रात के 2 बजे। बाहर तेज़ हवा चल रही है। घर में गहरा सन्नाटा है।
श्रेया अचानक घबरा कर उठ बैठती है। चेहरे पर पसीना… साँस तेज़-तेज़ चल रही है।
श्रेया (रोते हुए, काँपती आवाज़ में) बोली -
कर… करन जी… मुझे कबीर जी के पास जाना है… मुझे डर लग रहा है…।
करन उठता है। आँखों में नींद है पर चेहरा बेहद सख्त।
करन (धीरे पर कड़े लहजे में) बोला -
श्रेया… रात बहुत हो चुकी है।
तुम्हारा सपना बस सपना था।
कबीर को सोते हुए डिस्टर्ब मत करो।
श्रेया (और जोर से रोने लगती है) —
नहीं… मुझे उससे मिलना है…
मुझे उसके पास जाना ही होगा…
मुझे उससे गले लगना है…
मुझे बहुत डर लग रहा है, करण… प्लीज़…
करन उसे कुछ सेकंड तक देखता है। उसका चेहरा गुस्से और दर्द के बीच फँसा हुआ।
करन (धीरे से घड़ी देखता है) —,
ठीक है… सिर्फ़ एक घंटा।
उसके बाद तुम यहीं आ जाओगी।
श्रेया एक पल भी नहीं रुकती। आँसू पोंछती हुई भागती है कबीर के कमरे की तरफ।
कबीर का कमरा
कमरे में हल्की पीली रौशनी। कबीर गहरी नींद में है। चेहरे पर उदासी जम चुकी है जैसे कई दिनों से चैन की नींद न मिली हो।
श्रेया धीरे से दरवाज़ा खोलती है। अंदर आती है। कदम बहुत हल्के…।
वो चुपचाप कबीर के पास लेट जाती है।
धीरे से अपना सिर उसके सीने पर रखती है… और बस फूट-फूटकर रो पड़ती है।
श्रेया (बहुत धीमी आवाज़ में, कबीर को जगाए बिना) बोली -
कबीर जी… मुझे बहुत डर लग रहा था…
मुझे लगा आप नाराज़ हो…
मुझे लगा मैं आपसे दूर हो जाऊँगी…
और शायद… आप लोग भी मुझसे।
कबीर गहरी नींद में है। उसे कुछ सुनाई नहीं देता, लेकिन रोने की हल्की आवाज़ पर वो नींद में ही करवट बदलता है—जैसे आदत से मजबूर होकर श्रेया को संभाल रहा हो।
श्रेया उसकी छाती पर हाथ रखकर सिसकती रहती है
एक-एक मिनट उसके लिए जैसे राहत की सांस बन जाता है।
पूरा एक घंटा… वो बस चुपचाप उसके पास लेटी रहती है।
श्रेया समय देखते ही जल्दी से उठती है।)
वो अपने आँसू पोंछती है और चुपचाप वापस भागती है करन के कमरे में।
करन का कमरा
करन कुर्सी पर बैठा उसका इंतज़ार कर रहा है।
चेहरे पर एक अजीब सा दर्द और हल्की सी मुस्कान… जैसे वह श्रेया की कमजोरी समझ भी रहा है, और उसे चुभ भी रही है।
श्रेया कमरे में दाखिल होती है। करन उसे देखता है—पहले हल्का दर्द, फिर एक बहुत धीमी मुस्कराहट।
करन (थोड़ा थका हुआ, मगर नरम लहजे में) बोला है
आ गईं तुम…
श्रेया बिना कुछ बोले उसके पास आकर खड़ी हो जाती है, आंखें लाल, चेहरा अभी भी रोने से फीका हुआ।
वो उसे बिस्तर पे लिटाता है। और खुद उसकी साइड में लेट गया। करन उसे धीरे से पकड़कर अपने सीने से लगा लेता है। उसके हाथों में वो वही नरमी थी… वही मजबूती… जो किसी पति की होती है।
