ईश्वर से मित्रता GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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ईश्वर से मित्रता

ऋगुवेद सूक्ति-- (२४) की व्याख्या “अघृणे न ते सख्याय पह्युवे” — ऋगुवेद _१/१३८/४भावार्थ --हे प्रभु ! मैं ‌तेरी मित्रता से इन्कार नहीं ‌करता।पदच्छेद-- अघृणे — हे प्रकाशस्वरूप, दयालु (अग्नि/ईश्वर के लिए संबोधन)न — नहींते — तेरीसख्याय — मित्रता के लिएपह्युवे (अपह्नुये) — इन्कार करता हूँ / अस्वीकार करता हूँभावार्थ--हे प्रकाशमय प्रभु! मैं तेरी मित्रता से इन्कार नहीं करता।अर्थात् — मैं तेरे स्नेह, संरक्षण और मार्गदर्शन को स्वीकार करता हूँ। मैं तुझसे दूर नहीं होना चाहता, बल्कि तेरे साथ मैत्रीभाव बनाए रखना चाहता हूँ।आध्यात्मिक संकेत--वेदों में “सख्य” (मित्रता) का अर्थ केवल सांसारिक मित्रता नहीं, बल्कि—ईश्वर के साथ आत्मीय सम्बन्धउसके नियमों को स्वीकार करनाउसके प्रकाश में चलना अपने अहंकार का त्याग करनायह मन्त्र साधक की विनम्र प्रार्थना है कि वह ईश्वर से विमुख न हो, बल्कि उसके प्रकाश में स्थिर रहे।अन्य वेदों में प्रमाण-- १. यजुर्वेद--(अ) “मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्” (यजुर्वेद 36/18)भावार्थ:सब प्राणी मुझे मित्र की दृष्टि से देखें और मैं सबको मित्रभाव से देखूँ। यहाँ “मित्र-दृष्टि” का अर्थ है — सार्वभौमिक मैत्री, जो ईश्वर-संबंध का विस्तार है।२. सामवेद--सामवेद में ऋग्वैदिक मन्त्रों का ही गायन है।एक मन्त्र में आता है —“सखा सखिभ्य ईड्यः” (सामवेद 373 के समीप पाठ)भावार्थ:वह (ईश्वर/अग्नि) अपने भक्तों का सखा (मित्र) है, स्तुति के योग्य है। यहाँ ईश्वर को प्रत्यक्ष “सखा” कहा गया है।३. अथर्ववेद --“सखा सख्ये नय” अथर्ववेद-- 3/30 भावार्थ:हे प्रभु! हमें सखा की भाँति सही मार्ग पर ले चल। यहाँ ईश्वर को मार्गदर्शक मित्र माना गया है।समग्र वैदिक दृष्टि--वेदों में ईश्वर केवल दण्डदाता नहीं, बल्कि सखा (मित्र), सुहृद् (हितैषी) ,मार्गदर्शक औरप्रकाशदाता के रूप में आया है।इस प्रकार “तेरी मित्रता से इन्कार नहीं करता” — यह भाव सम्पूर्ण वैदिक साहित्य में व्याप्त है।उपनिषदों में प्रमाण-- --१. श्वेताश्वतर उपनिषद--४.६-७ द्वा सुपर्णा सयुजा सखायासमानं वृक्षं परिषस्वजाते।भावार्थ:दो सुंदर पक्षी, जो घनिष्ठ सखा हैं, एक ही वृक्ष (शरीर) पर साथ-साथ रहते हैं। यहाँ “सखाया” शब्द स्पष्ट करता है कि जीव और परमात्मा का सम्बन्ध सखा जैसा आत्मीय है। परमात्मा कभी त्यागता नहीं; जीव जब उसकी ओर देखता है, तब शोक से मुक्त हो जाता है।२-बृहदारण्यक उपनिषद -१.३.२८ असतो मा सद्गमय।तमसो मा ज्योतिर्गमय।मृत्योर्मा अमृतं गमय॥भावार्थ:हे प्रभु! मुझे असत्य से सत्य की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर ले चल। यह प्रार्थना उसी सखा-भाव की अभिव्यक्ति है— जैसे मित्र मार्ग दिखाता है, वैसे ही परमात्मा को सम्बोधित किया गया है।३. कठ उपनिषद-१.२.२३यमेवैष वृणुते तेन लभ्यःतस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।भावार्थ:जिसे यह (परमात्मा) स्वयं स्वीकार करता है, उसी को वह प्राप्त होता है; और उसी पर अपना स्वरूप प्रकट करता है। यहाँ परमात्मा को कृपालु, आत्मीय एवं अनुग्रही मित्र के रूप में दिखाया गया है।४- मुण्डक उपनिषद -३.१.१(श्वेताश्वतर के समान ही “द्वा सुपर्णा” मन्त्र)यहाँ भी जीव-परमात्मा के सख्यभाव का वही चित्र मिलता है।उपनिषदों का निष्कर्ष--उपनिषद बताते हैं कि—परमात्मा दूर नहीं, अन्तःस्थित सखा है।वह दण्डदाता से अधिक प्रकाशदाता और मार्गदर्शक मित्र है।जब जीव उसकी ओर मुड़ता है, तो शोक और भय से मुक्त होता है।अतः ऋग्वैदिक भाव — “तेरी मित्रता से इन्कार नहीं करता” — उपनिषदों में और भी गहराई से प्रतिपादित है। अन्य उपनिषदों में प्रमाण-- १. ईश उपनिषद-६-७“यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥”भावार्थ:जो पुरुष सब भूतों को अपने आत्मा में और अपने आत्मा को सब भूतों में देखता है, वह किसी से द्वेष नहीं करता। जब सबमें एक ही आत्मा का दर्शन होता है, तब सार्वभौमिक मैत्री उत्पन्न होती है — यही सख्यभाव का उच्चतम रूप है।२. छान्दोग्य उपनिषद -६.८.७“तत्त्वमसि श्वेतकेतो।”भावार्थ:हे श्वेतकेतु! तू वही (ब्रह्म) है। यहाँ गुरु जीव को उसके परम आत्मीय स्वरूप से जोड़ता है। यह भेद-निवृत्ति का उपदेश है, जहाँ परमात्मा और जीव में विरोध नहीं, अपितु आत्मीय एकत्व है।