दो पतियों की लाडली पत्नी - 37 Sonam Brijwasi द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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दो पतियों की लाडली पत्नी - 37

घर का ड्रॉइंग रूम। परदे बंद। धूप का एक किरण भी अंदर नहीं। हवा भारी है। सन्नाटा गहरा।
Kabir दरवाज़े के पास खड़ा है। थका हुआ… पर नींद नहीं। डर, जिम्मेदारी और प्यार तीनों उसके कंधों पर बैठे हैं।

BEDROOM – DAY

Shreya बिस्तर पर बैठी है। घुटनों को सीने से लगाकर। बाल बिखरे हुए। आँखें लाल।

Shreya (धीमी पर टूटी आवाज़ में) बोली - 
Kabir जी… वो यहीं है… मुझे देख रही है…मुझे मार देगी…।

Kabir (उसके पास बैठकर, धीरे से) बोला - 
कौन Shreya? कौन? Batao mujhe… main hoon na yahin."

Shreya काँपते हुए बोली - 
वो… मेरे जैसी है… पर उसके कपड़े काले… उसकी आंखों में खून… वो हंसते हुए… मुझे देख रही है…।

Shreya अचानक गुस्से से कांपने लगती है, उसकी साँसें तेज़ हो जाती हैं।

FLASHBACK (Kabir की सोच)

Kabir को याद आता है कैसे Karan एक महीने तक यही सब झेलता रहा… अकेला… बिना किसी को बताए।

Kabir (मन ही मन) बोला - 
Karan भैया… आपने ये सब अकेले कैसे सहा?shreya को इस हालत में देखकर तो सांस रुक जाती है। आप कितने मजबूत थे... और मैं..

उसकी आँखें भर आती हैं।

LIVING ROOM – EVENING

Kabir घर के सारे शीशों पर मोटे पर्दे चढ़ा चुका है। एक भी आइना दिखाई नहीं देता।

Kabir (धीमी चिंता भरी आवाज़ में) बोला - 
Shreya… शीशे हमने हटा दिए। अब वो तुम्हे नहीं दिखनी चाहिए।

Shreya (हिस्टीरिकल होकर) बोली - 
नहीं! वो यहीं है!! शीशा नहीं चाहिए उसे… वो मेरे सामने… जीती जागती… खड़ी होती है।

Shreya अचानक दीवार की तरफ इशारा करती है और चिल्लाती है।

Shreya बोली - 
मत आ!! चली जा!! चली जा!!!

Kabir भागकर उसे पकड़ लेता है। Shreya रोते-रोते उसके सीने पर गिर जाती है।

KITCHEN – NIGHT

Kabir पानी भरकर ला रहा है, उसके हाथ काँप रहे हैं। आँखों में नींद नहीं, बस डर और थकान है।

(Back to Shreya)
वह ज़मीन पर बैठी है… अपनी हथेलियों से सिर पकड़कर।

दिन बीतते गए… पर Shreya की हालत और ख़राब होने लगी।
वह रात को सोती नहीं, बस दीवार को घूरती रहती।
कई बार वह किसी से बात करती रहती जैसे कोई उसी कमरे में हो।
अचानक वह हँस पड़ती, और अगले ही पल चिल्ला कर रोने लगती।

Kabir का हाथ पकड़कर कहती—
कबीर जी… वो मेरे पीछे खड़ी है…मुझे मत छोड़िए..।


Kabir हर पल उसके साथ रहता…
ना ऑफिस…ना आराम…ना नींद…बस Shreya।

BEDROOM – LATE NIGHT

Shreya धीरे-धीरे उठती है… उसकी आँखें कहीं और टिकी हैं, जैसे किसी को देख रही हो।

Shreya (फुसफुसाते हुए) बोली - 
मत आओ… मत आओ मेरे पास…।

उसका हाथ अपने आप उठता है जैसे किसी को दूर धकेल रही हो।
Kabir जाग जाता है।

Kabir बोला - 
Shreya? Shreya क्या हुआ?

अचानक Shreya तकिये के नीचे से कोई नुकीली चीज उठा लेती है—एक छोटा चाकू।

Kabir (चौंककर) बोला - 
Shreya! नीचे रखो उसे! क्या कर रही हो?!

Shreya (चिल्लाकर) बोली - 
वो मुझे मार देगी!! मुझे उससे बचाओ!!

