हमराज - 19 Gajendra Kudmate द्वारा क्राइम कहानी में हिंदी पीडीएफ

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हमराज - 19

ज़ेबा का मंसूबा बादल को पसंद आया और वह उसे अमली जामा पहनाने के लीये नीकल पड़े. तभी अम्मी ने आवाज लगाई," अरे बेटा थोडा सा सज संवर तो लो," कहते हुए अम्मी ने बादल के कंधे की पट्टी नीकाल कर फेंक दी फिर एक चाकू से उसके जीस्म पर कुछ घाव के नीशान बना दिये. इस तरह फिर ज़ेबा के जीस्म पर भी अम्मी ने उस ही तरह घाव के नीशान बनाये ताकी दुश्मनों को यह लगे की सच में वह सब उसके साथ हुआ था. फिर वह दोनों घर से नीकले और एकदुसरे की वीपरीत दिशा में नीकल पड़े. बादल छिपते छिपाते अपने साथीयों की तरफ बढ़ रहा था. उसे याद था के उनके दफ्तर के करीब एक नदी बहती है तो फिर बादल ने उस नदी को ही अपना रास्ता बना लीया था. वह नदी के पानी में गोता लगाकर तैरते हुये उस जगह के थोड़े करीब पहुँच गया था. वहाँ से उसने देखा की वहाँ चारों तरफ सीपाही तैनात है. बादल को पानी में अलग अलग तरीके से तैरने में महारत हासील थी तो फिर वह पानी के भीतर दाखील हुआ. वह फिर एकदम उल्टा होकर तैरते हये उस जगह के करीब जा पहुँचा. फिर यकायक वह एक लाश की तरह पानी की सतह पर बेजान होकर तैरने का नाटक करने लगा. उतनें में एक सीपाही की नजर उसपर पड़ी. उस सीपाही ने अपने साथीयों को बताया और फिर उसके साथी पानी में कुद पड़े, बाद में उन्होंने बादल को पानी से
नीकालकर अपने दफ्तर के अंदर लेकर गये.

   अब बादल को उसका मंसूबा कामीयाब होते दिखाई दे रहा था. वह एकदम शांत बेहोश की तरह पड़ा हुआ था. फिर उसके साथीयों ने उसे अस्पताल में ले जाकर डॉक्टर को दिखाया. तो डॉक्टर ने उसके हालात का जायजा लीया और उसे होश में लाने की कोशीश की. फिर बादल होश में आने का नाटक करने लगा. फिर जब उसके साथीयों ने उसके इस हालात के बारे में पूछा तो बादल ने वहीं बताया जो ज़ेबा ने उससे कहा था. फिर बादल को अस्पताल में ही रखने की सलाह डॉक्टर ने उसके साथीयों को दी. इसतरह बादल अपने साथीयों के बीच पहुँच गया था. अब बारी थी ज़ेबा की वह भी अपने शातीर दिमाग के दम पर उस जगह पहुँच गयी थी. उसने जाते जाते खुदको इतना लहूलुहान कर लीया था के उसके फ़रिश्ते को भी उसके ऊपर शक नहीं होगा. फिर वह उन दरींदों के छिपने की जगह के करीब पहुँच गयी. थोड़ी देर उसने वहाँ छिपकर हालात का जायजा लीया और फिर एकदम से वह लड़खड़ाते हुये भागती हुयी दरींदों के ठिकाने पर पहुँच गयी. उसे देखकर उन दहशतगरदों ने उसपर बंदूक तान दी और उससे सवाल करने लगे. लेकिन ज़ेबा भी इतनी चालाक और शातीर थी के वह उनके सामने गीर पड़ी और बेहोश हो गयी. फिर उन दहशतगर्दोंने उसे उठाया और अंदर लेकर गये. अंदर जाने के बाद उसके चेहरे पर पानी मारकर उसे जगाने की कोशीश करने लगे. थोड़ी देर यूँ ही बेहोश पड़ी रहने के बाद ज़ेबा ने होश में आने का नाटक किया और वह होश में आगयी. 

