प्रेरणास्पंदन - 10-11 Bhupendra Kuldeep द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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प्रेरणास्पंदन - 10-11

अध्याय:10 

अमर सपने और सेवा का संकल्प 

 

                 मनुष्य के जीवन में सपनों का महत्व केवल एक लक्ष्य तकपहुँचने का नहीं, बल्कि व्यक्तित्व को गढ़ने का होता है। अक्सर ऐसा होताहै कि हम बड़े चाव से कोई सपना देखते हैं, उसके लिए कड़ी मेहनत करतेहैं, लेकिन समय और परिस्थितियों के चक्र में फँसकर वह सपना कहींपीछे छूट जाता है। परंतु क्या सपना वास्तव में कभी मरता है? सत्य तो यहहै कि यदि उद्देश्य पवित्र हो, तो नियति उसे पूरा करने का अवसर अवश्यप्रदान करती है। यह कहानी वायनाड की एक साहसी महिला, एन.एस. विजया कुमारी की है, जिनका जीवन हमें सिखाता है कि सेवा का जज़्बाउम्र और समय की सीमाओं से परे होता है।

विजया कुमारी आज 57 वर्ष की हैं और एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूपमें समाज की सेवा कर रही हैं। लेकिन आज से लगभग 34 वर्ष पहले, उन्होंने एक युवा मन से पुलिस बल में भर्ती होने का सपना देखा था। उन्होंनेकठिन प्रशिक्षण लिया, परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं और उन्हें नियुक्ति पत्र भी मिलगया था। परंतु उस समय के सामाजिक परिवेश और पिता की इच्छा केकारण उन्हें अपने उस सपने की बलि देनी पड़ी। वे पुलिस की वर्दी तो न पहन सकीं, लेकिन उनके भीतर लोगों की मदद करने और समाज सेवाकरने की जो अग्नि थी, वह कभी ठंडी नहीं हुई। वे सदैव ईश्वर से प्रार्थनाकरती थीं कि उन्हें एक ऐसा अवसर मिले जहाँ वे मानवता के लिए खुद कोसमर्पित कर सकें।

हाल ही में वायनाड में हुई भीषण भूस्खलन की त्रासदी ने जब पूरी दुनियाको झकझोर कर रख दिया, तब विजया कुमारी के भीतर की वही सेवाभावना जाग उठी। दुर्घटना की खबर सुनते ही वे बिना किसी संकोच केअपनी स्कूटी उठाकर घटनास्थल पर पहुँच गईं। उन्होंने स्थानीय पुलिस सेएक स्वयंसेवक (वॉलिंटियर) के रूप में कार्य करने का निवेदन किया। जहाँ बड़े-बड़े योद्धा भी विचलित हो रहे थे, वहाँ 57 वर्ष की इस महिला नेअदम्य साहस का परिचय दिया। उन्होंने आपदा के मलबे से लगभग 100 लोगों की सहायता की और अपनी जान की परवाह किए बिना 17 शवोंको बाहर निकाला।

विजया कुमारी का कार्य केवल बचाव तक सीमित नहीं था। उन्होंने उनक्षत-विक्षत अंगों को समेटा और उन्हें उनके परिजनों तक पहुँचाने में मददकी, जिसे देखकर किसी का भी कलेजा कांप जाए। यह कोई सामान्यसाहस नहीं था; यह उनके उस 34 साल पुराने सपने का पुनर्जन्म था जोसमाज की रक्षा करना चाहता था। राज्य शासन ने भी उनके इस अभूतपूर्वसेवा भाव को सराहा और उन्हें पुरस्कृत किया। विजया कुमारी की यहकहानी सिद्ध करती है कि वर्दी भले ही न मिली हो, लेकिन उनका चरित्रएक रक्षक से कम नहीं था।

 

सीख / नैतिक संदेश

इस अध्याय से हमें यह महान सीख मिलती है कि 'सपने कभी नहीं मरते'। परिस्थितियाँ या पारिवारिक कारण भले ही आपके मार्ग में बाधा बन जाएँ, लेकिन यदि आपके इरादे नेक हैं, तो प्रकृति आपको अपना लक्ष्य पूराकरने का दूसरा अवसर ज़रूर देती है। सफलता का अर्थ केवल पद प्राप्तकरना नहीं है, बल्कि उस पद के पीछे के मूल्यों को अपने जीवन में उतारनाहै। हमें निस्वार्थ भाव से समाज सेवा के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। याद रखें, ईश्वर आपके धैर्य की परीक्षा ले सकता है, लेकिन वह आपकीसच्ची भावना को कभी व्यर्थ नहीं जाने देता। 