Kabir उसके हाथों से चाकू छीन लेता है और उसे कसकर बाहों में पकड़ लेता है। Shreya काँपती रहती है।
Kabir को अब स्पष्ट एहसास हो रहा था—
Karan कितना टूटा होगा… कितना झेला होगा…
और Shreya को दोनों की इतनी ज़रूरत क्यों है।
Kabir अपने आँसू छिपाते हुए Shreya को थामे रहता है।

Kabir (मन में) बोला - 
Shreya… तुम्हारे बिना मैं अधूरा हूं।
पर तुम दोनों भाइयों को साथ चाहती हो…
पर मुझे डर लगता है… अगर करण भैया सच में दूर चले गए तो…

उसका दिल डर से जकड़ जाता है।

BEDROOM – NIGHT

कमरा अँधेरा। बस एक छोटी सी नाइट लाइट जल रही है। Shreya Kabir की गोद में सिर रखे सो रही है। उसकी साँसें असमान हैं।
Kabir उसकी पीठ सहला रहा है… लेकिन खुद अंदर से टूटा हुआ है।
उसकी आँखें लाल… नींद से नहीं, थकान और डर से।
Kabir धीरे-धीरे सोफे की तरफ जाता है और बैठते ही सर पकड़ लेता है।

Kabir (धीरे से खुद से) बोला - 
अब समझ आता है… करण भैया room से बाहर क्यों नहीं आते थे…
Shreya की हालत देखकर… कोई कैसे दूर जा सकता है?

उसकी आँखें भर आती हैं।

Kabir (हथेलियाँ चेहरे पर रखते हुए) बोला - 
ये सब भैया ने अकेला झेला… बिना किसी को बताए… बिना किसी सहारे के…और मैं?
मैं तो बस रात में टूट गया।

वह फर्श पर बैठकर अपनी टांगों को सीने से लगा लेता है, बिल्कुल उसी तरह जैसे Shreya डर में सिमट जाती थी।

HALLWAY – DIM LIGHT

Kabir दीवार से टेक लगाकर बैठा है।
Shreya का कमरा सामने है—उसकी हर हलचल Kabir सुन रहा है।
पर उसके मन में सिर्फ एक चेहरा…
Karan।
Kabir का दिल भारी है, आँखें नम।

Kabir (टूटी आवाज़ में) बोला - 
भैया… मैं आपके आपके पैरों में गिरकर माफी मांगना चाहता हूं।
मैं आपके सामने झुकना चाहता हूं।
आपको बोलना चाहता हूं कि मैं आपके बिना कुछ नहीं हूं।

वह अपनी मुट्ठियाँ भींच लेता है।

Kabir बोला - 
पर… अब झुकने में भी शर्म आ रही है।
आपने इतना कुछ झेला...और मैं आपको समझ ही नहीं पाया...।

उसकी आँखों से चुपचाप आँसू गिरते हैं।
वह उन्हें पोंछता भी नहीं।

FLASHBACK – Karan ke pal

Kabir की आँखों के सामने Karan के वो सभी पल घूमने लगते हैं—
Karan का रातों को जागना
Shreya की चीखों पर उसका घबराना
उसके सीने का दर्द
Karan का पति की तरह Shreya को पकड़े रखना
और फिर Kabir को एक शब्द कहे बिना दरवाज़ा बंद कर लेना।
Kabir का दिल दर्द से मचल उठता है।

BEDROOM – NIGHT

Shreya नींद में कराह रही है—Kabir दौड़कर फिर उसके पास जाता है।

Shreya उसके गले लगकर फुसफुसाती है—
Kabir ji… मुझे मत छोड़ना… वो आ जाएगी…।

Kabir उसका सिर सहलाता है, पर खुद टूट रहा है।

Kabir (धीमी आवाज़ में उसके बालों में हाथ फेरते हुए) बोला - 
Shreya… तुम मेरे बिना नहीं रह सकतीं…पर मैं ?
मैं अपने भैया के बिना कैसे रहूं?

उसका गला रुक जाता है।

Kabir बोला - 
Karan भैया ने सही बोला था…
आदत डाल ले, कल को मैं ना रहा, तो तू कैसे संभालेगा इसे ?

Kabir का सीना कसने लगता है… दर्द बढ़ता है…
वह गहरी साँस लेकर खुद को संभालता है ताकि Shreya न जाग जाए।

 LOBBY – LATE NIGHT

Kabir कमरे से बाहर आता है।
उसके कदम लड़खड़ा रहे हैं।
वह सोफे पर बैठता है और हाथों से चेहरा ढक लेता है।

Kabir (टूटी आवाज़ में) बोला - 
भैया… मुझे माफ कर दो…
मैं आपकी कदर नहीं कर पाया।
मैने हीरा गंवा दिया।

वह फर्श पर घुटनों के बल गिर जाता है।
पहली बार, Kabir पूरी तरह टूट चुका था।

KARAN’S ROOM – SAME TIME

उधर Karan भी अपने कमरे में अकेला लेटा है।)
उसके सीने में तेज़ दर्द उठ रहा है।
आँखें खुली हैं—नींद दूर तक नहीं।
Karan को भी महसूस हो रहा है—
Kabir ka डर, guilt, aur Shreya ka dard।
लेकिन वह खुद भी टूटा हुआ है…बहुत ज्यादा।

