दो पतियों की लाडली पत्नी - 53 Sonam Brijwasi द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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दो पतियों की लाडली पत्नी - 53

तीन दिन हो चुके थे। तीनों एक ही घर में थे, एक ही छत के नीचे, पर दिलों के बीच की दूरी किसी खाई से कम नहीं थी।

कबीर और करण आमने-सामने आते तो औपचारिक-सी बातचीत करते,ज़रूरत भर के शब्द, बिना आँखों में देखे। दोनों जानते थे कि दर्द दोनों के पास है, पर कोई भी पहले हाथ बढ़ाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।

घर में अजीब-सी खामोशी रहती।
कभी-कभी ऐसा लगता, जैसे दीवारें भी साँस रोककर सुन रही हों। वहीं श्रेया यह सब देख रही थी। उसका दिल सबसे ज़्यादा टूट रहा था।

उसे साफ़ दिखता था करण उसके सामने होते हुए भी अकेला है। उसकी आँखों के नीचे गहरे साए,
रातों की नींद गायब, और हर मुस्कान के पीछे छिपा हुआ अपराधबोध।

श्रेया (मन ही मन) बोली - 
वो मेरे पास हैं… फिर भी मुझसे कितना दूर हैं।
मैं चाहकर भी उनके पास नहीं जा पा रही।

कई बार उसका मन करता कि जाकर बस उसका हाथ पकड़ ले, बिना कुछ बोले उसके पास बैठ जाए, जैसे पहले बैठ जाया करती थी। पर हर बार उसके कदम रुक जाते। डर…बीता हुआ डर,और आने वाले कल का डर।

एक शाम करण बालकनी में खड़ा था।
शहर की रोशनियाँ देख रहा था, पर आँखें खाली थीं।

श्रेया (धीमे से) बोली - 
करण जी…

करण ने पलटकर देखा। आवाज़ सुनते ही उसके चेहरे पर हल्की-सी घबराहट आ गई।

करण बोला - 
हाँ…?

श्रेया बोली - 
आप ठीक हो?

करण हल्का-सा मुस्कुराया, वही झूठी मुस्कान।

करण बोला - 
हाँ… मैं ठीक हूँ।

श्रेया जानती थी वह ठीक नहीं है। वह दो क़दम आगे बढ़ी, फिर रुक गई।

श्रेया बोली - 
अगर… अगर आपको कभी लगे कि बात करनी है…
तो मैं… मैं सुन लूँगी।

करण की आँखें भर आईं, पर उसने तुरंत नज़रें फेर लीं।

करण बोला - 
तुम्हें आराम करना चाहिए।
तुम्हें परेशान नहीं होना चाहिए।

श्रेया (आँखों में नमी लिए) बोली - 
पर मुझे आपकी चिंता है।

करण कुछ नहीं बोला। बस सिर झुका लिया। उस पल श्रेया को सबसे ज़्यादा यह समझ आया। वो जिस आदमी से डरती थी, आज वही आदमी खुद से डर रहा था।

और दूसरी तरफ़, कबीर अपने कमरे में बैठा सब महसूस कर रहा था। उसे पता था कि श्रेया किस उधेड़बुन में है, और करण किस हाल में।

कबीर(खुद से) बोला - 
हम तीनों एक ही घर में हैं…पर शायद सबसे ज़्यादा दूर भी हम ही हैं।

उस रात कोई रोया नहीं, पर तीनों की आँखें देर तक खुली रहीं। तीन दिल,तीन तरह का दर्द,और एक ही सवाल क्या टूटे रिश्ते फिर से जुड़ पाएँगे,या ये दूरी हमेशा के लिए रह जाएगी?

उस रात श्रेया का दिल अजीब तरह से भारी हो रहा था। वह बिस्तर पर लेटी थी, पर नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। उसका मन बार-बार उसी रात में अटक जा रहा था। उसी पल में…जब उसे अपने चारों ओर अजीब-सी गर्माहट महसूस हुई थी।

श्रेया (मन ही मन) बोली - 
कितनी अजीब बात है… उस रात की गर्माहट आज भी महसूस होती है।

फिर अचानक दर्द की याद कौंध गई। पेट का दर्द…शरीर का टूटना…और मन का डर। उसका शरीर सिहर गया। वह सहम गई।

