तेरी चाहत में - 2 kalpoporir kalpojagat द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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तेरी चाहत में - 2

छोटेपन से ही अयन कुछ अलग था। सोनाई किसके साथ घूम रही है, किससे ज़्यादा बातें कर रही है, कौन उसके करीब आने की कोशिश कर रहा है—हर चीज़ पर अयन की अजीब सी नज़र रहती थी।

ये बात धीरे-धीरे सोनाई को घुटन देने लगी थी।

स्कूल में कोई लड़का तो दूर, कोई लड़की भी अगर सोनाई के ज़्यादा करीब आने की कोशिश करती, तो अयन किसी ना किसी तरह उसे दूर कर देता। वह कभी चिल्लाता नहीं था, कभी खुलकर झगड़ा भी नहीं करता था… लेकिन उसकी शांत, ठंडी और गंभीर आवाज़ ही लोगों को डराने के लिए काफी थी।

धीरे-धीरे सोनाई समझ गई थी कि अयन की मौजूदगी का मतलब है—बाकी सब लोगों का उससे दूरी बना लेना। इसी वजह से उसके कभी ज़्यादा दोस्त बन ही नहीं पाए। बाहर से सबको लगता था कि सोनाई बहुत शांत है, कम बोलती है, लोगों से घुलती-मिलती नहीं… लेकिन असल में वह अयन की परछाईं के अंदर खुद को समेटकर जी रही थी।

और अयन की सबसे डरावनी बात यही थी कि वह कभी गुस्से में चीखता नहीं था। बस शांत चेहरे के साथ दो शब्द बोलता… और सामने वाला खुद चुप हो जाता।

सोनाई को बचपन से उसी चीज़ से डर लगता था।

सिर्फ इन चार सालों में, जब अयन देश से बाहर था, तब जाकर किस्मत से उसे निशा जैसी एक सच्ची और पागल सी बेस्ट फ्रेंड मिली थी। इसलिए अब वह किसी भी हालत में निशा को खोना नहीं चाहती थी।

सोनाई निशा का हाथ पकड़कर ऑडिटोरियम की तरफ बढ़ते हुए मन ही मन सोच रही थी—

सोनाई : “(मन में) निशु मेरी इकलौती दोस्त है। मैं इसे खोना नहीं चाहती। यू आर अ ब्रेव गर्ल सोनाई… अयन दा से डरोगी तो नहीं चलेगा। अब तू बड़ी हो चुकी है। पता नहीं अयन दा कभी हँसते क्यों नहीं। कभी-कभी तो लगता है जैसे इनके हँसने पर भी सरकार टैक्स लेती हो।”

थोड़ा रुककर उसने फिर सोचा—

“तो अब क्या किया जाए? उस उल्लू चेहरे वाले इंसान के सामने तो बिल्कुल नहीं जाना। आज से ‘अयन इग्नोर मिशन’ शुरू। यू कैन डू इट सोनाई… यू कैन डू इट।”

ये सब सोचते हुए सोनाई ने एक लंबी साँस छोड़ी।

कॉलेज का रवीन्द्र जयंती कार्यक्रम खत्म होने के बाद भी ऑडिटोरियम अभी तक चहल-पहल से भरा हुआ था। मंच के पास अब भी धीमे स्वर में रवीन्द्र संगीत बज रहा था और चारों तरफ स्टूडेंट्स की हँसी-ठिठोली गूँज रही थी। कोई ग्रुप बनाकर फोटो खिंचवा रहा था, कोई गाना गा रहा था, तो कोई टीचर्स के साथ बातें करने में व्यस्त था।

सोनाई निशा का हाथ पकड़कर ऑडिटोरियम की तरफ बढ़ते हुए मन ही मन सोचने लगी—

सोनाई : “(मन में) निशु मेरी इकलौती दोस्त है। मैं इसे खोना नहीं चाहती। यू आर अ ब्रेव गर्ल सोनाई… अयन दा को देखकर डरोगी तो नहीं चलेगा। अब तू बड़ी हो चुकी है। पता नहीं अयन दा कभी हँसते क्यों नहीं। कभी-कभी तो लगता है जैसे इनके हँसने पर भी सरकार टैक्स लेती हो।”

