-------------
कॉलेज एंड हो गया था।.चारू पहले ही अमर की क्लास छोड चुकी थी और अब नैना से नोट्स लेकर डोर्म मे कम्प्लीट कर रही थी।
पॉलिटिकल साइंस एज जनरल इलेक्टिव...इम्पोर्टेंट था । लेकिन दिमागी खपत बहुत ज्यादा। चारू ने फ्रस्ट्रेट होकर किताब बंद कर दी।
उसने टाईम देखा तो 7 बज रहे थे। पहले ही अंधेरा हो गया था। लेकिन चारू का मन कुछ अशांत था। उसने जेकिट उठाई और डोर्म से बाहर निकल गई।
कान मे ईयर फोन लगाए और एक किताब लिए टहलने चली गई। उसने चलते चलते बांया मोड काटा और अब वो जंगल देख सकती थी। चारू के चेहरे पर हल्कि मुस्कान आ गई।
ना जाने क्या था इन जंगलो मे कि वो इनका मोह कर बैठा थी।
वो गुनगुनाने लगी।
मनी हारी का भेस बनाया...श्याम चुडी बेचने आया !
वो ये भजन गाते हुए जंगल मे प्रवेश कर गई। जैसे जैसे वो आगे बड रही थी पक्का रास्ता खत्म हो रहा था और कच्ची सडक सामने थी।
चारू अपनी ही धून मे मस्त थी जब उसे कुछ आभास हुआ । कुछ मशीन और लोगो की आवाजे आ रही थी। वो पलट गई। उसने इयर फोन निकाल दिया। और ध्यान से आवाज सुनने लगी।
ऐसा लग रहा था कुछ लोग आपस मे बात कर रहे हो।
चारू ने आंखे बंद करी और ध्यान लगाने लगी।
" ये आवाज..ये तो किसी इंस्ट्रुमेंट की है। शायद..आरी..या कुछ और ! ओ..ओह माई गोड..! ये तो..योग तो पेड काट.
रहे है। "
ठंड मे भी चारू के पसीने छुट गए। सुना था उसने की मेघराज मे खनन होता है। लेकिन आज..स्वंय आभास कर उसके पैर कांपने लगे थे।
वो आगे..आवाज की दिशा मे बड गई। कुछ दूर चल वो एक पेड के पीछे आकर खडी हो गई।
यहा इस जंगल मे देवदार , बरगत , बांज , शीशमऔर भी कई मूल्यवान पेड लगे थे। इनकी मार्केट वेल्यू लाख मे थी। अपने सामने कटते पेड देख चारू को अपने सीने मे टीस महसूस हुई। पर डर उस दर्द पर हावी हो गया । पकडे जाने के डर से वो पलटी और जाने लगी।
मगर उसकी बुरी किस्मत...वो एक पेड की जड से उलझ गिर पडी ।
चारू की चीख निकल गई। उसकी आवाज सुन पेड काटते लोग भी रूक गए।
चारू का चेहरा पसीने से तर बतर हो गया । वो उठी और दौड लगा दी। किसी भी तरह उसे बचके निकलना था। वो इन सभ चीजो मे नही उलझेगी।
मगर वो नही जानती थी कि वो किसी की नजरो मे आ गई थी। कोई था जो एक पेड की टहनी पर उकडु बैठा था। उसने काली शर्ट , काली पेंट और भारी बुट्स पहने थे। चेहरा कपडे से ढका था। उसकी बस आंखे दिख रही था जो रात के अंधेरे मे किसी तेंदुए कि तरह चमक रही थी। वो लगातार चारू पर नजर बनाए था।
पेड काटते लोगक सर्तक होकर आवाज की दिशा मे बड गए तो वो साया हिला ।
अगले ही पल वो एक आदमी के ऊपर कूद गया ।
बाकी के लोग अपनी जगह पर ठिठक गए।
साए ने सर उठाकर सबकी तरफ देखा । उसकी आंखे मे चांद चमक रहा था। वो किसी अंधकार के देवता की भांती सभी आदमियो पर टूट पडा ।
जंगल खुशी मे झुमने लगा। एक अर्से बाद उसे बचाया जा रहा था।
-------------
चारू हडबडाकर अपने कमरे मे घुसी । वो कांप रही थी। उसने जंगल से चीखे सुनी थी। ना जाने क्या हुआ था वहां !
उसने अपना फोन उठाया और नैना को कॉल करने लगी।
" नही..वो परेशान हो जाएगी। पहले ही बिमार है। ", कहती हुए, उसने कॉल कट कर दिया।
चारू बाथरूम मे गई और हल्के गर्म पानी से मुंह धोने लगी।
उसने गहरी सांसे भरी और बाहर आ गई। बिस्तर पर उसकी किताबे पडी थी । ध्यान हटाने के लिए उसने कमरा सिंगवाना शुरू कर दिया था।
जब मन और दिमाग उलझ जाए, अव्यवस्थित हो जाए तब कमरा व्यवस्थित कर लो। जीवन अपने आप सुलझ जाएगा।
अपने पिता की ये बात वो हमेशा याद रखती थी। और आज भी इसी का अनुसरण कर वो स्वंय को संयत कर रही थी।
कमरा ठीक करने के बाद वो बिस्तर मे दुबक कर बैठ गई।
डरते डरते ही चारू को नींद आ गई।
अगले दिन वो सात बजे उठी और फटाफट तैयार होकर कॉलेज के लिए भागी।
वो अभी कॉलेज मे घुसी ही थी की जल्दबाजी के कारण किसी से टकरा गई।
चारू लडखडा कर पीछ हट गई। वो अभी अपना माथा सहला ही रही थी की एक भारी आवाज उसके कानो मे पडी।
" आप की आंखे सर के पीछे लगी है या आप आंख बंद कर चलती है । "
अमर ने भंवे उचका ली।
चारू ने रोनी सूरत बनाकर अमर को देखा। वो अब सच मे रो देती। आखिर इतनी बेईजत्ती वो भी एक ही इंसान के सामने...सही नही जाती ।
" सॉरी सर। ", चकरू ने सर झुकाकर कहा।
" क्या सॉरी । कल की तरह भागेगा नही आप ! और ये क्या हवाई घोड़े पर सवार रहती है। आंखे है या बटन ! ", अमर उसे डांटने लगा।
आसपास भीड जमा होने लगी। कुछ आपस मे बात कर रहे थे तौ कुछ हँस रहे थे।
शर्मिंदगी के कारण चारू का चेहरा लाल पड गया। और आंख नम हो गई।
" कल के लिए भी सॉरी सर। ", वो हल्की आवाझ मे बोली।
चारू को शर्मिंदा देख अमर की आंखे नर्म पड गई।
" चलो निकलो ! क्लास मे देरी नही होनी चाहिए। "
चारू ने तेजी से सर हिलाया और भाग गई।
"दिस किड ! अ हैल लोट ऑफ आ केओज। " , अमर अपनी कनपटी सहलाते हुए बोला।
क्रमशः