रात के 2 बजे।
कमरे में हल्का अँधेरा।
Karan पलंग के किनारे बैठा है, सिर पकड़कर गहरी साँसें ले रहा है।
सीने में दर्द उतर–चढ़ रहा है… पर चेहरे पर वही चुप्पी।
टिक… टिक… टिक…
घड़ी की आवाज कमरे में गूँज रही है।
अचानक—
ठक–ठक–ठक…
Karan का दिल एकदम जोर से धड़कता है।

HALLWAY – CONTINUOUS

दरवाज़ा खुलता है।
Karan आँखें उठाकर देखता है—
Kabir खड़ा है… टूटा हुआ, भीगा हुआ चेहरा… लाल आँखें…साँसें भारी।
एक पल के लिए Karan समझ ही नहीं पाता…
फिर Kabir अचानक उसके सीने से लिपट जाता है।

Kabir (टूटती हुई आवाज़ में, रोते हुए) बोला - 
भैया… भैया मैं गलत था…मुझे माफ कर दो…
मैं आपके जितना मजबूर कहीं नहीं था…
मुझे नहीं पता था आपने क्या - क्या झेला…

Kabir उसकी कमीज पकड़कर रोता है।
Karan पहले सुन्न… फिर उसका चेहरा नरम होने लगता है। Kabir अचानक Karan के घुटनों पर गिरता है।

Kabir (डरे हुए बच्चे की तरह) बोला - 
भैया… मैं बहुत बुरा हूं…
मैं आपके पैर भी छूने के लायक नहीं हूं…
पर Shreya… Shreya की हालत देखकर आज पता चला .... आपने सब कुछ अकेले झेला।

Kabir उसके पैरों को पकड़कर रोता है।
Karan उसे ऐसे देख रहा है जैसे एक बाप अपने छोटे बच्चे को टूटते देखता है।
उसका दिल एकदम पिघल जाता है।
वह Kabir को दोनों हाथों से उठाता है…
उसे सीने से लगा लेता है।

Karan (धीरे, बेहद नरमी से) बोला - 
पागल है क्या?
ऐसे पैर पकड़े हैं?
तू मेरा भाई है…मेरा बच्चा...मेरा राजा बाबू...।
चुप हो जा....अच्छे बच्चे नहीं रोते।

Kabir उसकी बाँहों में और जोर से रो पड़ता है।
Karan उसकी पीठ थपथपाता है, थोड़ी देर सिर्फ चुपचाप उसे पकड़े रहता है।
दोनों भाई धीरे-धीरे कमरे में दाखिल होते हैं।
कमरा शांत… पर एक भय की परछाई साफ महसूस होती है।
Shreya बिस्तर पर सो रही है।
उसका माथा पसीने से भीगा, साँसें असमान।
Kabir उसके पास घुटनों के बल बैठ जाता है।
Karan भी पास आता है… और Shreya को देखकर ठहर जाता है।
Shreya अचानक नींद में करवट बदलती है… उसके होंठ काँपते हैं।

Shreya (नींद में बड़बड़ाते हुए, काँपती आवाज़ में) बोली - 
वो… वो मुझे मार डालेगी…
Kabir ji… Karan ji…वो मुझे मार डालेगी…।
वही… मेरी तरह… काले कपड़े… लाल आँखें...।

Kabir का दिल कस जाता है।
Karan का चेहरा सफेद पड़ जाता है।
Kabir तुरंत Shreya का हाथ पकड़ लेता है।

Kabir (धीमे से, उसके बाल सहलाते हुए) बोला - 
Shreya… मैं हूं… कोई नहीं आएगा…।

Karan चुपचाप Shreya की हालत देख रहा है—गहरी नज़र से।
उसकी आँखों में वही दर्द लौट आता है…
जो एक महीना पहले हर रात जलता था।

Karan (धीमे, टूटी हुई आवाज़ में) बोला - 
इसी तरह रोती थी मेरे पास भी…
इसी तरह चीखती थी…कभी कभी नाखून भी गाढ़ देती थी।

Kabir उसकी तरफ देखता है—पछतावे, प्यार और शर्म का मिश्रण।
Karan आगे बढ़कर Shreya के माथे को हल्के से छूता है। उसका हाथ कम्पन से भरा हुआ है।
Shreya हल्का सा शांत होती है… उसकी साँसें थोड़ी बराबर होने लगती हैं।
Kabir और Karan— दो भाई—
बिस्तर के दोनों तरफ बैठे हैं…
दोनों की आँखें नम…और उनके बीच में Shreya—
टूटी हुई, डरी हुई, और दोनों पर निर्भर।

Kabir (धीरे से, लगभग फुसफुसाते हुए) बोला - 
भैया…हम दोनों की जरूरत है इसे…
अकेले कोई भी नहीं संभल सकता इसे…

Karan चुप रहता है…बस अपनी आँखें बंद कर लेता है, क्योंकि Kabir ने पहली बार वही सच बोला था जो उसे महीनों से खाए जा रहा था।