करन (बहुत धीमे, टूटते हुए) बोला -
बस… अब यहीं रहो।
मैं हूँ ना…
श्रेया आँखें बंद कर देती है… जैसे पहली बार करन की बाँहों में उसे थोड़ी शांति मिली हो।
करन उसके सिर पर हाथ फेरता है। उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं—सिर्फ दर्द और अपनापन था।
करन (फुसफुसाकर) बोला -
सुबक कर कुछ नहीं बदलेगा, श्रेया…
पर मैं तुम्हें कभी टूटने नहीं दूँगा।
श्रेया उसकी छाती पर सिर रख देती है। इस बार वो डर कम… और सुकून ज़्यादा महसूस करती है।
कहानी का ये पल…
एक टूटी हुई रात…
एक अजीब तिकोना दर्द…
पर फिर भी,
तीनों के दिल में एक-दूसरे के लिए घना प्यार था।
कमरे में हल्की सुबह की रौशनी। कबीर करवट बदलते हुए जागता है।
वो उठते ही अचानक अपने सीने पर हाथ रखता है।
कपड़ों पर हल्की सी नमी…
एक अजीब सा एहसास… जैसे रात भर कोई उसके सीने से चिपक कर रोया हो।
कबीर (धीमे से, उलझन में) बोला -
ये… गीला कैसा…?
क्या मैं खुद रो रहा था… या…
वो कुछ याद करने की कोशिश करता है पर रात धुंधली है।
बस इतना याद है कि नींद में किसी की गर्म हथेली उसकी छाती पर रखी हुई महसूस हुई थी… मगर शायद वो सपना समझकर सोता रह गया।
कबीर के चेहरे पर एक दर्द-भरी उदासी उतर आती है।
जैसे उसे पता है कि कोई उसके बहुत करीब आया था… पर वह उसका नाम भी नहीं ले सकता।
करन का कमरा
करन आँखें खोलता है।
सामने श्रेया बैठी है—अब भी हल्के-हल्के सुबक रही है।
आँखें सूजी हुई, चेहरा गर्म… साँसें तेज़।
करन (फौरन उठकर उसके पास आकर) बोला -
Shreya…? तुम रो रही हो? सुबह हो गई है… क्या हुआ?
श्रेया कुछ नहीं बोल पाती। सिर झुका लेती है।
करन उसका चेहरा हाथों से पकड़कर ऊपर करता है और अचानक उसके माथे की गर्मी हाथ में चुभ जाती है।
करन (घबराकर) बोला -
Shreya!
तुम्हें तो बुखार है…
वह तुरंत उसके गाल, गर्दन, हथेली पर हाथ रखकर तापमान जांचता है।
करन बोला -
ये बुखार रात से होगा… तुम रोती ही रही ना?
श्रेया आँसू रोकने की कोशिश करती है—पर आँखें फिर भर जाती हैं।
श्रेया (सहलकी आवाज़, टूटी हुई) बोली -
मैं..मैं ठीक हूं।
करन (हल्के गुस्से पर ज़्यादा चिंता के साथ) बोला -
बिलकुल ठीक नहीं हो तुम। रात में खाना भी नहीं खाया… ऊपर से रोती ही रही… बुख़ार तो आना ही था।
वो तुरंत पानी का गिलास उठाकर उसे पकड़ाता है, पर श्रेया के हाथ काँप रहे थे।
करन उसके हाथ अपने हाथों में लेकर पानी पिलाता है।
करन (धीमे मगर सख़्त लहज़े में) बोला -
अब एक कदम भी मेरे बिना नहीं चलोगी।
समझी?