थोड़ा रुककर उसने फिर सोचा—

“तो अब क्या किया जाए? उस उल्लू चेहरे वाले इंसान के सामने तो बिल्कुल नहीं जाना। आज से ‘अयन इग्नोर मिशन’ शुरू। यू कैन डू इट सोनाई… यू कैन डू इट।”

ये सब सोचते हुए सोनाई ने एक लंबी साँस छोड़ी।

फिर बैग कंधे पर डालते हुए बोली—

— “निशा, अब चल ना। घर जाने में बहुत देर हो जाएगी।”

निशा ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

— “ना ना ना… पहले वॉशरूम!”

— “तू ना सच में बहुत बड़ी परेशानी है।” सोनाई ने आँखें छोटी करके कहा, “अभी जाना ज़रूरी है क्या?”

निशा ने क्यूट सा चेहरा बनाकर कहा—

— “हाँ सोंटूमनू… बहुत ज़रूरी है।”

— “ये कैसा नाम है? बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा।”

— “अच्छा, तो क्यूट बेबी?”

— “निशा!”

निशा हँस पड़ी।

— “अच्छा अच्छा… गुस्सैल बिल्ली?”

अब सोनाई सच में चिढ़ गई।

— “तू पाँच सेकंड में अंदर नहीं गई ना, तो मैं चली जाऊँगी।”

निशा ने ड्रामे वाली एक्टिंग करते हुए सीने पर हाथ रखा।

— “ओह माय गॉड! इतनी बेरहम! अपनी बेस्ट फ्रेंड को ऐसे छोड़कर चली जाएगी? मैं तेरे लिए कितनी देर इंतज़ार करती हूँ पता है?”

— “हाँ, फिर भी बहुत शांति से चली जाऊँगी।”

— “झूठी! मेरे बिना तेरा पाँच मिनट भी नहीं कटता।”

सोनाई ने मुँह बनाकर दूसरी तरफ देखा।

— “सपने देख।”

निशा ने उसके गाल हल्के से दबाते हुए कहा—

— “उफ़्फ! हमारी सोनाई बेबी को आज इतना गुस्सा क्यों आ रहा है?”

सोनाई ने तुरंत उसका हाथ हटा दिया।

— “चुपचाप वॉशरूम में जा।”

निशा पीछे हटते हुए हँसकर बोली—

— “अच्छा जा रही हूँ जा रही हूँ। लेकिन मैं बाहर आने तक भाग मत जाना, पुछकू।”

— “मैं अभी—”

उसकी बात पूरी होने से पहले ही निशा दौड़कर वॉशरूम के अंदर चली गई और दरवाज़ा बंद कर लिया।

सोनाई चिढ़े हुए चेहरे के साथ बाहर खड़ी रही। पहले उसने फोन निकालकर टाइम देखा, फिर कॉरिडोर की तरफ देखकर लंबी साँस ली।

एक मिनट… दो मिनट…

सोनाई ने दरवाज़े पर नॉक किया।

— “निशा! तू अंदर घर बसाकर बैठी है क्या?”

अंदर से तुरंत आवाज़ आई—

— “नहीं रे क्यूटी, लिपस्टिक ठीक कर रही हूँ।”

— “क्या?! घर जा रही है या फिर से नया फंक्शन शुरू करेगी?”

— “सुंदर दिखना बहुत ज़रूरी है, समझी सोनाई बेबी।”

दो मिनट बाद फिर सोनाई ने दरवाज़ा खटखटाया।

— “निशा! और कितनी देर?”

अंदर से आवाज़ आई—

— “थोड़ा रुको क्यूटी!”

— “मैं तुझे मार डालूँगी।”

— “उफ़्फ! इतना गुस्सा करेगी तो बूढ़ी हो जाएगी। आज इतना मूड खराब क्यों है? बाकी दिनों तो तू मुझे ही रोककर रखती है। आज तू भी थोड़ा सहन कर ले, सोना।”

सोनाई दाँत भींचकर बोली—

— “पहले बाहर आ, फिर बताती हूँ।”

अंदर से फिर हँसी की आवाज़ आई।

— “अच्छा ठीक है… लेकिन जब तू गुस्सा नहीं करती ना, तब बहुत सुंदर लगती है पता है?”