३. तैत्तिरीय उपनिषद् -२.७“रसो वै सः।रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।”भावार्थ:वह (ब्रह्म) रसस्वरूप है; उसे प्राप्त कर मनुष्य आनन्दित होता है। मित्रता का सार आनन्द और आत्मीयता है। ब्रह्म को “रस” और “आनन्द” कहा गया— यह दण्ड नहीं, बल्कि स्नेहपूर्ण निकटता कास्वरूप है। ४-मैत्री उपनिषद-६.३०एको देवः सर्वभूतेषु गूढःसर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासःसाक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥”भावार्थ--एक ही परम देव सब प्राणियों में गुप्त रूप से स्थित है। वह सर्वव्यापी, सबका अन्तरात्मा, कर्मों का अध्यक्ष, सबका आधार, साक्षी, चेतनस्वरूप और निर्गुण है। यहाँ परमात्मा को सबके हृदय में स्थित अन्तर्यामी कहा गया है — जो निकटतम आत्म-सखा के समान है।५-प्रश्न उपनिषद ,-६.३षष्ठ प्रश्न में पिप्पलाद ऋषि ब्रह्मविद्या का उपदेश देते हैं।“स प्राणमसृजत।प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर् ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनः। अन्नाद् वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोकाः नाम च॥भावार्थ--यहाँ आत्मा को हृदय में स्थित, सर्वप्रिय और साक्षी कहा गया है।भावार्थ: परमात्मा मनुष्य के अत्यन्त समीप, अन्तरंग सखा की भाँति हृदय में स्थित है। सम्पूर्ण उपनिषद्-दृष्टि-+उपनिषदों में परमात्मा—अन्तर्यामी सखा, प्रियतम आत्मस्वरूप, आनन्दघन,सर्वभूत मित्र के रूप में प्रतिपादित है।पुराणों से प्रमाण—१. भागवत महापुराण-(क) १०.१४.५५“भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।”(संदर्भ: भगवान का भक्त–सख्यभाव)भावार्थ:भगवान अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होते हैं— जहाँ वह भक्त का अपना, आत्मीय सखा बन जाते हैं।वेदोक्त ईश्वर–सख्य/सुहृद्-भाव का प्रतिपादन अनेक पुराणों में स्पष्ट श्लोकों सहित मिलता है। नीचे प्रमुख प्रमाण अर्थ सहित प्रस्तुत हैं—१-भागवत महापुराण--(ख)१०.१४.८तत्तेऽनुकम्पां सु-समीक्षमाणोभुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्।हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्तेजीवेत् यो मुक्तिपदे स दायभाक्॥भावार्थ:जो व्यक्ति अपने कर्मों के फल को आपकी कृपा समझकर सहता है और हृदय, वाणी तथा शरीर से आपको नमस्कार करता रहता है, वह आपके मुक्तिपद का अधिकारी बनता है। यहाँ भगवान को करुणामय, हितकारी सखा के रूप में स्वीकार किया गया है।२. विष्णु पुराण -३.७.१४“यः सर्वभूतानां सुहृदेक एव।”भावार्थ:वह (भगवान विष्णु) समस्त प्राणियों का एकमात्र सच्चा सुहृद् (हितैषी मित्र) है।३.शिव पुराण-- “भक्तवत्सलः शम्भुः शरणागतवत्सलः।”भावार्थ:भगवान शम्भु भक्तों से स्नेह करने वाले और शरणागतों पर कृपा करने वाले हैं।४- पद्म पुराण - (उत्तरखण्ड)“स्मर्तव्यः सततं विष्णुः विस्मर्तव्यो न जातुचित्।”भावार्थ:विष्णु का सदा स्मरण करना चाहिए, उन्हें कभी नहीं भूलना चाहिए। निरन्तर स्मरण का आधार भय नहीं, बल्कि आत्मीय मैत्री है।५- स्कंद पुराण --“सकृदपि स्मृतो देवः सर्वदुःखं व्यपोहति।”भावार्थ:भगवान का एक बार भी स्मरण करने से वह सब दुःख दूर कर देते हैं।यह मित्रवत् करुणा और संरक्षण का द्योतक है।निष्कर्ष--पुराणों में भगवान—सुहृद् (सच्चा हितैषी)भक्तवत्सल, शरणागत-रक्षककरुणामय सखा के रूप में वर्णित हैं।भगवत् गीता में प्रमाण-- भगवत् गीता में भगवान स्वयं को भक्त का सखा, सुहृद् और प्रिय बताते हैं।१. अध्याय 4, श्लोक 3“स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥”भावार्थ:तू मेरा भक्त और सखा है; इसलिए मैं यह उत्तम रहस्य तुझे कह रहा हूँ। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को स्पष्ट रूप से “सखा” कहते हैं। यह ईश्वर–मित्रता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।२. अध्याय 5, श्लोक 29“भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥”भावार्थ:मुझे यज्ञ-तप का भोक्ता, समस्त लोकों का ईश्वर और सभी प्राणियों का सुहृद् (हितैषी मित्र) जानकर मनुष्य शान्ति प्राप्त करता है। यहाँ भगवान स्वयं को “सुहृदं सर्वभूतानाम्” कहते हैं — अर्थात् सबका सच्चा मित्र।३. अध्याय 9, श्लोक 18“गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।”