श्रेया कुछ बोल नहीं पाती, बस सिर झुका लेती है।
श्रेया की हालत देखकर करन का चेहरा बदल जाता है गुस्सा नहीं… एक भारी अपराधबोध।
करन (मन में, बहुत धीरे) बोला -
मेरी वजह से रोती रही होगी।
एक तरफ मैं उसे रोक रहा था…
और दूसरी तरफ… उसकी रात किस हाल में गुज़री होगी…
वो उसकी पीठ सहलाता है और उसे अपने कंधे पर सिर रखने देता है।
करन (बहुत नरम आवाज़ में) बोला - —
Shreya…बस अब रोना मत।
मैं हूं ना… तुम्हारे पास।
दूसरी तरफ, कबीर निश्चिंत नहीं है।
वो बार-बार अपने सीने को छूता है…एक अजीब सी खालीपन उसे चुभ रहा है।
कबीर (धीरे, खुद से ही) बोला -
किसने… किसने इतना रोकर…मेरे सीने को गीला किया...?
श्रेया?
नहीं..... वो नहीं आएगी.....या फिर....
कबीर की आँखें थोड़ी नम हो जाती हैं।
वो महसूस करता है कि उस रात कोई बहुत टूटा हुआ उसके पास आया था—और वो उसे संभालने के लिए जाग भी नहीं पाया।
वो अचानक बेचैन होकर उठ खड़ा होता है।
कबीर (धड़कते दिल से) बोला -
Karan भैया… और Shreya ठीक तो होंगे…?
उसका पैर खुद-ब-खुद करन के कमरे की ओर बढ़ने लगता है… जैसे किसी अदृश्य धागे ने उसे वहां खींच लिया हो।
सुबह की हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही है।
किचन में चम्मचों की आवाज़… और गैस पर चाय उबलने की खुशबू।
लेकिन आज किचन में श्रेया नहीं है।
करन खुद खड़ा है — चुप, गंभीर, टूटे हुए से।
कबीर नीचे आता है। चेहरे पर थकान, आँखों में बेचैनी…वो किचन में झांककर रुक जाता है।
कबीर (हैरान होकर) बोला -
भैया…?
आप… खाना बना रहे हो?
श्रेया कहां है?
करन बिना उसकी तरफ देखे दाल चलाता रहता है।
करन (सीधा, शांत) बोला -
नहीं...।
उसे बुखार है।
कल पूरी रात रोई थी वो।
कबीर का चेहरा ढह जाता है।
कबीर (तुरंत परेशान होकर) बोला
बु - बुखार…?
क… क्यों रोई वो…?
करन पहली बार उसकी ओर देखता है—
नज़र में दर्द भी है और ताना भी।
करन (धीमी, कटु मगर टूटी हुई आवाज़ में) बोला -
क्योंकि वो दर्द में थी, Kabir.
तुमसे बिछड़ने का दर्द…हम दोनों के अलग होने का दर्द
और शायद…तुम्हारे पास होने के बावजूद तुम तक ना पहुंच पाने का दर्द।
कबीर पूरी तरह जम जाता है।
कबीर (कंठ सूखा हुआ) बोला -
म-मतलब…?
करन नज़रें नीची कर लेता है। आवाज़ ठंडी, लेकिन दर्द से भरी।
करन बोला -
वो… तुम्हारे पास आई थी।
सिर्फ एक घंटे के लिए।
मैने भेजा था उसे… क्योंकि वो टूट रही थी Kabir.
कबीर की साँसें तेज हो जाती हैं।
कबीर (बहुत धीरे से) बोला -
म…मेरे पास…?
पर… मुझे तो पता ही नहीं चला…
करन तवा बंद करता है, और बेहद कड़वा सच बोल देता है—
करन बोला -
हां...पर नहीं चला....
क्योंकि तुम ठहरे पत्थर दिल इंसान....
