घर में हल्की रोशनी है।
हर कमरा अपने अंदर एक दर्द छुपाए हुए है।
तीनों अलग-अलग जगह… पर तीनों के दिल एक ही जैसे टूटे हुए।
KABIR’S ROOM
कबीर खिड़की के पास बैठा है।
बाहर रात का सन्नाटा…
अंदर उसकी साँसों में घुटन।
उसकी आँखों से आँसू टपकते हैं—
पर वो हर बार हाथ से जल्दी पोंछ देता है।
जैसे खुद को ही धोखा दे रहा हो।
(वॉइसओवर – कबीर) —
मैं मज़बूत दिखता हूँ…
पर सच ये है कि मैं कभी था ही नहीं मज़बूत।
भैया… श्रेया…
मैं तुम दोनों को खोना कभी नहीं चाहता था।
कबीर धीरे से तकिये में चेहरा छुपाकर रो पड़ता है।
पर उसकी सिसकियां इतनी दबा दी गई हैं
कि कोई सुन भी न सके।
SCENE 2 – SHREYA’S ROOM (करण के साथ)
श्रेया सोने का नाटक कर रही है।
आँखें बंद हैं… पर पलकें आँसुओं से भीगी हुई।
करण बगल में बैठा उसे देख रहा है।
बहुत देर तक…
शांत… उदास… टूटा हुआ।
जब उसे लगता है कि श्रेया सच में सो गई—
वो चुपचाप उसका हाथ पकड़ लेता है।
उंगलियां हल्के से कांप रही हैं।
और फिर करण की आँखों से भी आँसू बहने लगते हैं।
पर आवाज़ एक सिसकी तक नहीं।
करण(फुसफुसाकर, टूटी हुई आवाज़ में) बोला -
श्रेया… मुझे मत छोड़ो।
मैं गुस्से में नहीं हूँ…
मैं बस तुम दोनों को खो देने से डरता हूँ।
वो अपना माथा श्रेया के हाथ पर टिकाता है।
और बच्चा बनकर रोने लगता है।
SCENE 3 – KITCHEN – SAME TIME
श्रेया चोरी से उठती है।
वो देखती है करण रो रहा है—
उसका दिल भर आता है।
पर वो खुद भी इतनी टूटी है कि उसे संभाल नहीं पाती।
वो चुपचाप किचन में जाकर बैठ जाती है।
स्टूल पर…
घुटनों में चेहरा छिपाकर।
(वॉइसओवर – श्रेया) —
मैं ही क्यों बीच में पिस रही हूँ?
क्यों ये दोनों एक‑दूसरे से दूर होते जा रहे हैं?
क्या मैं उनकी ज़िंदगी की वजह थी…
या उनके दर्द की वजह?
उसके आँसू लगातार बहते हैं।
पर उसकी सिसकियाँ भी बिल्कुल दबाई हुई।
करण कमरे से बाहर आता है।
टूटा हुआ… बिखरा हुआ…
जैसे अचानक कोई बड़ा बोझ उसकी छाती पर गिरा हो।
वो हॉल में आता है और सोफे पर घुटनों पर बैठ जाता है।
चेहरा दोनों हाथों में छुपाकर।
करण (रोते हुए) बोला -
"Shreya सोचेगी मैं नहीं टूटा…Kabir सोचेगा मैं पत्थर हूँ…पर उन्हें क्या पता…मैं हर रात खुद से लड़कर
खुद को संभालता हूँ, ताकि वो दोनों टूट न जाएँ।"
कबीर ने ही मुझे पहली बार ‘जलन वाली’ बात बोली थी…उसका दर्द मुझे भीतर तक तोड़ गया।"
उसकी साँसें भारी हो जाती हैं।
वो खुद को गले लगाकर बैठ जाता है।
कबीर कमरे का दरवाज़ा खोलता है—
रात भर नहीं सोया।
उसके कदम लड़खड़ाते हैं।
वो हॉल में आता है…
और करण को टूटा हुआ देखकर
उसका दिल चीर जाता है।
कबीर दूर खड़ा होकर धीरे से फुसफुसाता है—
कबीर (आँखों में गहरा पछतावा) बोला -
भाई… माफ़ कर दो…
मैं तुम्हें कभी दर्द नहीं देना चाहता था।
पर ego…
हाँ, वो ज़ालिम ego…
कदमों को रोक लेती है।
कबीर कमजोर सा पलट जाता है
और वापस अपने कमरे में चला जाता है।
एक घर…
पर तीन कमरों में तीन टूटी हुई जानें।
कबीर तकिये में मुँह छुपाकर रो रहा।
करण सोफे पर मुड़ा हुआ, कंधे काँप रहे।
श्रेया अकेली किचन में सिसक रही।
पर एक सच्चाई—
सबको लगता रहा कि दूसरा मज़बूत है।
जबकि सबसे टूटा हुआ उन्हीं में से कोई था।
INT. KARAN का ROOM – देर रात
कमरे में हल्की सी पीली रोशनी जल रही है।
श्रेया की आँखें रो-रोकर सूज चुकी हैं।
पर किसी ने उसकी नहीं सुनी—
ना करण ने…
ना ही कबीर ने।
श्रेया अकेले मन्दिर में बैठी है।
दीया जल रहा है…
पर उसके चेहरे पर उम्मीद की कोई रोशनी नहीं।
वो मूर्ति के सामने सिर झुकाकर सिसक रही है—
धीरे… टूटी हुई।
श्रेया (टूटी आवाज़ में) बोली -
भगवान… हम तीनों को क्या हो गया?