श्रेया (कांपती हुई) बोली - 
नहीं… नहीं… वो दर्द…

उसने खुद को बाँहों में समेट लिया।साँसें तेज़ हो गईं।
पर उसी के साथ एक और याद उभर आई। जब वह दर्द में थी…बिलकुल टूट चुकी थी…और करण ने उसे संभाला था। उसे याद आया रात के सन्नाटे में करण का बार-बार उठना, कभी पानी लाना, कभी दवा देना,
कभी बस उसके सिरहाने बैठकर उसे देखते रहना।

करण (यादों में) बोला - 
श्रेया… आँखें खोलो… मैं यहीं हूँ।
कुछ नहीं होगा… मैं हूँ न…

श्रेया की आँखें भर आईं। उसे याद आया जब वह पूरी रात दर्द से तड़पती रहती थी, तो करण कैसे अपने आँसू छिपके उसे सीने से लगाए रखता था। कैसे वह खुद भी रोता था…पर श्रेया को कभी महसूस नहीं होने देता।

श्रेया (मन में टूटती हुई) बोली - 
वो भी तो कितना रोए थे…मैं अकेली नहीं थी उस दर्द में।

उसे याद आया कई बार करण की हथेलियाँ काँपती थीं, उसकी आवाज़ भर्रा जाती थी, पर फिर भी वह हिम्मत करता था।

करण (यादों में बुदबुदाता हुआ) बोला - 
बस थोड़ा सा और सह लो…अगर तुम्हें कुछ हो गया
तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगा…

श्रेया ने तकिए में मुँह दबा लिया। अब उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके आँसू किस लिए हैं डर के लिए,
दर्द के लिए, या उस आदमी के लिए जो खुद टूटकर भी उसे जोड़ने की कोशिश करता रहा।

श्रेया (धीमी आवाज़ में) बोली - 
मैं कैसे भूल जाऊँ वो सब…जहाँ डर भी था…और उसी डर के बीच किसी का बेइंतहा ख्याल भी…।

कमरे में सन्नाटा था। पर श्रेया के भीतर शोर मचा हुआ था। एक तरफ़ डर, दूसरी तरफ़ एहसान, और बीच में…वो उलझा हुआ प्यार। जो उसे चैन से साँस भी नहीं लेने दे रहा था। रात और गहरी हो गई। पर श्रेया की आँखों से नींद और भी दूर चली गई।

कमरे में हल्की-सी रोशनी थी। श्रेया बिस्तर पर अकेली पड़ी थी। उसने नज़र उठाकर सामने देखा। सोफ़े पर करण सो रहा था। उसका शरीर सिकुड़ा हुआ था,
जैसे नींद में भी वह खुद को समेटे रखना चाहता हो।
श्रेया की आँखें भर आईं। वह बिस्तर की उस खाली साइड को देखने लगी जहाँ कभी करण सोया करता था।

वही जगह…जहाँ उसकी साँसों की गर्माहट होती थी।
जहाँ रात भर कोई जागकर उसे संभालता था। जहाँ दर्द के हर झटके पर किसी की हथेली उसका माथा सहलाती थी। किसी के होठ उसे चूमकर शांति देते थे।

श्रेया (मन ही मन) बोली - 
यहीं तो सोते थे आप…यहीं से कहते थे - डरो मत… मैं हूँ।

उसका सीना भारी होने लगा। साँसें गहरी हो गईं। उसे एहसास होने लगा कि उस रात की कहानी उतनी सीधी नहीं थी जितनी वह खुद को समझा रही थी।

श्रेया (आँखें मूँदकर) बोली - 
गलती… सिर्फ़ करण जी की नहीं थी।

उसके मन में एक-एक परत खुलने लगी। वह याद करने लगी कि करण कितने दिनों से टूटा हुआ था।
कैसे वह हँसने की कोशिश करता था पर उसकी आँखें हर बार झूठ पकड़ लेती थीं। कैसे वह सबसे बड़ा होकर भी सबसे ज़्यादा अकेला था।

श्रेया (खुद से) बोली - 
वो हालात…वो दबाव…वो डर कि कहीं सब कुछ हाथ से न निकल जाए…

उसकी नज़र फिर से सोफ़े पर सोए करण पर चली गई। वह नींद में भी बेचैन था। उसकी भौंहें सिकुड़ी हुई थीं। जैसे सपनों में भी वह खुद से लड़ रहा हो। श्रेया का दिल और भारी हो गया।

श्रेया (काँपती आवाज़ में) बोली - 
आप इतने टूट चुके थे…कि खुद पर काबू ही नहीं रहा।