सोनाई ने आँखें घुमाते हुए दीवार से टिककर खड़ी हो गई।

— “ड्रामा क्वीन कहीं की…”

सोनाई : “(मन में) नहीं नहीं, जितनी जल्दी हो सके निशु को लेकर कॉलेज से निकलना होगा। नहीं तो किसी ना किसी वक्त अयन दा से सामना हो जाएगा। और इस वक्त फँसने का मेरा बिल्कुल मन नहीं है।”

काफी देर से सोनाई वॉशरूम के बाहर खड़ी होकर निशा का इंतज़ार कर रही थी। तभी अचानक किसी ने पीछे से उसका हाथ पकड़कर उसे एक खाली कमरे के अंदर खींच लिया।

उस इंसान ने सोनाई को दीवार से सटा दिया। सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि डर के मारे सोनाई ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब खड़े थे। उनकी गर्म साँसें एक-दूसरे के चेहरे से टकरा रही थीं।

जब सामने वाला कुछ नहीं बोला, तब सोनाई ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।

आँखें खोलते ही वह चौंककर बोल उठी—

— “आ… आप! आपने मुझे ऐसे क्यों खींचा?”

अयन ने गुस्से भरी गंभीर आवाज़ में कहा—

— “वाह… लड़कों को अपने पीछे घुमाना अच्छे से सीख गई है तू। इन चार सालों में काफी तरक्की हुई है।”

[असल में अयन सोनाई को अपने साथ ले जाने आया था। लेकिन उसने देखा कि सोनाई वॉशरूम के बाहर खड़ी है और साड़ी ठीक से संभाल न पाने की वजह से उसकी कमर का कुछ हिस्सा साफ दिखाई दे रहा है। कुछ पल के लिए वह खुद भी उसे देखकर खो गया था। लेकिन अगले ही पल उसने देखा कि वहाँ से गुजरने वाले कुछ लड़के सोनाई की कमर की तरफ घूर रहे हैं। यह देखकर उसकी आँखें गुस्से से लाल हो गईं। वह किसी को भी अपनी मोहब्बत को इस तरह देखते हुए बर्दाश्त नहीं कर सकता था।]

अयन की डाँट से सोनाई डर गई। वह हकलाते हुए बोली—

— “आ… आप ये… ये क्या कह रहे हैं?”

फिर उसकी नज़र अयन की आँखों पर गई जो उसकी कमर की तरफ देख रही थीं। बात समझते ही सोनाई जल्दी-जल्दी अपनी साड़ी ठीक करने लगी। अयन भी उससे थोड़ा दूर हटकर खड़ा हो गया।

खुद को हिम्मत देने के लिए सोनाई मन ही मन सोचने लगी—

सोनाई : “(नहीं नहीं सोनाई… तुझे डरना नहीं है। तू जितना डरेगी, ये उल्लू चेहरे वाला इंसान उतना ही तुझे डराएगा।)”

फिर उसने डर और हिम्मत मिलाकर कहा—

— “मुझे साड़ी पहननी नहीं आती, इसलिए ऐसा हो गया। (थोड़ा ज़ोर देकर) और आपने भी तो अपनी शर्ट के ऊपर के बटन खोल रखे हैं। सारी लड़कियाँ भी तो आपको घूर रही थीं। मेरी बारी में ही सब गलत और आपकी बारी में कुछ नहीं? इसे कहते हैं — ‘आप करें तो रासलीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला।’ हुँह!”

सोनाई की बातें सुनकर अयन बड़ी-बड़ी आँखों से उसे देखने लगा।

और उधर सोनाई का चेहरा फिर डर से उतर गया। वह मन ही मन खुद को डाँटने लगी—

सोनाई : “थोड़ा कम बोलती तो मर नहीं जाती। बहादुरी दिखाने गई थी, लगता है ज़्यादा ही बोल गई। अब पता नहीं तेरे नसीब में क्या दुख लिखा है, सोनाई…”

(अब अयन सोनाई के साथ क्या करेगा?)

चलता रहेगा…