चलो दूर कहीं..! - 14 Arun Gupta द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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चलो दूर कहीं..! - 14

चलो दूर कहीं... 14

रवि के बेहोश होते ही प्रतीक्षा को लगा जैसे पावर कट हो गया हो.. उसका संपर्क रवि से टूट गया था। उसका हाल जानने के लिए वो व्याकुल थी लेकिन कोई चारा न था। दिन के उजाले में जिस जंगल में सबकुछ जीवंत था.. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सारी सृष्टि चलायमान है.. वही रात के अंधियारे में सुषुप्त और शांत था। न किसी जानवर का शोर, न पक्षियों की चहचहाहट.. गिरते झरने का शोर और पत्तों की फड़फड़ाहट... किसी निशाचर की भांति उस निशब्द सन्नाटे को चीरकर किसी पिशाच के अट्टहास का अहसास करा रहा था।

प्रतीक्षा झोपड़ी के अंदर उदास बैठी थी और अनाह बाहर बैठा था। रवि के प्रति अनाह के व्यवहार से वह काफी दुखी थी.. अब उसे अनाह से डर लगने लगा था। उसे विश्वास हो चला था कि अनाह आदमी नहीं है ये जरूर कोई भूत प्रेत है। मैं क्या करुं कैसे इससे छुटकारा पाऊं.. क्या ये आसानी से मुझे अपने चंगुल से मुक्त कर सकता है.. हरगिज नहीं। अभी वह सोच ही रही थी कि अनाह अंदर आया और उसके समीप बैठकर भावुक स्वर में कहा, "मैं बहुत बुरा हूं न.. तुम्हें लगता है कि मैं अपने लिए ये सब कर रहा हूं.. जानबूझकर तुम्हारे और रवि के बीच दीवार बन रहा हूं तो ये तुम्हारी गलतफहमी है.. तुम रवि की कभी नहीं हो सकती, ये तुम्हारा दिवास्वप्न कभी पुरा नहीं हो सकता..? तुम्हें पता है तुम मर चुकी हो और मैंने तुम्हें जिंदा किया है.. मैंने तुम्हें इन तुच्छ कामों के लिए जिंदा नहीं किया है, तुम्हें बहुत बड़े बड़े काम करने है..! मैं किसी को भी तुम्हारे शरीर को छुने नहीं दे सकता..तुम्हारे इस शरीर पर सिर्फ और सिर्फ मेरा अधिकार है..! इसे कोई मुझसे नहीं छीन सकता..!" 

"तुम झूठ बोल रहे हो.. क्या सबूत है तुम्हारे पास कि मैं मर गई हूं..? तुम मुझे बेवकूफ नहीं बना सकते.. मुझे मालूम है किसी के मरने के बाद कोई ताकत उसे जिंदा नहीं कर सकता है..!" प्रतीक्षा तीखे स्वर में बोली तो उसने कहा,"अच्छा अब तुम्हें सबूत चाहिए.. ठीक है सबूत तो मैं दे दूंगा लेकिन जबतक तुम अपनी आंखों से अपने अतीत को देखोगी नहीं तबतक विश्वास नहीं करोगी.. ऐसा करो तुम ये धोती अपने बदन से उतारो..!" 

"नहीं... तुम्हारे मन में पाप है, मैं धोती नहीं उतारुंगी..!"

" अच्छा तुम ये बताओ मैं तुम्हारे साथ जो चाहूं वो कर सकता हूं या नहीं..? लेकिन अबतक मैंने तुम्हारे साथ कोई ग़लत काम किया है..?"

अनाह ने कहा तो वह बिना किसी झिझक के धोती को उतारकर कर एक ओर रख दी.. धोती उतारते ही अनाह के बीच के आंख से एक नीली रोशनी निकली और प्रतीक्षा के चारों ओर फैलने लगी..देखते ही देखते वह प्रकाश के एक बड़े से बबल के बीच में थी.. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे मां के गर्भ में कोई बच्चा हो..!

प्रतीक्षा उस बड़े से बबल में कैद थी और वह अपने अतीत में लौट रही थी.. समय तेजी से पीछे की ओर भाग रहा था... जैसे किसी ने समय को फास्ट बैकवर्ड में प्ले कर दिया हो..! उसके आंखों के सामने उसके जीवन के सभी चित्र तेज गति से पीछे की ओर भाग रहे थे। अपने अतीत को भूलने के बाद ये अनुभव उसके लिए अदभूत था..! उसने सपने में भी न सोचा था कि अनाह सचमुच में उसे उसके अतीत से रूबरू कराएगा... आखिर इसमें ये शक्ति आई कहां से..? अगर ये किसी को भूत या भविष्य का सैर करा सकता है तो ये कोई साधारण जीव नहीं है? जरूर इसमें कुछ अलौकिक शक्तियां हैं...! वह अनाह के बारे में सोच ही रही थी कि उसके आंखों के सामने एक कालेज का दृश्य पार हो रहा था जिसमें वो भी दिख रही थी, उस दृश्य में अपने आपको देखकर वह उत्साहित होकर चीखी," रोको.. देखने तो दो कि मैं कालेज में क्या कर रही हूं..?" 

