-बड़ी काँच की खिड़कियाँ, जिन पर पड़ती रोशनी उसे और शानदार बना रही थी।
मुख्य द्वार के सामने बड़ा सा फव्वारा था, जिसमें नीली रोशनी में पानी की धाराएँ संगीत की ताल पर नाचती हुई लग रही थीं।
दरवाज़ा खुलते ही अंदर का नज़ारा और भी शानदार था। ऊँची छत से लटका विशाल क्रिस्टल चैंडेलियर पूरे हॉल को सुनहरी रोशनी से भर रहा था। इतालवी मार्बल का फ़र्श इतना चमकदार था कि उसमें साफ़ परछाईं दिखाई दे रही थी।
दाईं तरफ़ आलीशान ड्रॉइंग रूम—मुलायम वेलवेट सोफे, काँच की सेंटर टेबल और दीवारों पर महँगी पेंटिंग्स।
बाईं तरफ़ लाइब्रेरी—लकड़ी की अलमारियों में सजी सैकड़ों किताबें और एक आरामदायक आर्मचेयर, जैसे वहाँ समय थम गया हो।
पीछे की तरफ़ काँच से घिरा डाइनिंग एरिया था, जहाँ एक साथ दस-बारह लोग आराम से बैठ सकते थे। बाहर खूबसूरत गार्डन, रंग-बिरंगे फूल, छोटा कृत्रिम झील और उसके पास इनफिनिटी स्विमिंग पूल—जिसका पानी आसमान से मिलता हुआ लग रहा था।
ऊपर के हर बेडरूम किसी रॉयल सूट से कम नहीं थे—नरम रोशनी, बड़ा बिस्तर, प्राइवेट बालकनी और हर आधुनिक सुविधा। सबसे ऊपर ओपन टेरेस था, जहाँ से पूरी रात चमकता शहर अपना सा लगता था।
ये मैनशन सिर्फ़ एक घर नहीं था… ये एक सपना था, जहाँ हर कोने में शानो-शौकत और रहस्य छुपा था।
उसी समय अयन सेनगुप्ता की कार बड़े गेट से अंदर दाखिल हुई।
अयन की माँ, मोनिमाला देवी, आरती की थाली लेकर दरवाज़े पर खड़ी थीं। जैसे ही अयन कार से उतरा, उन्होंने उसकी आरती उतारी।
अयन ने तुरंत अपनी माँ को गले लगा लिया।
— “मॉम, इसकी क्या ज़रूरत थी? आपको देखते ही सब अच्छा लगने लगता है।”
मोनिमाला देवी हल्की शिकायत भरे स्वर में बोलीं—
— “अच्छा? इसी लिए चार साल अपनी माँ को अकेला छोड़कर लंदन में रहा? तब एक बार भी माँ की याद नहीं आई?”
अयन मुस्कुराकर उनकी आँखों से आँसू पोंछते हुए बोला—
— “मॉम… मैं इतने दिनों बाद घर आया हूँ और आप रो रही हो? पहले आँसू पोंछो और बताओ कैसी हो?”
मोनिमाला देवी प्यार से बोलीं—
— “मैं ठीक हूँ। तू बता, कितना दुबला हो गया है। अपना बिल्कुल ख्याल नहीं रखता।”
अयन हँस पड़ा।
— “दुनिया की हर माँ का एक ही डायलॉग होता है।”
फिर बच्चे जैसी आवाज़ में बोला—
— “मॉम, आज क्या बनाया है? मुझे बहुत भूख लगी है।”
मोनिमाला देवी हँस पड़ीं।
— “हाँ हाँ, पहले अंदर चल। फ्रेश हो जा। मैं खाना लगाती हूँ। और हाँ, तेरा कमरा बिल्कुल पहले जैसा तैयार करवा दिया है। अगर कुछ चाहिए हो तो बता देना।”
फिर वो अयन को अंदर लेकर चली गईं।
अंदर पूरे परिवार के लोग पहले से मौजूद थे।