उसकी साया !! - 2 Anjali kumari Sharma द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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उसकी साया !! - 2

खौफनाक समझौता
मल्हार के पैरों तले जमीन खिसक गई जब उसने देखा कि वह साया आइने की कांच जैसी सतह को पानी की तरह चीरकर बाहर निकल रहा था। साये का हाथ, जो अब लगभग असली लग रहा था, मल्हार के गले की तरफ बढ़ा।
मल्हार ने फुर्ती दिखाई और पास रखे एक भारी पीतल के लैंप को उठाकर आइने पर दे मारा।
'कड़कड़ाहट...' के साथ आइना चकनाचूर हो गया। कमरे में एक चीख गूँजी, जो किसी इंसान की नहीं बल्कि हवा के फटने जैसी थी। वह साया पल भर के लिए धुएं में बदल गया और कमरे के अंधेरे कोनों में सिमट गया।

वह रहस्यमयी संदूक
साये के ओझल होते ही मल्हार की नजर कमरे के एक कोने में पड़ी, जहाँ एक छोटी लकड़ी की संदूक रखी थी। अजीब बात यह थी कि पूरी हवेली धूल से सनी थी, लेकिन वह संदूक बिल्कुल साफ थी, जैसे उसे रोज कोई साफ़ करता हो।
मल्हार ने संदूक खोली। अंदर कोई सोना-चांदी नहीं, बल्कि एक पीली पड़ चुकी पुरानी चिट्ठी और एक तांबे का अजीब सा ताबीज था। उसने कांपते हाथों से चिट्ठी पढ़ना शुरू किया:
"जो भी इसे पढ़ रहा है, भाग जाओ! यह हवेली सिर्फ पत्थरों का ढांचा नहीं, एक जाल है। यहाँ की मिट्टी में 'छाया-भक्षक' का वास है। वह पहले तुम्हारी परछाईं चुराता है, फिर तुम्हारी यादें, और अंत में तुम्हारा अस्तित्व। अगर सूरज उगने से पहले तुमने अपनी परछाईं को वश में नहीं किया, तो तुम भी इस दीवार की एक पेंटिंग बनकर रह जाओगे।"

चिट्ठी के नीचे एक चेतावनी और लिखी थी: "नीली रोशनी के पीछे मत जाना, वह मौत का बुलावा है।"
नीली रोशनी का सम्मोहन
तभी, कमरे के फर्श की दरारों से वही रहस्यमयी नीली रोशनी फिर से फूटने लगी। इस बार वह रोशनी एक धुंध की तरह मल्हार को घेरने लगी। उसे अपने दिमाग में अजीब-अजीब आवाजें सुनाई देने लगीं—उसके बचपन की यादें, कॉलेज के दिन, और वह अनजाना शहर जहाँ वह अपनी पहचान बनाने आया था। उसे महसूस हुआ कि उसकी यादें धीरे-धीरे धुंधली हो रही हैं।
उसे अपनी माँ का चेहरा याद करने में दिक्कत होने लगी। वह साया उसकी यादें निगल रहा था!
मल्हार ने तुरंत वह तांबे का ताबीज गले में डाल लिया। जैसे ही ताबीज उसके सीने से छुआ, उसे एक जोरदार बिजली का झटका लगा और नीली रोशनी पीछे हट गई।

परछाईं का नया रूप
तभी उसने खिड़की के बाहर देखा। चाँद बादलों के पीछे छुप गया था, लेकिन कमरे में बिना किसी रोशनी के भी एक परछाईं बन रही थी। वह परछाईं मल्हार की नहीं थी। वह एक लंबे, डरावने साये की थी जिसके हाथ लंबे नाखून वाले थे और वह छत से उल्टा लटका हुआ मल्हार को देख रहा था।
उसने महसूस किया कि वह अकेला नहीं था। हवेली में ऐसे सैकड़ों साये थे जो अब दीवारों से बाहर निकल रहे थे।