भावार्थ:मैं ही गति, पालनकर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण और सुहृद् (मित्र) हूँ। ईश्वर केवल शासक नहीं, बल्कि शरणदाता और मित्र भी है।४. अध्याय 18, श्लोक 64“सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः।इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥”भावार्थ:तू मुझे अत्यन्त प्रिय है; इसलिए मैं तेरे हित की बात कहूँगा। यहाँ भगवान अर्जुन को “प्रिय” कहकर आत्मीय स्नेह व्यक्त करते हैं यही सख्यभाव की पराकाष्ठा है।महाभारत में प्रमाण--१. उद्योगपर्व (कृष्ण–अर्जुन सख्य)उद्योगपर्व में श्रीकृष्ण को अर्जुन का अत्यन्त प्रिय सखा कहा गया है।भावार्थ: कृष्ण और अर्जुन का संबंध केवल राजा–सारथी का नहीं, बल्कि आत्मीय मित्रों का है, जो धर्मस्थापन के लिए साथ खड़े हैं।२. भीष्मपर्व (गीता-प्रसंग)भीष्मपर्व में ही भगवत गीता का उपदेश है, जहाँ कृष्ण अर्जुन को “सखा” कहते हैं (4.3)।यह दर्शाता है कि महाभारत के मूल कथानक में भी ईश्वर–सख्यभाव केंद्रीय है।३. शान्तिपर्व (नारायणीय उपाख्यान)शान्तिपर्व में कहा गया है कि भगवान नारायण भक्तों के सुहृद् और रक्षक हैं।भावार्थ: जो श्रद्धा से उनकी शरण लेते हैं, वे उनके हितैषी मित्र बनकर रक्षा करते हैं।४. वनपर्व (द्रौपदी-रक्षा प्रसंग)वनपर्व में संकट की घड़ी में द्रौपदी श्रीकृष्ण को पुकारती है।भावार्थ: भगवान सच्चे मित्र की भाँति संकट में सहायता करते हैं; वे शरणागत का त्याग नहीं करते।५. कर्णपर्व (अर्जुन का संबोधन)युद्ध के समय अर्जुन बार-बार कृष्ण को अपने सखा और मार्गदर्शक रूप में स्वीकार करता है।यह दर्शाता है कि वीरता का आधार भी ईश्वर-मित्रता में है।महाभारत का निष्कर्ष--महाभारत में भगवान—सखा (मित्र), सुहृद् (हितैषी)शरणदाता धर्ममार्ग के मार्गदर्शकरूप में चित्रित हैं।स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण--१-(क) मनुस्मृति -४.१३८सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥अर्थ: सत्य बोलो, प्रिय बोलो; अप्रिय सत्य न बोलो; और प्रिय बोलने के लिए असत्य भी न बोलो—यह सनातन धर्म है। धर्म का यह रूप लोक-हितकारी है; वही हितकारी मार्ग सच्चे मित्र की भाँति कल्याण करता है।(ख) मनुस्मृति -- ८.१५धर्मो रक्षति रक्षितो धर्मो हन्ति हतः।तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥अर्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है; जो धर्म का नाश करता है, धर्म उसका नाश करता है। इसलिए धर्म का नाश न करो। धर्म-आश्रय रक्षक है—हितैषी सुहृद् के समान।३-(क) याज्ञवल्क्य स्मृति- १.१२२वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्॥अर्थ: वेद, स्मृति, सज्जनों का आचरण और अपने आत्मा को प्रिय (अहिंसक/शुभ) आचरण—ये चार धर्म के लक्षण हैं। धर्म का मापदण्ड लोक-कल्याण और अन्तःकरण-शुद्धि है।(ख) याज्ञवल्क्य स्मृति -३.३१३ अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः॥अर्थ: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच और इन्द्रियनिग्रह—यह संक्षेप में धर्म है। ये गुण सार्वभौमिक हित के आधार हैं।(४) पराशर स्मृति -१.२४ कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः।द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्॥अर्थ: सत्ययुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ, द्वापर में पूजा से जो फल मिलता है, कलियुग में वही हरि-कीर्तन से मिलता है। कलियुग में स्मरण-भक्ति को सुलभ, हितकारी आश्रय बताया गया है।(५) नारद स्मृति --१.२–३धर्मशास्त्रं तु विज्ञेयं न्यायशास्त्रसमन्वितम्।अर्थ: धर्मशास्त्र न्याय के साथ समझा जाना चाहिए। न्याय-आधारित धर्म लोक-हित और संरक्षण का साधन है।साराश--स्मृतियाँ सिखाती हैं कि—धर्म रक्षक है (मनु 8.15)।सत्य, अहिंसा, शौच, इन्द्रियनिग्रह धर्म के आधार हैं (याज्ञवल्क्य 3.313)।नीति-ग्रन्थों में प्रमाण—१. हितोपदेश_“सज्जनानां हृदयं नवनीतसमम्।”भावार्थ: सज्जनों का हृदय नवनीत (मक्खन) के समान कोमल होता है। सच्चा मित्र वही है जो हितचिन्तक और करुणामय हो— ईश्वर को भी वेदों में ऐसा ही सुहृद् कहा गया है।२. पंचतंत्र (मित्रलाभ)-“आपत्सु मित्रं ज्ञायते।”भावार्थ: विपत्ति में ही मित्र की पहचान होती है। परमात्मा को भी शास्त्र संकट में साथ देने वाला सखा बताते हैं; यह नीति-सिद्धान्त उसी सत्य को व्यावहारिक रूप देता है।३.  चाणक्य नीति-- “परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।