हमारी ख़ुशी को किसकी नज़र लग गई?
उसकी आवाज़ मन्दिर की दीवारों में खो जाती है।
कोई जवाब नहीं।
सिर्फ सन्नाटा।
काफी देर रोने के बाद
जब आँसू सूख जाते हैं…
वो खामोशी से उठती है
और करण के कमरे की ओर बढ़ती है।
KARAN’S ROOM
करण गहरी नींद में है। चेहरे पर तनाव है… पर फिर भी वो मज़बूत दिख रहा है।
श्रेया दरवाज़े पर खड़ी होकर उसे देखती है।
उसे महसूस होता है—
शायद करण सच में नहीं टूटा…
शायद सिर्फ वही कमजोर थी।
वो धीरे से उसके पास जाती है।
उसके बालों पर हाथ फेरती है—
प्यार से… दर्द के साथ।
फिर उसके माथे पर एक हल्की सी kiss रखती है।
और बहुत चुपचाप
उसके बगल में लेट जाती है।
पर इस बार—
उसका चेहरा करण से उल्टी तरफ है।
पहली बार।
नहीं तो हर रात वो करण के सीने पर सिर रखकर सो जाती थी।
आज पहली बार
उसने करण से मुंह फेर लिया।
करण नींद में ही पलटता है
और पीछे से श्रेया को बाहों में भर लेता है—
वैसे ही…जैसे कबीर भरा करता था।
उसका हाथ श्रेया की कमर पर कसता है।
श्रेया चौंकती है।
श्रेया (बहुत धीमे) बोली -
क… Kabir जी?
उसकी आवाज़ में डर भी है…
और उम्मीद भी।
करण की आँखें खुलती हैं
और वो गहरी आवाज़ में धीरे से कहता है—
करण (ठंडी, कठोर आवाज़ में) बोला -
कबीर नहीं… मैं करण हूँ।
और एक महीने के लिए कबीर को भूल जाओ।
अभी सिर्फ़ मेरे पास रहो।
बहुत रात हो गई है… रोने से कुछ नहीं मिलेगा।
उसकी आवाज़ बिल्कुल पत्थर जैसी थी।
न कोई नर्मी…न पहले वाला प्यार।
श्रेया पहली बार करण के इस रूप को देखती है।
वो डरकर आँखें बंद कर लेती है।
दिल अंदर तक सिहर उठता है।
(वॉइसओवर – श्रेया) —
ये कौन से करण जी थे?
जो कभी मुझसे ज़रा‑सा तेज़ बोलते भी नहीं थे…
आज पत्थर की तरह बात कर रहे हैं।
उसके अंदर छिपे सभी दर्द
उसकी बंद पलकों के पीछे जमा हो जाते हैं।
करण उसे बाहों में लिए रहता है
पर उसका स्पर्श आज सुकून नहीं दे रहा—
डर दे रहा है।
श्रेया चुपचाप पड़ी रहती है।
आँखें बंद, दिल कचोटता हुआ।
आज की रात—
तीनों की जिंदगी में सबसे भारी रात थी।
न रिश्ता टूटा था,
न ही दिलों का प्यार…
पर भरोसा कहीं गहराई में दरकने लगा था।