भाग - 11
निशा का हाथ कुंडी पर ही रुक गया उसकी नजर दरवाजे के नीचे दिख रहे पैरों पर अटक गई गीली मिट्टी और एड़ियाँ सामने की तरफ कुछ सेकंड के लिए उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया।
बाहर फिर वही आवाज आई
रोहित- निशा.. दरवाज़ा खोलो
आवाज़ बिल्कुल वही थी वही ठहराव… वही लहजा लेकिन अब निशा को यकीन हो चुका था कि बाहर जो भी है वो उसके पिता नहीं हैं उसने धीरे से हाथ पीछे खींच लियाउसकी सांसें तेज हो गईं, लेकिन उसने खुद को शांत रखने की कोशिश की
निशा- पापा… आप कब आए?
कुछ सेकंड तक कोई जवाब नहीं आया फिर वही आवाज
रोहित- अभी दरवाज़ा खोलो
इस बार आवाज में हल्की-सी खुरदराहट थी जैसे शब्दों को ज़बरदस्ती दोहराया जा रहा हो निशा एक कदम पीछे हट गई कमरे के अंदर सन्नाटा था बाहर बारिश की आवाज और तेज हो चुकी थी
ठक…
दरवाज़े पर एक और हल्की दस्तक इस बार थोड़ा ज़ोर से
ठक… ठक…
निशा ने अचानक फैसला लिया वह तेजी से पीछे हटी और कमरे की लाइट जला दी रोशनी फैलते ही उसने फिर नीचे देखा दरवाज़े के नीचे… कुछ नहीं था ना कोई पैर ना कोई परछाई बाहर पूरी तरह सन्नाटा उसने कुछ सेकंड तक वहीं खड़े रहकर इंतजार किया फिर धीरे से आगे बढ़ी और कुंडी खोली
दरवाज़ा खोलते ही सामने खाली बरामदा था हवा तेज चल रही थी बारिश की बूंदें अंदर तक आ रही थीं कोई नहींनिशा का दिल अब भी जोर से धड़क रहा था वह धीरे-धीरे बाहर आई और इधर-उधर देखने लगी। तभी पीछे से आवाज आई
रितिका- क्या हुआ?
निशा झटके से पलटी रितिका अपने कमरे से बाहर आई थी उसके चेहरे पर नींद और चिंता दोनों थी
निशा- मम्मी आपने किसी को बाहर आते-जाते देखा?
रितिका- नहीं… क्यों?
निशा कुछ सेकंड चुप रही वह तय नहीं कर पा रही थी कि जो उसने देखा वो सच था या नहीं
निशा- कुछ नहीं… शायद भ्रम था
उसी समय रोहित भी अपने कमरे से बाहर आया
रोहित- क्या हुआ?
निशा ने उसकी तरफ देखा इस बार उसके पैर बिल्कुल सामान्य थे साफ बिना मिट्टी के , निशा ने कुछ नहीं कहा
निशा- कुछ नहीं पापा बस नींद खुल गई थी
रोहित ने कुछ पल उसे देखा, फिर सिर हिलाकर वापस अपने कमरे में चला गया रितिका भी अंदर चली गई बरामदे में अब सिर्फ निशा खड़ी थी उसने एक बार फिर नीचे जमीन को देखा सब साफ था लेकिन उसके दिमाग में वो उल्टे पैर अब भी साफ दिख रहे थे
वह धीरे से अपने कमरे में वापस आई और दरवाज़ा बंद कर लिया उसने कुंडी भी लगा दी
बिस्तर पर बैठकर वह काफी देर तक छत को देखती रही नींद तो उसकी आंखों से पूरी तरह गायब हो चुकी थी
सुबह होते ही घर का माहौल सामान्य था आर्यन वैसे ही शोर कर रहा था रितिका अपने काम में लगी थी रोहित चुपचाप अखबार पढ़ रहा था
लेकिन निशा के लिए सब कुछ बदल चुका था वह बार-बार रोहित की तरफ देख रही थी कुछ तो अजीब था लेकिन क्या ये उसे अभी तक समझ नहीं आ रहा था
दोपहर में जब वह अकेली थी, उसने मोबाइल उठाया कुछ देर तक contact list को देखती रही फिर उसने एक नंबर पर उंगली रोक दी , लेकिन call नहीं किया उसने फोन वापस रख दिया , उसे पहले प्रूफ चाहिए था
लेकिन अंदर कहीं उसे महसूस हो रहा था कि ये शुरुआत है और जो भी है वो अब घर के बाहर नहीं अंदर आ चुका है वो दिन भी जैसे तैसे निकल गया।
सुबह का माहौल हमेशा की तरह था, लेकिन एक फर्क था अब घर में हर चीज़ सामान्य दिख रही थी, पर महसूस कुछ और हो रहा था जैसे किसी अनदेखी चीज़ ने चुपचाप अपनी जगह बना ली हो।
रोहित जल्दी उठ गया था वह आँगन में खड़ा था, हाथ में चाय का कप उसकी नजरें कहीं दूर थीं रात की कोई बात उसके चेहरे पर नहीं थी, लेकिन उसकी आँखों में हल्की थकान थी।
रितिका उसके पास आई
रितिका- आज बहुत जल्दी उठ गए
रोहित- नींद खुल गई
रितिका- तबीयत तो ठीक है?
