एक छोटा लड़का हर साल अपने जन्मदिन पर एक ही सवाल पूछता था,
“माँ, पापा इस बार आएँगे ना?”
माँ हर बार मुस्कुराकर कहती,
“हाँ बेटा, ज़रूर आएँगे।”
उसके पापा शहर में नौकरी करते थे।
घर की हालत खराब थी, इसलिए सालों से गाँव नहीं आ पाए थे।
उस दिन लड़के का दसवाँ जन्मदिन था।
उसने पूरे दिन दरवाज़े पर बैठकर इंतज़ार किया।
शाम हो गई… रात भी हो गई…
लेकिन पापा नहीं आए।
लड़का उदास होकर सो गया।
रात देर से दरवाज़ा खटखटाया।
माँ दौड़कर बाहर गई।
दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा था, हाथ में छोटा-सा केक और एक पुराना बैग।
“बहन… ये बैग तुम्हारे पति का है।
फैक्ट्री में हादसा हो गया…”
माँ के हाथ काँपने लगे।
उस आदमी ने धीरे से केक आगे बढ़ाया और कहा,
“मरने से पहले बस इतना कहा था —
‘मेरे बेटे का जन्मदिन अधूरा मत रहने देना…’”
अंदर कमरे में बच्चा चैन से सो रहा था…
उसे क्या पता था —
जिसके आने का इंतज़ार था,
वह आखिरी बार सिर्फ याद बनकर आया था।
रात भर माँ उस पुराने बैग को सीने से लगाकर रोती रही।
बार-बार पति की आखिरी बात उसके कानों में गूंज रही थी —
“मेरे बेटे का जन्मदिन अधूरा मत रहने देना…”
सुबह जब बेटे की आँख खुली, उसने सबसे पहले पूछा,
“माँ… पापा आए थे ना? कहाँ हैं वो?”
माँ ने आँसू छुपाते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा और बोली,
“हाँ बेटा… आए थे।
तुम्हें सोता देखकर बहुत देर तक देखते रहे।”
“फिर मुझे उठाया क्यों नहीं?”
माँ चुप हो गई।
उसके पास कोई जवाब नहीं था।
बेटे ने जल्दी से बैग खोला।
अंदर एक छोटी-सी खिलौना कार, एक नई शर्ट और एक चिट्ठी रखी थी।
काँपते हाथों से माँ ने चिट्ठी खोली।
उसमें लिखा था —
“मेरे प्यारे बेटे,
अगर मैं इस बार भी देर से आऊँ तो नाराज़ मत होना।
मैं रोज़ तुम्हारे लिए सपने कमाने निकलता हूँ।
शायद मैं अच्छा पिता नहीं बन पाया,
लेकिन तुमसे बहुत प्यार करता हूँ।”
चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते माँ फूटकर रो पड़ी।
बेटा कुछ समझ नहीं पा रहा था।
उसने मासूमियत से पूछा,
“माँ… पापा अगली बार कब आएँगे?”
माँ ने बेटे को गले से लगा लिया।
उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
कई साल बीत गए…
अब वही छोटा बच्चा बड़ा होकर नौकरी करने शहर जा रहा था।
स्टेशन पर खड़ी माँ बार-बार उसे समझा रही थी,
“बेटा, अपना ख्याल रखना… और जल्दी लौट आना।”
लड़के ने मुस्कुराकर माँ को गले लगाया और कहा,
“माँ, मैं पापा की तरह तुम्हें इंतज़ार नहीं करवाऊँगा।”
ट्रेन चल पड़ी।
माँ दूर तक जाती ट्रेन को देखती रही…
और पहली बार उसे एहसास हुआ —
कुछ दर्द कभी खत्म नहीं होते,
वे बस पीढ़ियों में चुपचाप जीते रहते हैं।
ट्रेन की खिड़की से बेटा लगातार अपनी माँ को देख रहा था।
जब तक स्टेशन आँखों से ओझल नहीं हो गया, उसकी नजर वहीं टिकी रही।
शहर पहुँचकर उसने छोटी-सी नौकरी शुरू कर दी।
दिनभर काम, रातभर थकान…
अब उसे समझ आने लगा था कि उसके पिता आखिर क्यों घर नहीं आ पाते थे।
हर महीने वह अपनी आधी तनख्वाह माँ को भेज देता।
माँ फोन पर हमेशा एक ही बात कहती,
“बेटा, अपने लिए भी कुछ बचा लिया कर।”
वह हँसकर कहता,
“मेरे पास सब है माँ।”
लेकिन सच यह था कि उसके पास खुद के लिए कुछ भी नहीं था।
एक रात काम से लौटते समय उसे सड़क किनारे एक छोटी बच्ची दिखी।
वह अपनी माँ का हाथ पकड़े खिलौने की दुकान को देख रही थी।
अचानक उसे अपना बचपन याद आ गया…
वो अधूरा जन्मदिन…
वो छोटा-सा केक…
और पिता की आखिरी चिट्ठी।
उसकी आँखें भर आईं।
अगले दिन उसने अपनी पहली बड़ी तनख्वाह से सबसे पहले क्या खरीदा?
न अपने लिए कपड़े…
न मोबाइल…
उसने अपनी माँ के लिए नई चप्पल खरीदी, एक गर्म शॉल और एक छोटा-सा केक।
कई साल बाद वह अचानक बिना बताए गाँव पहुँचा।
माँ आँगन में बैठी थी।
बेटे को सामने देखकर उसकी आँखें चमक उठीं।
“तू… अचानक?”
बेटे ने मुस्कुराकर बैग आगे बढ़ाया और कहा,
“माँ, इस बार किसी का जन्मदिन अधूरा नहीं रहेगा।”
माँ ने काँपते हाथों से केक को छुआ…
और रो पड़ी।
क्योंकि उस दिन उसे अपने बेटे में
अपने खोए हुए पति की परछाई दिखाई दे रही थी।