वर्जयेत् तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥”भावार्थ: जो सामने मधुर बोले और पीछे हानि करे, ऐसे मित्र को त्याग देना चाहिए। सच्चा मित्र कपटहीन होता है— ईश्वर का सख्यभाव भी निष्कपट और कल्याणकारी है।४-भृतुहरि नीति शतक“संतः स्वयं परहिते विहिताभियोगाः।”भावार्थ: सज्जन स्वयं ही दूसरों के हित में लगे रहते हैं। ‘परहित’ का यह आदर्श वेद के सुहृद् (हितैषी) ईश्वर की झलक देता है।निष्कर्ष-नीति-ग्रन्थ बताते हैं कि—सच्चा मित्र हितैषी होता हैविपत्ति में साथ देता हैकपट से रहित होता है। योग वाशिष्ठ में प्रमाण --नीचे योग वशिष्ठ से ईश्वर/आत्मा के हितैषी-मित्र (सुहृद्) स्वरूप का प्रतिपादन करने वाले प्रमुख श्लोक  अर्थ सहित दिए जा रहे हैं(१) आत्मा ही सच्चा मित्र“आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।”(निर्वाणप्रकरण, पूर्वार्ध —अर्थ: मनुष्य का आत्मा ही उसका मित्र है और वही (अविवेक से) शत्रु भी बन जाता है। जब चित्त शुद्ध और विवेकी होता है, वही अन्तःस्थित आत्मा परम हितकारी सखा का अनुभव कराता है।(२) ब्रह्म सर्वान्तर्यामी सुहृद्“एको ब्रह्म परं शान्तं सर्वभूतान्तरात्मकम्।नित्यं सुहृद् सर्वभूतानां तस्मै नमो नमः॥”(उपशमप्रकरण)अर्थ: एक ही परम, शान्त ब्रह्म सब प्राणियों का अन्तरात्मा है; वह सबका नित्य सुहृद् है—उसे बार-बार नमस्कार। यहाँ ब्रह्म को स्पष्ट रूप से सर्वभूत-सुहृद् कहा गया है।वाल्मीकि और अध्यात्म रामायण में ‌प्रमाण-- Valmiki Ramayana में भगवान् के साथ सखा-भाव / आत्मीय सम्बन्ध के प्रमाण1. निषादराज गुह के प्रति श्रीराम का सखा-भाव--“समः सखा मे त्वं नित्यं…”— अयोध्याकाण्ड 50.27भावार्थ — “तुम मेरे लिए सदा समान प्रिय मित्र हो।”2. सुग्रीव से मैत्री--“उपकारफलं मित्रम्…”— किष्किन्धाकाण्ड 5.17भावार्थ — “सच्चा मित्र वही है जो उपकार और प्रेम निभाए।”3. श्रीराम का सुग्रीव को आश्वासन--“सखा धर्मेण संयुक्तः…”— किष्किन्धाकाण्ड 8.12भावार्थ — “हे सखा! धर्म से जुड़ी मित्रता कभी नष्ट नहीं होती।”4. विभीषण को अपनाना--“मित्रभावेन सम्प्राप्तं न त्यजेयं कथंचन”— युद्धकाण्ड 18.33भावार्थ — “जो मित्रभाव से मेरे पास आए, मैं उसे कभी नहीं त्यागता।”5. हनुमान के प्रति आत्मीयता--“नानृग्वेदविनीतस्य…”— किष्किन्धाकाण्ड 3.28–29भावार्थ — श्रीराम हनुमान की वाणी सुनकर उन्हें अत्यन्त प्रिय और योग्य सखा मानते हैं।Adhyatma Ramayana में ईश्वर-भक्ति और सखा-भाव के प्रमाण1. भगवान् का भक्त से सखा-भाव--“भक्तो मे सखा चेति…”— अरण्यकाण्ड 14.12भावार्थ — “मेरा भक्त मेरा सखा भी है।”2. विभीषण शरणागति--“सकृदेव प्रपन्नाय…”— युद्धकाण्ड 3.40भावार्थ — “जो एक बार भी मेरी शरण आता है, उसे मैं अभय देता हूँ।”3. श्रीराम का भक्त-प्रेम-“मद्भक्ता यत्र गायन्ति…”— उत्तरकाण्ड 7.45भावार्थ — “जहाँ मेरे भक्त प्रेम से मेरा गुणगान करते हैं, मैं वहाँ निवास करता हूँ।”4. हनुमान के प्रति प्रेम-“त्वं मम प्रियभक्तश्च…”— सुन्दरकाण्ड 15.18भावार्थ — “तुम मेरे प्रिय भक्त और आत्मीय हो।”5. भक्त और भगवान् का अभेद प्रेम--“भक्तप्रियः सदा रामः…”— उत्तरकाण्ड 3.22भावार्थ — “राम सदा अपने भक्तों से प्रेम करने वाले हैं।”इन सभी प्रमाणों में भगवान् और भक्त के बीच केवल दास्य-भाव ही नहीं, बल्कि मित्रता, आत्मीयता और प्रेमपूर्ण निकटता भी व्यक्त होती है, जो दिए हुए वैदिक भाव — “मैं तेरी मित्रता से इन्कार नहीं करता” — के समान आध्यात्मिक भावना को प्रकट करता है।इस्लाम धर्म में प्रमाण --Quran और इस्लामी परम्परा में अल्लाह के साथ मित्रता / निकटता (विलायत, महब्बत) के प्रमाण--1. अल्लाह ईमान वालों का मित्र है।ٱللَّهُ وَلِىُّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟— सूरह अल-बक़रह 2:257भावार्थ — “अल्लाह ईमान वालों का मित्र/संरक्षक है।”2. अल्लाह अपने बन्दों के निकट है।وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِى عَنِّى فَإِنِّى قَرِيبٌ— सूरह अल-बक़रह 2:186भावार्थ — “जब मेरे बन्दे मेरे विषय में पूछें, तो मैं निकट हूँ।”3. अल्लाह प्रेम करने वालों से प्रेम करता है।إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُحْسِنِينَ— सूरह अल-बक़रह 2:195भावार्थ — “निस्संदेह अल्लाह सदाचारियों से प्रेम करता है।”4. इब्राहीम अल्लाह के मित्र कहलाए।्وَٱتَّخَذَ ٱللَّهُ إِبْرَٰهِيمَ خَلِيلًا— सूरह अन्-निसा 4:125भावार्थ — “अल्लाह ने इब्राहीम को अपना घनिष्ठ मित्र बनाया।”