एक पल में सब कुछ बदल जाता है। यह बात मीरा ने आज तक सिद्धांत में जानी थी। अब व्यवहार में समझ आई।
"लैपटॉप," अर्जुन ने कहा , एक शब्द, मुश्किल से फुसफुसाहट। मीरा पहले से उठा चुकी थी। अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ इशारा किया , बगल की दीवार के साथ एक जगह थी, मुश्किल से दिखती, एक भंडारण कोने जैसी। दोनों उसमें घुस गए। लैपटॉप बंद किया , एलईडी भी बंद हो गई।
अंधेरा।
कदमों की आहट आई , नपे-तुले, पेशेवर। तीन लोग। शायद चार। मीरा ने साँस रोककर गिनने की कोशिश की।
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वो कमरे में आए। रुके। कोई बोला नहीं , वो भी नहीं बोलते थे जैसे प्रशिक्षित थे चुप्पी में काम करने के लिए। एक टॉर्च की किरण घूमी , दीवारों पर, मेज़ पर, फर्श पर।
लैपटॉप वहाँ नहीं था , मीरा के हाथ में था। मेज़ खाली थी।
किरण रुकी। एक पल। दो पल।
फिर कदम वापस गए , गलियारे में, आगे की तरफ। दूसरा कमरा जाँचने।
मीरा ने साँस ली , धीमी, संयमित। अर्जुन का हाथ संक्षेप में उसकी बाँह पर आया , रुको , फिर हट गया। दोनों जानते थे: निकलने का वक्त अभी नहीं था।
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तीन मिनट। सबसे लंबे तीन मिनट।
फिर अर्जुन ने हिलना शुरू किया , कोने से बाहर, गलियारे की तरफ। बाईं तरफ नहीं , जहाँ वो गए थे। दाईं तरफ। वापस प्रवेश द्वार की तरफ।
मीरा ने पीछा किया। लैपटॉप कसकर पकड़ा था।
गलियारे में हरी आपातकालीन पट्टियाँ थीं , तेज़ चलने के लिए काफी, विवरण देखने के लिए नहीं। वो तेज़ी से चले , दौड़ नहीं, लेकिन लगभग। हर दरवाज़े के पास एक पल का ठहराव , आवाज़ जाँच।
प्रवेश द्वार दिखा। वही दरवाज़ा जिसे अर्जुन ने हाथ से खोला था।
बंद था। और अब इलेक्ट्रॉनिक ताला हरा था , चालू। किसी ने बिजली वापस कर दी थी।
"वैकल्पिक निकास," मीरा ने कहा , यह सवाल नहीं था।
"ढूँढना पड़ेगा।" अर्जुन ने बगल के गलियारे में देखा।
"ढूँढने का वक्त नहीं है।" मीरा ने लैपटॉप खोला , काली स्क्रीन। उसने बटन दबाया। बूट क्रम , बहुत धीमा, बहुत धीमा,
"क्या कर रही है?"
"इस इमारत का नक्शा इस तंत्र में होगा। शोध सुविधाओं में हमेशा आंतरिक रेखाचित्र होते हैं , सुरक्षा नियमों के लिए।"
स्क्रीन आई। फ़ाइल संरचना। उसने तेज़ी से नेविगेट किया , फ़ोल्डर, उपफ़ोल्डर,
"उन्हें सुन सकती हूँ वापस आ रहे हैं," अर्जुन ने कहा।
"30 सेकंड।"
"मीरा",
"20 सेकंड।"
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फ़ाइल मिली। FACILITY_LAYOUT_2061_ORIGINAL.pdf। उसने खोला। ज़ूम किया। भूतल। आपातकालीन निकास , तीन।
मुख्य प्रवेश द्वार। और,
उप-तहखाना प्रवेश। सुरंग तंत्र। विरासत क्षेत्र जल निकासी जाल से जुड़ा , निकास बिंदु 2.3 किलोमीटर पूर्व।
"उप-तहखाना," उसने अर्जुन को बताया। "सुरंग है। यहाँ से निकलती है विरासत क्षेत्र में।"
"उप-तहखाना कहाँ है?"