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह धीरे-धीरे बिस्तर से उठी और सोफ़े के पास जाकर रुक गई। वह नीचे बैठ गई। बहुत धीरे से, डरते हुए जैसे ज़रा-सी आवाज़ से कोई सपना टूट जाएगा।
उसने करण के चेहरे को देखा। वही चेहरा जो कई रातों तक उसके दर्द के आगे ढाल बनकर खड़ा रहा था।

श्रेया (मन में) बोली - 
अगर आप इतने मजबूर न होते…अगर हालात ने आपको इतना न तोड़ा होता…

उसके होंठ काँप गए। वह समझने लगी थी कि इंसान कभी-कभी बुरा इसलिए नहीं बनता क्योंकि वह बुरा है, बल्कि इसलिए क्योंकि वह बहुत ज़्यादा टूट चुका होता है।

श्रेया ने आँखें पोंछीं। वह जानती थी कि जो हुआ, वो सही नहीं था। दर्द सच था। डर भी सच था। पर अब उसे ये भी समझ आ रहा था। कि उस दर्द के पीछे एक ऐसा इंसान था जो खुद अंदर से बिखर चुका था।

श्रेया (धीमी आवाज़ में, लगभग फुसफुसाते हुए)बोली -
काश…मैं आपका दर्द थोड़ा और समझ पाती…

कमरे में फिर सन्नाटा छा गया। सोफ़े पर करण सोया रहा। बिस्तर पास ही था। और इन दोनों के बीच खामोशी में बहुत-सी अनकही बातें जिंदा थीं।

श्रेया का मन रो पड़ने को कर रहा था। आँखों में आँसू भरे थे, सीना फटा जा रहा था, पर वह रो भी नहीं सकती थी। क्योंकि अगर वह रोती तो करण जाग जाता। और इस वक़्त वह उसे जगा नहीं सकती थी।

वह बहुत देर तक वहीं खड़ी रही। कभी करण के चेहरे को देखती, कभी अपनी काँपती उँगलियों को। फिर जैसे हिम्मत जुटाकर वह धीरे-धीरे सोफ़े के पास झुकी।
वही सोफ़ा जिस पर करण सो रहा था। श्रेया ने बेहद सँभलकर खुद को उसके पास सरकाया। इतना धीरे,
जैसे किसी टूटे हुए सपने के पास कदम रख रही हो।
फिर वह उसी सोफ़े पर करण के सीने के पास लेट गई।
उसने अपना चेहरा उसकी शर्ट में छुपा लिया।

श्रेया (मन ही मन) बोली - 
बस… थोड़ी देर…

वह सिसकना चाहती थी, पर सिसकी भी नहीं ले पाई।
डर था कि कहीं उसकी साँसों की आवाज़ से करण जाग न जाए। उसका पूरा शरीर अकड़ा हुआ था। दिल बहुत तेज़ धड़क रहा था। पर धीरे-धीरे करण के सीने की गर्माहट उस तक पहुँचने लगी।

उसकी साँसों की लय श्रेया की धड़कनों से टकराने लगी। उसकी जानी-पहचानी खुशबू वही जो हर मुश्किल रात में उसे थाम लेती थी। श्रेया की आँखें अपने आप बंद हो गईं।

श्रेया (मन में, टूटती हुई आवाज़) बोली - 
डर लग रहा है…बहुत ज़्यादा…

पर उसी पल उसका डर धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगा।
क्योंकि वह जानती थी वह जैसा भी था, टूटा हुआ, ग़लतियों से भरा पर उससे बेहद प्यार करता था। वह उसका पति था।

वही इंसान जो दर्द में सबसे पहले जागता था। वही जो खुद टूटकर भी उसे संभालता रहा। श्रेया की पकड़
अनजाने में उसकी शर्ट पर थोड़ी कस गई।

जैसे वह कह रही हो—
मत जाना…अभी नहीं…

करण नींद में ही हल्का-सा हिला। उसकी साँस गहरी हुई। अनजाने में उसका हाथ श्रेया के कंधे के पास आकर रुक गया। पूरी तरह नहीं, बस इतना कि वह वहाँ है यह एहसास देने के लिए। श्रेया का दिल थोड़ा शांत हुआ। डर अब भी था, दर्द भी था, उलझन भी थी।
पर उस पल उसकी गर्माहट में उसे थोड़ी-सी सुरक्षा मिल गई। वह वहीं चुपचाप लेटी रही। बिना रोए। बिना बोले। बस उस साँस के सहारे।

जो कह रही थी—
मैं यहाँ हूँ।