यहाँ “خَلِيل” (खलील) का अर्थ अत्यन्त निकट मित्र है।5. अल्लाह अपने भक्तों से प्रसन्न होता है।رَّضِىَ ٱللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا۟ عَنْهُ— सूरह अल-माइदह 5:119भावार्थ — “अल्लाह उनसे प्रसन्न हुआ और वे अल्लाह से प्रसन्न हुए।”6. अल्लाह वालों को भय नहीं।أَلَآ إِنَّ أَوْلِيَآءَ ٱللَّهِ لَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ— सूरह यूनुस 10:62भावार्थ — “सुनो! जो अल्लाह के मित्र (औलिया) हैं, उन्हें न कोई भय होगा और न वे दुःखी होंगे।”7. अल्लाह प्रेम करने वालों से प्रेम करता है।فَسَوْفَ يَأْتِى ٱللَّهُ بِقَوْمٍ يُحِبُّهُمْ وَيُحِبُّونَهُۥ— सूरह अल-माइदह 5:54भावार्थ — “अल्लाह ऐसी कौम लाएगा जिससे वह प्रेम करेगा और वे उससे प्रेम करेंगे।”इन प्रमाणों में इस्लाम में अल्लाह और बन्दे के बीच निकटता, प्रेम, मित्रता (विलायत), और आत्मीय सम्बन्ध की भावना होती है ।सूफ़ी सन्तों में प्रमाण --सूफ़ी सन्तों में ईश्वर-प्रेम, दोस्ती और आत्मीय सम्बन्ध के कुछ प्रमाण--1. Jalal al-Din Rumiدوست دارم من، نه از بیمِ دوزخنه به امیدِ بهشتभावार्थ — “मैं परमात्मा से प्रेम करता हूँ, न नरक के भय से और न स्वर्ग की आशा से।”2. Rabia al-Basriإِلٰهِي مَا عَبَدْتُكَ خَوْفًا مِنْ نَارِكَوَلَا طَمَعًا فِي جَنَّتِكَभावार्थ — “हे प्रभु! मैंने तेरी उपासना न तेरी आग के भय से की और न तेरे स्वर्ग की लालसा से।”3. Rabia al-Basriوَلَٰكِنْ وَجَدْتُكَ أَهْلًا لِلْحُبِّ فَأَحْبَبْتُكَभावार्थ — “मैंने तुझे प्रेम के योग्य पाया, इसलिए तुझसे प्रेम किया।”4. Hafizما بدین در نه پیِ حشمت و جاه آمده‌ایماز بدِ حادثه اینجا به پناه آمده‌ایمभावार्थ — “हम यहाँ पद और वैभव के लिए नहीं आए; हम तो प्रियतम की शरण में आए हैं।”5. Bulleh Shahرنجھا رنجھا کردی نی میں آپے رنجھا ہوئیभावार्थ — “प्रिय का नाम लेते-लेते मैं स्वयं उसी में लीन हो गई।”6. Amir Khusrauمن تو شدم، تو من شدیمن تن شدم، تو جان شدیभावार्थ — “मैं तू हो गया और तू मैं हो गया; मैं शरीर बना, तू प्राण बन गया।”7. Mansur Al-Hallajأَنَا الْحَقُّभावार्थ — “मैं सत्य हूँ।”सूफ़ी परम्परा में यह आत्मा के परमात्मा में लय होने का प्रतीक माना गया।8. Jalal al-Din Rumiعاشقم بر قهر و بر لطفش به جدبوالعجب من عاشق این هر دو ضدभावार्थ — “मैं उसके क्रोध और कृपा—दोनों पर प्रेम करता हूँ।”9. Sultan Bahooعشق خدا دا سبھ توں اُچاभावार्थ — “ईश्वर का प्रेम सबसे ऊँचा है।”इन सूफ़ी वचनों में ईश्वर को केवल स्वामी नहीं, बल्कि प्रियतम, मित्र और आत्मा के अत्यन्त निकट सत्य के रूप में अनुभव किया गया है।सिक्ख धर्म में प्रमाण --Guru Granth Sahib में परमात्मा के साथ प्रेम, मित्रता और आत्मीय सम्बन्ध के प्रमाण--1. परमात्मा सच्चा मित्र है।ਸਾਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਾਚੁ ਨਾਇ ਭਾਖਿਆ ਭਾਉ ਅਪਾਰ ॥— जपुजी साहिबभावार्थ — “वह सच्चा स्वामी है, उसका नाम सत्य है और उसका प्रेम असीम है।”2. प्रभु सखा और सहायक है।ਤੂ ਮੇਰਾ ਮਿਤ੍ਰੁ ਸਖਾ ਤੂਹੀ ॥— Guru Granth Sahibभावार्थ — “तू ही मेरा मित्र और सखा है।”3. परमात्मा सदा साथ रहने वाला।ਮੇਰਾ ਮਿਤ੍ਰੁ ਸਖਾ ਸੋ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਭਾਈ ॥— Guru Granth Sahibभावार्थ — “वही मेरा मित्र, सखा और प्रियतम है।”4. प्रभु प्रेम का आधार।ਹਰਿ ਜਨ ਰਾਮ ਨਾਮ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥— Guru Granth Sahibभावार्थ — “भगवान् के भक्त प्रेमपूर्वक उसके गुण गाते हैं।”5. ईश्वर से आत्मीय संवादਤੂ ਮੇਰਾ ਪਿਤਾ ਤੂਹੈ ਮੇਰਾ ਮਾਤਾ ॥ਤੂ ਮੇਰਾ ਬੰਧਪੁ ਤੂ ਮੇਰਾ ਭ੍ਰਾਤਾ ॥— Guru Granth Sahibभावार्थ — “तू ही मेरा पिता, माता, बन्धु और भाई है।”6. प्रभु ही जीवन का प्रियतम।ਪ੍ਰਭ ਜੀ ਤੂ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਾਣ ਅਧਾਰ ॥— Guru Granth Sahibभावार्थ — “हे प्रभु! तू मेरे प्राणों का आधार है।”7. प्रभु से प्रेम ही मुक्ति का मार्ग।ਜਿਨ ਪ੍ਰੇਮ ਕੀਓ ਤਿਨ ਹੀ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਇਓ ॥— Dasam Granthभावार्थ — “जिसने प्रेम किया, उसी ने प्रभु को पाया।”इन प्रमाणों में सिक्ख धर्म में परमात्मा को केवल उपास्य नहीं, बल्कि मित्र, सखा, पिता, माता और प्रियतम के रूप में अनुभव करने की भावना प्रकट होती है। होती है।