    फिर दहशतगर्दों ने उससे पूछा, " कौन है तू और यहाँ क्यों आयी है." तब ज़ेबा बोली, " मै आपकी ही एक साथी हूँ और एक मकसद को पूरा करने के लीये अपने आका के साथ गयी थी." फिर ज़ेबा ने उस शख्स और उस दिन जो कुछ भी हुआ वह।सब उन लोगों को बता दिया. फिर उन दहशतगर्दों का सरगना बोला, " कमीनी तू हमारे भाईजान के साथ वहाँ गयी थी. उस जगह गोलीबारी में हमारे भाईजान का इंतकाल हो गया और तू कैसे बच गयी." फिर ज़ेबा ने उनकी हमदर्दी और उनका विश्वास हासिल करने के लीये उन्हें झूठी कहानी सुनाई और बादल के उस अफसर को बेईमान और धोखेबाज बताया. उसने बताया के कैसे उस धोखेबाज ने उसके आका को धोखे से वहाँ दावत के नाम पर बुलाया और फिर अपने सीपहियों को बुलाकर निहत्ये हमारे आका को मौत के घाट उतार दिया. ज़ेबा अपनी कहानी को इस तरह मीर्च मसाला लगाकर बताई के दहशतगर्दों का सरगना इंतकाम की आग में जलने को मजबूर हुआ. उसके बाद जो कहानी उसने गड़ी थी और बादल ने भी कही थी. वहीं कहानी फिर उसने उस
सरगना को भी सुनाई साथ में उसने यह भी बताया के किस तरह वह यह राज की बात उसे कहने के लीये अपने जान की बाजी लगाकर आयी है.

    ज़ेबा ने अपने मंसूबे का एक पड़ाव पार किया था और अब उसे ऐसे कई पड़ाव पार करने थे. सारे सवाल जवाब होने के बाद दहशतगर्दों के सरगना ने ज़ेबा को अंदर कमरे में लेजाकर उसके सारे कपडे उतारने को कहा. ज़ेबा को इस बात का इल्म पहले से ही था और वह इस बात के लीये पुरे तन मन से तैयार थी. उसने अपने सारे कपडे उतार दिए और वह एकदम नग्न होकर उनके सामने खड़ी हो गयी. ज़ेबा इससे पहले जीन दहशतगर्दों के साथ रहती थी उन सभी ने ज़ेबा को बारी बारी से नग्र किया और उसके जीस्म को नोचा था. लेकिन यह दहशतगर्द उसके लीये नये थे और ज़ेबा भी उनके लीये एकदम ताजातरीन जीस्म थी. ज़ेबा का वह तराशा हुआ संगमरवर का जीस्म उन सभी की ऑँखों में तैर रहा था. उसे देखकर उन सभी के हवस की आग भड़कने लगी थी. वहाँ मौजूद सभी के हाथ उस जीस्म को छूने को बेचैन थे और सबके मुंह से लार टपक रही थी. ज़ेबा सबके चेहरे और उनके दिल में भड़की हुई आग बराबर से महसूस कर रही थी. तभी उनके सरगना ने ज़ेबा के जीस्म का पहले अपने हातों से और फिर एक मशीन की सहायता से जायजा लीया. फिर पूरी तरह तसल्ली होने के बाद ज़ेबा को कपडे पहनने को कहा. फिर ज़ेबा ने अपने कपड़े पहने और वह उनके साथ रहने में कामीयाब हो गयी. ज़ेबा को पता था के वह दहशतगर्द उसपर इतने आसानी से भरोसा नहीं करेंगे. वह उसके जीस्म का भी जायजा लेंगे के कही ज़ेबा किसी दुश्मन की भेजी हुई अय्यार तो नहीं. या पुलीस की भेजी हुई कोई खबरी तो नहीं. या दुश्मन ने उसके जीस्म में कोई ट्रांसमीटर तो फिट कर के भेजा है. ज़ेबा ने अपने तजुर्बे से और एक पड़ाव पार कर लीया था और धीरे से अपने मंसूबे के करीब अपना कदम बढ़ाया था. 

     शेष अगले भाग में ..... १९