"इस गलियारे के अंत में , एक रखरखाव दरवाज़ा होगा। धूसर। B-4 क्रमांकित।"
कदमों की आहट। और करीब। वो आ रहे थे।
दोनों भागे , ठीक से इस बार, दिखावा खत्म। गलियारे के अंत तक। धूसर दरवाज़ा। B-4। अर्जुन ने हैंडल खींचा , बंद। उसने औज़ार निकाला , हाथ थोड़े काँप रहे थे, पहली बार।
"जल्दी," मीरा ने कहा , अनावश्यक रूप से, वो जानता था।
ताला क्लिक किया। दरवाज़ा खुला। अंदर , खड़ी सीढ़ियाँ, नीचे जाती। अंधेरा। और वो गंध , नाली, पुराना सीमेंट, और कुछ और जो पहचानना मुश्किल था।
दोनों नीचे उतरे। दरवाज़ा बंद किया , पीछे।
ऊपर से आवाज़ें आईं , आदेश, आग्रहपूर्ण। उन्होंने दरवाज़ा ढूँढ लिया।
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सुरंग में फ़ोन की टॉर्च थी , बमुश्किल काफी। अर्जुन आगे था। मीरा ने लैपटॉप कसकर पकड़ा , यह डेटा अभी किसी भी चीज़ से ज़्यादा महत्वपूर्ण था।
200 मीटर। 400। पानी था , टखने तक, ठंडा। वो चले। रुके नहीं।
पीछे दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई , उन्होंने ढूँढ लिया।
"तेज़ी से," अर्जुन ने कहा , अनावश्यक, लेकिन सुनना अच्छा लगता है।
600 मीटर। 800। सुरंग में एक मोड़ था , मीरा ने मानसिक रूप से नक्शा याद किया।
"बाईं तरफ," उसने कहा।
बाईं ली। 400 मीटर और। फिर , ऊपर जाती सीढ़ियाँ। एक भारी जाली। अर्जुन ने धकेला , अटी थी, ज़ंग लगी। उसने कंधा लगाया। एक बार। दो बार।
खुली।
बाहर , धूसर सुबह की रोशनी। विरासत क्षेत्र की एक गली। जानी-पहचानी आवाज़। जाना-पहचाना शोर। जानी-पहचानी उथल-पुथल।
दोनों बाहर निकले। अर्जुन ने जाली वापस की , धीरे से। दोनों एक दीवार के साथ खड़े रहे , साँस ले रहे थे।
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तीन मिनट बाद वो एक चाय की दुकान में थे , अलग वाली, पहली वाली से दूर। अर्जुन ने बिना पूछे दो कप मँगवाए ।
मीरा ने आपत्ति नहीं की।
लैपटॉप मेज़ पर था , बंद। 47 विषय। प्रिया। मीरा का अपना नाम।
"वो लोग जानते हैं मैं कौन हूँ," मीरा ने कहा। "मेरे घर का पता उनके पास होगा। मेमवॉल्ट पंजीकरण से।"
"हाँ।"
"मतलब रिया" ,
"श्रीमती कपूर के पास है। अभी सुरक्षित।" अर्जुन ने सीधे कहा। "लेकिन हाँ , घर वापस जाना ठीक नहीं है।"
मीरा ने कप पकड़ा , गर्म था। असली था। उसने सोचा , रिया की चाय। तीन कप। समान गंभीरता से परोसे गए।
फिर उसने एक फैसला लिया। वो वाला नहीं जो व्यावहारिक था। वो वाला जो , सही था।
"सुविधा 7। वहाँ जाना पड़ेगा। प्रिया को वापस लाना पड़ेगा , और बाकी 46 लोगों को भी।"
अर्जुन ने पहली बार ठीक से उसकी तरफ देखा , जैसे आकलन कर रहा हो। फिर:
"तुझे पता है सुविधा 7 कहाँ है?"
"नहीं।" मीरा ने लैपटॉप खोला। "लेकिन शायद यह जानता है।"
स्क्रीन पर वो फ़ोल्डर था अभी भी , विषय: X-7-R-9।
उसने स्क्रॉल किया। फ़ाइलों के अंदर फ़ाइलें। और एक फ़ोल्डर जो उन्होंने पहली बार उस अफरातफरी में छोड़ दिया था:
सुविधा_स्थान , गोपनीय।
पासवर्ड संरक्षित।
मीरा ने अर्जुन की तरफ देखा। "तू ताला खोल सकता है। मैं तंत्र तोड़ सकती हूँ।" उसने एक पल रुककर कहा। "संकेत को ढूँढना होगा।"
अर्जुन ने पहली बार , पूरी कहानी में पहली बार , कुछ ऐसा किया जो लगभग मुस्कान जैसा था।
"संकेत खुद हमें ढूँढ लेगा। हम वो लैपटॉप लेकर चल रहे हैं , वो पहले से जानता होगा कि यह तंत्र तक पहुँचा गया।"
बाहर विरासत क्षेत्र का शोर था। होलोग्राम टिमटिमाते थे। ज़िंदगी अपनी रफ्तार से चलती रही।
मीरा के हाथ में एक चुराया हुआ लैपटॉप था। उसके नाम के साथ एक फ़ाइल थी। उसकी यादें किसी और के पास थीं। और वो घर नहीं जा सकती थी।
लेकिन , और यह नया था , उसने डर बिल्कुल महसूस नहीं किया।
कुछ और था। वो एहसास जब टुकड़े एक दिशा में बढ़ने लगते हैं। जब भ्रम उद्देश्य में बदल जाता है।
कुछ लोग इसे दृढ़ संकल्प कहते हैं।
मीरा ने इसे कुछ नहीं कहा। बस महसूस किया।
और चाय पी।