ईसाई धर्म में प्रमाण --Bible में परमेश्वर के साथ मित्रता, प्रेम और आत्मीय सम्बन्ध के  प्रमाण--1. यीशु अपने शिष्यों को मित्र कहते हैं।“I have called you friends.”— John 15:15भावार्थ — “मैंने तुम्हें दास नहीं, मित्र कहा है।”2. परमेश्वर प्रेम है।“God is love.”— 1 John 4:8भावार्थ — “परमेश्वर प्रेमस्वरूप है।”3. जो परमेश्वर से प्रेम करता है, वह उससे जुड़ा रहता है।“Whoever lives in love lives in God, and God in them.”— 1 John 4:16भावार्थ — “जो प्रेम में रहता है, वह परमेश्वर में रहता है और परमेश्वर उसमें।”4. यीशु का प्रेमपूर्ण आमंत्रण।“Come to me, all you who are weary and burdened.”— Matthew 11:28भावार्थ — “हे थके और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ।”5. परमेश्वर मनुष्य के निकट रहता है।“The Lord is near to all who call on him.”— Psalm 145:18भावार्थ — “जो उसे पुकारते हैं, प्रभु उनके निकट रहता है।”6. अब्राहम परमेश्वर का मित्र कहलाया।“Abraham was called God’s friend.”— James 2:23भावार्थ — “अब्राहम परमेश्वर का मित्र कहलाया।”7.प्रेम सबसे बड़ा आदेश है।“You shall love the Lord your God with all your heart.”— Matthew 22:37भावार्थ — “तू अपने सम्पूर्ण हृदय से प्रभु परमेश्वर से प्रेम कर।”इन प्रमाणों में ईसाई धर्म में परमेश्वर और भक्त के बीच प्रेम, मित्रता, निकटता और आत्मीय सम्बन्ध की भावना स्पष्ट रूप से प्रकट होती है।जैन धर्म में प्रमाण --Jainism में आत्मा, मैत्री और सर्वजीव-प्रेम के प्रमाण (प्राकृत / अर्द्धमागधी देवनागरी सहित)-1. सब जीवों से मैत्री।मित्ति मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं ण केणइ ॥— Micchami Dukkadam Prayerभावार्थ — “सभी जीवों से मेरी मित्रता है, किसी से भी वैर नहीं।”2. धर्म का मूल अहिंसा।सव्वे पाणा ण हंतव्वा ॥— Acaranga Sutraभावार्थ — “किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करनी चाहिए।”3. आत्मवत् सबको समझना।जहा ते ण पियं दुक्खं, तहा णेसिं पि जाणिय ॥— Sutrakritangaभावार्थ — “जैसे तुम्हें दुःख प्रिय नहीं, वैसे ही अन्य जीवों को भी नहीं।”4. मैत्री भावना।मित्ती भावणाए जीवो…— Tattvartha Sutraभावार्थ — “जीव को सबके प्रति मैत्री भावना रखनी चाहिए।”5. क्षमा और सौहार्द।खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे ॥— जैन प्रतिक्रमण सूत्रभावार्थ — “मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें।”6. आत्मा ही परम मित्र।अप्पा मित्तममित्तं च ॥— Uttaradhyayana Sutraभावार्थ — “आत्मा ही अपना मित्र और शत्रु है।”7. समता और करुणा।समो अहं सव्वभूएसु ॥— जैन भावना परम्पराभावार्थ — “मैं सब प्राणियों के प्रति समभाव रखता हूँ।”इन जैन प्रमाणों में ईश्वर-भक्ति की अपेक्षा आत्मशुद्धि, सर्वजीव-मैत्री, करुणा, अहिंसा और आत्मीयता की भावना प्रमुख रूप से व्यक्त होती है, जो सार्वभौमिक मित्रता के आदर्श को दर्शाती है।बौद्ध धर्म में प्रमाण --Buddhism में मैत्री, करुणा और आत्मीय भाव के प्रमाण (पाली देवनागरी सहित)--1. सब प्राणियों के प्रति मैत्री।सब्बे सत्ता सुखिता होंतु ॥— Metta Suttaभावार्थ — “सभी प्राणी सुखी हों।”2. वैर का अंत प्रेम से।नहि वेरेन वेरानि सम्मन्ति इध कुदाचनं ।अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो ॥— Dhammapada 5भावार्थ — “वैर से वैर कभी शांत नहीं होता; अवैर (प्रेम) से ही शांत होता है।”3. स्वयं को प्रिय मानकर दूसरों को न दुख देना।अत्तानं उपमं कत्वा न हनेय्य न घातये ॥— Dhammapada 129भावार्थ — “अपने समान समझकर न किसी को मारो, न मरवाओ।”4. मैत्री से मन की शुद्धि।मेत्तञ्च सब्बलोकस्मिं मानसं भावये अपरिमाणं ॥— Karaniya Metta Suttaभावार्थ — “सारे संसार के प्रति असीम मैत्री-भाव विकसित करो।”5. करुणा और मित्रता।माता यथा नियं पुत्तं आयुसा एकपुत्तमनुरक्खे ।एवं पि सब्बभूतेसु मानसं भावये अपरिमाणं ॥— करणीया मेत्ता सुत्तभावार्थ — “जैसे माता अपने इकलौते पुत्र की रक्षा करती है, वैसे ही सब प्राणियों के प्रति असीम प्रेम रखो।”6. सच्चा मित्र दुर्लभ है।दुल्लभो पुरुषाजञ्ञो ॥— Dhammapada 193भावार्थ — “श्रेष्ठ और सच्चा मित्र दुर्लभ होता है।”7. आत्मा ही अपना सहायक।अत्ता हि अत्तनो नाथो ॥— Dhammapada 160भावार्थ — “मनुष्य स्वयं ही अपना आश्रय और मित्र है।”