अधूरी रूहों का गाँव
ताबीज पहनते ही मल्हार को महसूस हुआ कि उसके चारों ओर एक अदृश्य कवच बन गया है, लेकिन दीवारों से निकलते हुए वे साये अब और भी हिंसक हो रहे थे। वे फुसफुसा रहे थे, ऐसी भाषा में जो मल्हार ने कभी नहीं सुनी थी, फिर भी उसे उनका दर्द महसूस हो रहा था।
गाँव का खौफनाक सच
तभी उसे हवेली के पिछले हिस्से से एक खिड़की खुली दिखी। बिना सोचे-समझे मल्हार उस खिड़की से बाहर कूद गया। बाहर अंधेरी घाटी का सन्नाटा पसरा था। वह भागते हुए गाँव की बस्ती की ओर पहुँचा, इस उम्मीद में कि कोई उसकी मदद करेगा।
उसने एक घर का दरवाजा पीटा। "बचाओ! कोई है? दरवाजा खोलो!"
अंदर से एक बूढ़ी औरत की आवाज आई, "चले जाओ यहाँ से! अगर तुम्हारी परछाईं तुम्हारे साथ नहीं है, तो तुम हमारे लिए भी खतरा हो।"
मल्हार ने चिल्लाकर कहा, "मैं इंसान हूँ, कोई साया नहीं! देखिए, मेरे पास यह ताबीज है।"
'ताबीज' का नाम सुनते ही दरवाजा थोड़ा सा खुला। एक बूढ़ी औरत, जिसकी आँखें सफेद मोतियाबिंद से भरी थीं, बाहर झाँकी। उसने मल्हार का ताबीज देखा और उसके चेहरे पर खौफ छा गया। उसने मल्हार को झटके से अंदर खींच लिया और दरवाजा बंद कर दिया।


सायों का बाजार
"यह ताबीज..." वह औरत कांपती आवाज में बोली, "यह रक्षक नहीं है बेटा, यह 'निशानी' है। इस ताबीज का मतलब है कि तुमने उस साये के साथ समझौता करने की शुरुआत कर दी है। यह तुम्हें मरने नहीं देगा, लेकिन तुम्हें कभी आजाद भी नहीं होने देगा।"
मल्हार ने हांफते हुए पूछा, "इस गाँव के लोग रात को बाहर क्यों नहीं निकलते? और मेरी परछाईं कहाँ है?"
बुढ़िया ने एक मोमबत्ती जलाई और दीवार की तरफ इशारा किया। दीवार पर उस बुढ़िया की अपनी परछाईं भी गायब थी।

"इस गाँव का हर शख्स अपनी परछाईं उस हवेली को दान कर चुका है। बदले में हमें लंबी उम्र मिली, लेकिन हम अब न तो पूरी तरह जिंदा हैं, न ही मर सकते हैं। जो साया तुम्हारी परछाईं लेकर गया है, वह अब तुम्हारी जगह लेना चाहता है। वह कल सुबह तुम्हारी शक्ल लेकर इस गाँव से बाहर निकल जाएगा और तुम... तुम यहीं इस अंधेरे में कैद रह जाओगे।"
खौफनाक अहसास
तभी घर की छत पर कुछ गिरने की आवाज आई। धम!
"वह आ गया है," बुढ़िया फुसफुसाई। "वह तुम्हारी यादों को पूरी तरह निगलने से पहले तुम्हारे शरीर में समाना चाहता है।"


मल्हार ने अपने हाथों की ओर देखा। उसकी उंगलियाँ धीरे-धीरे पारदर्शी (Transparent) हो रही थीं। वह गायब हो रहा था। उसकी अपनी त्वचा अब धुएं की तरह दिखने लगी थी।
अचानक, घर की मिट्टी की दीवार फटी और वही काला साया अंदर घुसा। लेकिन इस बार, उसका चेहरा धुंधला नहीं था। वह बिल्कुल मल्हार जैसा दिख रहा था। उसकी आँखों में वही चमक थी जो मल्हार की हुआ करती थी, जबकि असली मल्हार की आँखें अब काली और गहरी होती जा रही थीं।
उस साये ने मुस्कुराते हुए कहा, "तुम्हारी कॉलेज लाइफ, तुम्हारे सपने, वह अनजाना शहर... अब सब मेरा है। तुम बस एक 'साया' बनकर रहोगे।"

अब आगे क्या होने वाला है, ये जानने के लिए बने रहिए पार्ट -3 के लिए  इंतजार करिए ।।