उसका चीखना था कि दृश्य जैसे पॉज हो गया,उस पॉज दृश्य में वह एक लड़के को गले लगाए हुए होती है..'अब ये कौन है जिसे मैं गले लगाए हूं..?' उसका ये सोचना था कि पॉज दृश्य चालू हो गया,"हाय प्रतीक्षा..कैसी हो.. ? हाय रोहन..यू आर वैरी हैंडसम..!" 

"थैंक्यू सारा..! कहां थी तुम जो इतने दिनों बाद नजर आई..?" 

"मैं तो यहीं थी..बस तुम्हारे सामने आने से बचती थी..?" 

"क्यों..?" 

"प्रतीक्षा के कारण.. प्रतीक्षा को लगता है मैं उसके हक में डाका डाल रही हूं...देख नहीं रहे अब भी नाराज़ हैं मुझसे.. मेरे हाय का भी जबाब नहीं दी..?" 

सारा ने नाराज़गी भरे लहजे में कहा तो प्रतीक्षा बोली," अरे नहीं यार नाराज नहीं हूं तुमसे..बस थोड़ा रोहन को लेकर अग्रेसिव हो जाती हूं.. और बता सब कैसा चल रहा है तेरा..? 

" ठीक है सब..!"

" ये अविनाश, शिखा और शिवा कहां है? दिखाई नहीं देते आजकल.. कहीं वे भी जानबूझकर तो हमसे दूर नहीं भागते..?" प्रतीक्षा पूछी तो सारा ने कंधे उचकाते हुए कहा," मालूम नहीं..?"

" चलो कैंटीन में कॉफी पीते हैं.. ऐसा करो उन्हें भी कॉल कर दो.. और हां हमारा नाम मत लेना..!" प्रतीक्षा कहकर कैंटीन के तरफ जानबूझकर अकेले बढ़ गई तो उसके पीछे पीछे रोहन और सारा भी आपस में बातें करते चले जा रहे थे, प्रतीक्षा के आगे बढ़ जाने पर रोहन ने कहा,"वैसे प्रतीक्षा है तो बहुत समझदार लेकिन थोड़ी मुडी है..कब उसके मन में कौन सा खुराफात आ जाए कहना मुश्किल है..!" 

"मुझे तो लगता है कि ऐसे मुडी से सतर्क रहना चाहिए तुम्हें.. क्या पता कब क्या कर दें..!" सारा अपने संशय जाहिर की तो रोहन बोला,"अरे नहीं नहीं.. उतना खतरा का कोई बात नहीं है..बस जब रुठती है तो मनाना थोड़ा मुश्किल होता है..! " 

बातें करते करते वे कब कैंटीन पहुंच गए पता ही न चला.. कैंटीन के अंदर आए तो एक टेबल पर प्रतीक्षा बैठी हुई थी, और वह टेंशन में लग रही थी... रोहन उसके सामने के कुर्सी पर बैठते हुए पूछा,"क्या बात है प्रतीक्षा टेंशन में लग रही हो..?" 

"दरअसल बात ये है रोहन कि कॉलेज के टूर प्रोग्राम के रजिस्ट्रेशन का आज आखिरी दिन है.. मैं अपने बापू से रजिस्ट्रेशन फी मांगती रही और वे टालते रहे.. और देखो आज आखिरी तारीख भी पार हो गया और मैं हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी टूर में नहीं जा सकी..!" प्रतीक्षा बहुत ही दुखी मन से बोली तो रोहन सारा से पूछा," तुम्हारा रजिस्ट्रेशन हो गया है..?"

" हां मैं अपना रजिस्ट्रेशन कब का करा चुकी हूं..!"

" अच्छा... कोई बात नहीं! सारा तुम हम सबके लिए कॉफी ऑर्डर करो मैं अभी आया..!" 

कहकर वह दौड़ते हुए वहां से कॉलेज के ऑफिस की ओर भागा... सारा और प्रतीक्षा कैंटीन में बैठी उसे जाते देखती रही..

                                                   क्रमशः...