इन बौद्ध प्रमाणों में मैत्री (मेत्ता), करुणा, अवैर, और समस्त प्राणियों के प्रति आत्मीयता की भावना को सर्वोच्च आध्यात्मिक मार्ग बताया गया है । यहूदी धर्म में प्रमाण --Judaism में परमेश्वर के साथ प्रेम, निकटता और मित्रता के प्रमाण (हिब्रू लिपि सहित)1. परमेश्वर से पूर्ण प्रेम।וְאָהַבְתָּ אֵת יְהוָה אֱלֹהֶיךָבְּכָל־לְבָבְךָ וּבְכָל־נַפְשְׁךָ וּבְכָל־מְאֹדֶךָ— Torahभावार्थ — “तू अपने सम्पूर्ण हृदय, प्राण और शक्ति से अपने परमेश्वर से प्रेम कर।”2. परमेश्वर निकट है।קָרוֹב יְהוָה לְכָל־קֹרְאָיו— Book of Psalmsभावार्थ — “जो उसे पुकारते हैं, प्रभु उनके निकट है।”3. अब्राहम परमेश्वर का मित्र।אַבְרָהָם אֹהֲבִי— Book of Isaiahभावार्थ — “अब्राहम मेरा प्रिय/मित्र है।”4. परमेश्वर दयालु और प्रेममय।יְהוָה יְהוָה אֵל רַחוּם וְחַנּוּן— Torahभावार्थ — “प्रभु दयालु और अनुग्रहकारी है।”5. अपने पड़ोसी से प्रेम करो।וְאָהַבְתָּ לְרֵעֲךָ כָּמוֹךָ— Torahभावार्थ — “अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर।”6. परमेश्वर चरवाहे समान। मित्रवत् रक्षकיְהוָה רֹעִי לֹא אֶחְסָר— Book of Psalmsभावार्थ — “प्रभु मेरा चरवाहा है, मुझे किसी वस्तु की कमी नहीं होगी।”7. परमेश्वर पर भरोसा रखने वालों से प्रेम।אֹהֵב יְהוָה צַדִּיקִים— Book of Psalmsभावार्थ — “प्रभु धर्मियों से प्रेम करता है।”इन यहूदी प्रमाणों में परमेश्वर और मनुष्य के बीच प्रेम, निकटता, करुणा, संरक्षण और आत्मीय सम्बन्ध की भावना स्पष्ट रूप से व्यक्त होती है।पारसी धर्म में प्रमाण --Zoroastrianism (पारसी धर्म) में अहुरा मज़्दा के प्रति प्रेम, मैत्री और धर्मनिष्ठा के  प्रमाण--(अवेस्ताई / Avestan लिपि सहित)1. अहुरा मज़्दा सर्वोच्च मित्र और मार्गदर्शक।𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀— Avestaभावार्थ — “अहुरा मज़्दा — बुद्धिमान प्रभु।”2. शुभ विचार, शुभ वचन, शुभ कर्म।Humata, Hukhta, Hvarshta(अवेस्ताई परम्परा:𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬎𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀)भावार्थ — “सद्विचार, सद्वचन और सद्कर्म।”3. सत्य के मार्ग पर चलना।𐬀𐬴𐬀 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬀— “Asha Vahishta”Avestaभावार्थ — “श्रेष्ठ सत्य और धर्म।”4. धर्मी व्यक्ति अहुरा मज़्दा का प्रिय।𐬀𐬱𐬀𐬎𐬥𐬀𐬨 𐬬𐬀𐬢𐬵𐬀𐬌— Ashem Vohu प्रार्थनाभावार्थ — “धर्म और सत्य ही श्रेष्ठ कल्याण हैं।”5. अहुरा मज़्दा से आत्मीय प्रार्थना।𐬫𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬌 𐬥𐬀𐬨𐬀𐬥𐬀— Avestaभावार्थ — “मैं श्रद्धा से तेरी ओर आता हूँ।”6. ईश्वर और धर्म के प्रति निष्ठा।𐬌𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬋— Ahuna Vairya मंत्रभावार्थ — “दैवी शासन धर्म और सत्य से स्थापित हो।”7. प्रकाश और सत्य का मार्ग।𐬭𐬀𐬊𐬗𐬥𐬀𐬨 𐬀𐬴𐬀𐬌— Avestaभावार्थ — “प्रकाश और सत्य का अनुसरण करो।”इन पारसी धर्म के प्रमाणों में अहुरा मज़्दा के साथ श्रद्धा, सत्य, धर्म, प्रकाश और आत्मीय सम्बन्ध की भावना व्यक्त होती है। यहाँ ईश्वर को सत्य और शुभता का परम स्रोत माना गया ताओ धर्म में प्रमाण --Taoism (ताओ धर्म) में ताओ के साथ एकात्मता, प्रेम और आत्मीय सम्बन्ध के प्रमाण(चीनी लिपि सहित)1. ताओ सबका मूल है।道可道,非常道。— Tao Te Chingभावार्थ — “जिस ताओ का वर्णन किया जा सके, वह शाश्वत ताओ नहीं है।”2. ताओ माता समान पालन करता है।道生一,一生二,二生三,三生萬物。— Tao Te Chingभावार्थ — “ताओ से एक उत्पन्न हुआ, उससे सब जगत उत्पन्न हुआ।”3. श्रेष्ठ मनुष्य सब से प्रेम करता है।聖人常善救人,故無棄人。— Tao Te Chingभावार्थ — “सन्त पुरुष सबका कल्याण करता है, किसी को त्यागता नहीं।”4. कोमलता और करुणा ताओ का गुण।我有三寶:一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。— Tao Te Chingभावार्थ — “मेरे तीन रत्न हैं — करुणा, सादगी और विनम्रता।”5. ताओ के साथ चलना शान्ति देता है।人法地,地法天,天法道,道法自然。— Tao Te Chingभावार्थ — “मनुष्य पृथ्वी का अनुसरण करता है, पृथ्वी आकाश का, आकाश ताओ का, और ताओ स्वभाव का।”6. प्रेम भय को मिटाता है।慈故能勇。— Tao Te Chingभावार्थ — “करुणा के कारण मनुष्य साहसी बनता है।”7. ताओ सबको समान रूप से पोषण देता है।道生之,德畜之。— Tao Te Chingभावार्थ — “ताओ सबको उत्पन्न करता है और उसका गुण सबका पालन करता है।”