फासलों की कसक: एक अधूरी मुलाकात
शहर की भीड़भाड़ से दूर, पहाड़ों की ओट में बसे एक छोटे से गाँव में अद्वैत रहता था। दूसरी ओर, सैकड़ों मील दूर समंदर की लहरों के किनारे बसे एक महानगर की ऊँची इमारत में मीरा रहती थी। उनके बीच सिर्फ नक्शे की लकीरें नहीं थीं, बल्कि मौसम, ज़बान और हज़ारों रुपयों का किराया भी था। पर इन सबके बावजूद, जो चीज़ उन्हें जोड़ती थी, वो थी उनके फ़ोन की स्क्रीन और वो बेपनाह तड़प, जो आँखों से नींद छीन लेती थी।
रात के दो बज रहे थे। अद्वैत अपने कमरे की खिड़की से बाहर घुप अंधेरे में डूबे पहाड़ों को देख रहा था। कड़ाके की ठंड थी, और उसकी साँसें धुएँ की तरह हवा में जम रही थीं। उसने अपना फ़ोन उठाया और कांपते हाथों से मीरा को मैसेज किया— "क्या तुम जाग रही हो?"
उधर मीरा ने तुरंत रिप्लाई किया, जैसे वह उसी का इंतज़ार कर रही थी। उसने लिखा— "यहाँ समंदर की हवाओं में आज तुम्हारी खुशबू महसूस हो रही है। मन करता है बस अभी भागकर तुम्हारे पास आ जाऊं।"
अद्वैत की आँखों में आँसू छलक आए। उसने कल्पना की कि काश वह उड़कर मीरा के पास पहुँच सकता। वह उसे वह पहाड़ी फूल दिखाना चाहता था जो उसने सिर्फ़ उसके लिए सुखाकर एक किताब में रखा था। मीरा उसे अपनी खिड़की से दिखने वाला वो नीला समंदर दिखाना चाहती थी, जिसकी आवाज़ वह अक्सर कॉल पर सुनाया करती थी।
उनका प्यार कोई आम कहानी नहीं थी। वे घंटों वीडियो कॉल पर एक-दूसरे को देखते रहते, बिना कुछ बोले। कभी-कभी अद्वैत अपना कैमरा पहाड़ों की ढलानों की तरफ मोड़ देता, तो कभी मीरा उसे डूबते हुए सूरज की लाली दिखाती। वे साथ में चाय पीते, साथ में गाने सुनते, पर उनके हाथ कभी एक-दूसरे को छू नहीं पाते थे।
एक दिन दोनों ने तय किया कि वे बीच के किसी शहर में मिलेंगे। अद्वैत ने अपनी जमा-पूंजी इकट्ठी की और मीरा ने अपनी छुट्टियाँ मैनेज कीं। मिलने की तारीख तय हुई। जैसे-जैसे दिन करीब आने लगे, उनकी धड़कनें तेज़ होने लगीं। अद्वैत ने अपनी सबसे अच्छी कमीज प्रेस करके रखी, और मीरा ने वो झुमके निकाले जो अद्वैत को पसंद थे।
पर किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। जिस दिन अद्वैत को निकलना था, पहाड़ों में भारी भूस्खलन हुआ और सारे रास्ते बंद हो गए। उधर मीरा के शहर में भी मूसलाधार बारिश ने रेल की पटरियों को डुबो दिया। कुदरत ने उनके बीच की दूरी को एक दीवार बना दिया था।
फ़ोन पर दोनों रो रहे थे। अद्वैत ने सिसकते हुए कहा, "मीरा, मैं बस कुछ ही मील दूर रह गया।"
मीरा ने अपने आंसुओं को पोंछते हुए जवाब दिया, "अद्वैत, शायद ये फासले ही हमारे प्यार की ताकत हैं। हम पास होकर भी शायद इतना महसूस नहीं कर पाते, जितना इस दूरी में एक-दूसरे को जी रहे हैं।"
उस रात, वे मिले तो नहीं, पर उनकी रूहें एक-दूसरे के करीब थीं। अद्वैत ने पहाड़ की ठंडी हवा में मीरा का नाम पुकारा, और उधर मीरा ने समंदर की लहरों में अद्वैत की आवाज़ सुनी। उनका प्यार उस स्टेशन की तरह था, जहाँ ट्रेनें तो रोज़ आती-जाती थीं, पर उनकी मंज़िल का इंतज़ार कभी खत्म नहीं होता था।
वे आज भी दूर हैं, तड़प आज भी वैसी ही है, पर उनका प्यार उस चाँद की तरह है जो भले ही कितनी भी दूर हो, पर उसकी रोशनी दोनों के आंगन को एक साथ रोशन करती है।