रोहित- हाँ
सीधा जवाब कोई विस्तार नहीं रितिका ने कुछ पल उसे देखा, फिर वापस अंदर चली गई निशा दरवाजे के पास खड़ी सब देख रही थी। वह अब हर चीज़ को अलग नजर से देख रही थी। खासकर रोहित को
उसे कुछ अजीब नहीं दिख रहा था लेकिन कुछ ठीक भी नहीं लग रहा था रोहित ड्यूटी पर चला गया घर में अब सिर्फ रितिका और बच्चे थे आर्यन अपने कमरे में था, मोबाइल पर लगा हुआ बीच-बीच में गेम की आवाज आ रही थी
निशा बरामदे में बैठी थी किताब उसके सामने खुली थी, लेकिन उसका ध्यान कहीं और था
रितिका रसोई में थी कुछ देर बाद रितिका ने आवाज लगाई
रितिका- निशा, जरा ये डिब्बा ऊपर रख दो
निशा उठकर रसोई में गई
जैसे ही उसने डिब्बा उठाया, उसे अचानक लगा जैसे उसके पीछे कोई खड़ा है बहुत पास उसकी सांस एक पल को रुक गई वह धीरे से पलटी कोई नहीं रसोई खाली थी रितिका दूसरी तरफ खड़ी थी, उसे कुछ पता नहीं था
निशा ने खुद को संभाला
निशा- मम्मी आप अभी यहीं थीं?
रितिका- हाँ, क्यों?
निशा- कुछ नहीं
वह वापस बरामदे में आ गई अब उसका शक और गहरा हो गया था शाम को आर्यन बाहर खेलने गया हुआ था निशा अपने कमरे में थी अचानक उसे लगा जैसे घर के अंदर कोई धीरे-धीरे चल रहा है
ठक…
ठक…
ठक…
वही नंगें पैरों की आवाज इस बार वह डरकर चुप नहीं बैठी वह दरवाजे तक गई और धीरे से उसे खोला बाहर हॉल में हल्का अंधेरा था आवाज किचन की तरफ से आ रही थी निशा धीरे-धीरे आगे बढ़ी जैसे ही वह किचन के पास पहुँची, आवाज बंद हो गई
वह कुछ सेकंड वहीं खड़ी रही फिर अंदर झाँका किचन खाली था सब कुछ अपनी जगह पर तभी उसे पीछे से किसी के हँसने की बहुत हल्की आवाज सुनाई दी एकदम धीमी जैसे कोई उसके बिल्कुल पास खड़ा हो
निशा तुरंत पलटी कोई नहीं लेकिन इस बार उसकी सांसें तेज हो चुकी थीं यह सिर्फ उसका वहम नहीं था कुछ था जो उसे देख रहा था और अब खेल रहा था
रात को जब रोहित वापस आया तो घर का माहौल सामान्य था लेकिन निशा ने तय कर लिया था वह अब इंतजार नहीं करेगी रात को अपने कमरे में बैठकर उसने मोबाइल उठाया इस बार उसने बिना सोचे वही नंबर डायल किया फोन कुछ सेकंड तक बजता रहा फिर कॉल उठी दूसरी तरफ कुछ सेकंड सन्नाटा रहा फिर एक शांत आवाज आई
आरव- हेलो.....