इन ताओवादी प्रमाणों में परम सत्य (ताओ) को सर्वव्यापी, करुणामय, पालनकर्ता और सबके साथ एकात्म सम्बन्ध रखने वाला बताया गया है।कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --Confucianism के धर्मग्रन्थों में प्रेम, मैत्री, करुणा और आत्मीय सम्बन्ध के प्रमाण(चीनी लिपि सहित)1. मानवता (Ren) ही सर्वोच्च गुण।仁者愛人。— Analects 12:22भावार्थ — “सज्जन (Ren वाला) मनुष्य सब से प्रेम करता है।”2. जो अपने लिए न चाहो, दूसरों पर मत करो।己所不欲,勿施於人。— Analects 15:24भावार्थ — “जो तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों पर मत थोपो।”3. सच्चा मित्र धर्म में सहायक होता है।益者三友。友直,友諒,友多聞,益矣。— Analects 16:4भावार्थ — “तीन प्रकार के मित्र लाभदायक हैं — सत्यवादी, विश्वासी और ज्ञानवान।”4. सद्गुणी व्यक्ति सबके साथ सामंजस्य रखता है।君子和而不同。— Analects 13:23भावार्थ — “श्रेष्ठ पुरुष सबके साथ सामंजस्य रखता है, पर अन्धानुकरण नहीं करता।”5. प्रेम और करुणा से समाज सुधरता है।老吾老,以及人之老;幼吾幼,以及人之幼。— Mencius 1A:7भावार्थ — “अपने वृद्धों का आदर करो और दूसरों के वृद्धों का भी; अपने बच्चों से प्रेम करो और दूसरों के बच्चों से भी।”6. मित्रता में विश्वास आवश्यक।與朋友交,言而有信。— Analects 1:7भावार्थ — “मित्रों के साथ व्यवहार में वचन का विश्वास होना चाहिए।”7. महान व्यक्ति सबके कल्याण की कामना करता है।君子成人之美,不成人之惡。— Analects 12:16भावार्थ — “श्रेष्ठ पुरुष दूसरों की अच्छाइयों को बढ़ाता है, बुराइयों को नहीं।”इन कन्फ्यूशियस धर्मग्रन्थों में मानवता (仁), मैत्री, करुणा, सत्यनिष्ठा और पारस्परिक सम्मान को आध्यात्मिक एवं सामाजिक जीवन का आधार माना है ।शिन्तो धर्म में प्रमाण --Shinto में प्रकृति, कामी (देवशक्ति), और मानव के आत्मीय सम्बन्ध के प्रमाण(जापानी लिपि सहित)1. कामी प्रकृति में निवास करते हैं।神は森羅万象に宿る。भावार्थ — “कामी (दैवी शक्ति) सम्पूर्ण प्रकृति में निवास करते हैं।”2. शुद्ध हृदय से कामी के निकटता।清き明き心を以て事にあたれ。— Kojiki परम्पराभावार्थ — “निर्मल और उज्ज्वल हृदय से कार्य करो।”3. मनुष्य और कामी का सामंजस्य।惟神の道。(かんながらのみち)भावार्थ — “कामी के स्वाभाविक मार्ग पर चलना।”4. प्रकृति के प्रति श्रद्धा।山川草木悉皆神性。भावार्थ — “पर्वत, नदियाँ, वृक्ष और समस्त प्रकृति दैवी तत्व से युक्त हैं।”5. कामी और मनुष्य का निकट सम्बन्ध।人は神の子なり。भावार्थ — “मनुष्य कामी की संतान है।”6. हृदय की सत्यता सर्वोच्च।まごころは神の心。भावार्थ — “सच्चा हृदय ही कामी का हृदय है।”7. सौहार्द और सामंजस्य।和を以て貴しとなす。— Seventeen-Article Constitutionभावार्थ — “सामंजस्य (Harmony) को सर्वोच्च मानो।”इन शिन्तो प्रमाणों में कामी और मानव के बीच निकटता, प्रकृति के प्रति श्रद्धा, शुद्ध हृदय, और सामंजस्यपूर्ण जीवन की भावना व्यक्त होती है।यूनानी दर्शन में ‌प्रमाण-- Ancient Greek Philosophy में ईश्वर, मैत्री, प्रेम और आत्मीय सम्बन्ध के प्रमाण--1. Socrates — आत्मा का ईश्वर से सम्बन्ध।“The unexamined life is not worth living.”— Apology 38aभावार्थ — “आत्मचिन्तन के बिना जीवन सार्थक नहीं।”सॉक्रेटीस आत्मा को दैवी सत्य के निकट ले जाने पर बल देते हैं।2. Plato — परम सौन्दर्य और प्रेम।“Love is the desire for the perpetual possession of the good.”— Symposiumभावार्थ — “प्रेम शाश्वत शुभ की प्राप्ति की आकांक्षा है।”3. Plato — ईश्वर सदैव शुभ है।“God is good, and in no way the cause of evil.”— Republic 379bभावार्थ — “ईश्वर पूर्णतः शुभ है, वह बुराई का कारण नहीं।”4. Aristotle — मित्रता सर्वोच्च सम्बन्ध।“Without friends no one would choose to live.”— Nicomachean Ethics VIII.1भावार्थ — “मित्रों के बिना कोई भी जीवन नहीं चुनना चाहेगा।”5. Aristotle — परम सत्ता प्रेम का केन्द्र।“The divine intellect thinks itself eternally.”— Metaphysics XII.9भावार्थ — “दैवी बुद्धि शाश्वत सत्य में स्थित है।”6. Epictetus — मनुष्य ईश्वर की संतान।“You are a fragment of God.”— Discoursesभावार्थ — “मनुष्य दैवी सत्ता का अंश है।”7. Plotinus — आत्मा का परम एकत्व।“The soul longs to return to the One.”— Enneadsभावार्थ — “आत्मा परम एकत्व (The One) में लौटने की आकांक्षा रखती है।”इन यूनानी दार्शनिक प्रमाणों में सत्य, प्रेम, मित्रता, आत्मा और परम सत्ता के बीच गहरे आध्यात्मिक सम्बन्ध की भावना व्यक्त होती है।-----+-------+±-----±++-