अध्याय:11

ज्ञान का लेखन और गणेशोत्सव का रहस्य 

 

                 भारतीय संस्कृति में गणेश चतुर्थी का पर्व अत्यंत हर्ष औरउल्लास के साथ मनाया जाता है। हम सभी जानते हैं कि इस दिन भगवानश्री गणेश हमारे घरों में पधारते हैं और दस दिनों के उपरांत अनंत चतुर्दशीको हम उन्हें विदाई देते हैं। शास्त्रों के अनुसार, गणेश जी का आगमन औरप्रस्थान दोनों ही परम कल्याणकारी माने जाते हैं। इसके पीछे एक अत्यंतप्राचीन और रोचक पौराणिक कथा छिपी है, जो हमें ज्ञान, एकाग्रता औरभक्ति के गहरे अर्थ समझाती है। यह कथा उस समय की है जब महर्षिवेदव्यास जी को महान शास्त्रों की रचना करनी थी और उन्हें एक ऐसेलेखक की आवश्यकता थी जो उनके विचारों की गति के साथ तालमेलबिठा सके।

जब महर्षि वेदव्यास ने भगवान से अपनी इस आवश्यकता के लिए निवेदनकिया, तब उन्हें विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश को आमंत्रित करने का सुझावमिला। गणेश चतुर्थी के ही दिन महर्षि ने भगवान गणेश का सादर सत्कारकिया और उन्हें अपने निवास पर एक दिव्य आसन पर विराजमान होने काअनुरोध किया। यहीं से शास्त्रों के लेखन की वह अद्भुत प्रक्रिया आरंभ हुई, जिसने मानवता को ज्ञान का अनमोल खजाना दिया। महर्षि वेदव्यासशास्त्रों का वाचन करते रहे और बुद्धि के देवता श्री गणेश उन्हें निरंतरलिपिबद्ध करते रहे।

यह लेखन कार्य लगातार दस दिनों तक चलता रहा। इस दौरान महर्षिवेदव्यास ने ईश्वर की दिव्य लीलाओं और गीता के गूढ़ भावों का ऐसाअद्भुत वर्णन किया कि सुनने वाले और लिखने वाले दोनों ही भक्ति के रसमें डूब गए। कहा जाता है कि इन दिव्य भावों के आवेग के कारण भगवानश्री गणेश के शरीर का तापमान बढ़ने लगा और दसवें दिन, यानी अनंतचतुर्दशी तक उनका शरीर बुरी तरह तपने लगा। महर्षि वेदव्यास ने जब यहदेखा, तो उन्होंने भगवान की तपन को शांत करने के लिए उनके बदन परठंडी मिट्टी का लेप लगाया और उन्हें शीतल जल से स्नान कराया।

यही कारण है कि आज भी हम गणेश चतुर्थी पर प्रतिमा की स्थापना करतेहैं और दस दिनों तक भक्ति भाव से उनकी पूजा करने के बाद अनंतचतुर्दशी को जल में उनका विसर्जन करते हैं। मिट्टी की प्रतिमा और जलका यह संगम वास्तव में उसी पौराणिक घटना की याद दिलाता है जबभगवान के शरीर की तपन शांत की गई थी। यह उत्सव हमें यह भीसिखाता है कि जिस प्रकार गणेश जी ने पूर्ण एकाग्रता के साथ ज्ञान कोलिपिबद्ध किया, हमें भी अपने जीवन में ज्ञान का स्वागत करना चाहिएऔर अपने भीतर की बुराइयों को शांत कर समाज की भलाई के लिएकार्य करना चाहिए।

 

सीख / नैतिक संदेश

इस अध्याय से हमें यह शिक्षा मिलती है कि ज्ञान की प्राप्ति और उसकासंरक्षण ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए। भगवान गणेश काजीवन हमें सिखाता है कि बुद्धि और विवेक का उपयोग सदैव लोककल्याण के लिए करना चाहिए। जिस प्रकार गणेश जी ने महर्षि वेदव्यासके वचनों को बिना रुके लिखा, उसी प्रकार हमें भी अपने लक्ष्यों के प्रतिदृढ़निश्चयी और एकाग्र होना चाहिए। उत्सव केवल बाहरी रीति-रिवाजनहीं हैं, बल्कि वे हमें अपने भीतर की तपन यानी क्रोध और अहंकार कोशांत कर शीतल बनने की प्रेरणा देते हैं। सच्ची भक्ति वही है जो हमें एकबेहतर और सेवाभावी मनुष्य बनाए।

bhupendra kuldeep

9827153834

bhupendrakuldeep76@gmail.com