कबीर की आँखें फटी रह जाती हैं।
करन (तीखे लेकिन टूटे हुए अंदाज़ में) बोला -
वो तुम्हारे सीने से चिपकर रोती रही…
और तुम सोए रहे...।
एक बार आँखें खोलकर देखा होता तो पता चल जाता कबीर...।
कबीर की आँखें एकदम भर आती हैं।
वो हाथ काउंटर पर रखकर खुद को संभालता है।
किचन में सन्नाटा जम चुका है। करन फिर से दाल में तड़का लगाता है, पर हाथ हल्के काँप रहे हैं।
कबीर उसके सामने खड़ा है—पूरी तरह टूटा हुआ, डर से भरा हुआ। कबीर धीरे-धीरे घुटनों के बल करन के सामने बैठ जाता है।
कबीर (रोती, कांपती आवाज़ में) बोला -
भैया…बस एक बार.... एक बार श्रेया के पास जाना चाहता हूं.... उसे देखना चाहता हूं....
वो ठीक नहीं है..... और मैं भी नहीं.....please भैया।
करन का दिल काँप जाता है, पर चेहरा अभी भी पत्थर जैसा। वो कबीर की तरफ देखने से भी बचता है।
करन (कठोर, रूखी आवाज़ में) बोला -
Kabir… मैं तुमसे खफा हूं।
तुमने मुझे नहीं… Shreya को सबसे ज्यादा hurt किया है।
कबीर अपने आँसुओं को छुपाने के लिए सिर झुका लेता है।
कबीर (टूटकर) बोला -
मुझे पता है…
पर भैया… मैं उसे उसके बिना…मैं उसके बिना सांस नहीं ले पा रहा।
करन उसे रोक देता है। वो अपनी कलाई की घड़ी निकालकर कबीर के सामने लहराता है।
करन (सख्ती से) बोला -
सिर्फ एक घंटा!
जाओ जल्दी!
कबीर की आंखें भीग जाती हैं—जैसे उसे जिंदगी का सबसे कीमती मौका मिल गया हो।
कबीर (धीमे स्वर में, कांपते होंठों से) बोला -
Thank you… भैया…
करन मुँह फेर लेता है, ताकि कबीर उसकी भीगी आंखें न देख ले।
करन बोला -
एक घंटा kabir.
उसके बाद… वापस आ जाना।
आज वो मेरी ज़िम्मेदारी है।
कबीर सिर हिलाता है—और तुरंत सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर चला जाता है।
कमरा हल्की रोशनी से भरा है। टेबल लैंप की पीली लौ कमरे में सन्नाटा भर रही है।
श्रेया बिस्तर पर पड़ी है। चेहरा लाल, पसीने से भीगा…
बुखार में काँपती हुई।
कबीर कमरे का दरवाजा धीरे से खोलता है।
जैसे कोई टूटे हुए मंदिर में कदम रख रहा हो।
वो श्रेया को देखता है और उसका दिल वहीं ज़मीन पर गिर जाता है।
श्रेया नींद में ही करवट लेती है…
और बड़बड़ाती है—
Karan ji… Kabir ji…
Please… दोनों मेरे पास सो जाइए…
जब आप दोनों मेरे पास नहीं होते…
तो मुझे बहुत pain होता है…
कबीर का दिल चीर जाता है। उसकी आंखें भर आती हैं।
कबीर (फुसफुसाहट में) बोला -
Shreya…
वह उसके पास बैठ जाता है। उसके माथे पर हाथ रखता है , हाथ तुरंत गर्म होकर पीछे हट जाता है।
कबीर (घबराकर) बोला -
इतना बुखार…
मेरी वजह से… तुम्हारी ये हालत…
वो खुद को रोक नहीं पाता। उसके गाल, उसकी पलकों, उसकी नाक—हर जगह को वो हल्के से चूमता है। कबीर का पूरा शरीर काँप रहा है। हर चुम्बन में माफी थी…हर सांस में दर्द था…।
कबीर (टूटती आवाज़ में) बोला -
मुझे माफ कर दो Shreya…
मैं… गलत था…बहुत गलत...।
श्रेया गहरी नींद में है—समझ नहीं पा रही।
पर उसके होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान आ जाती है। शायद उसे एहसास हो गया हो कि कोई अपना उसके पास है।
कबीर उसे देखते-देखते बह रहा है… उसकी उंगलियों से श्रेया के बालों को सहेजता है। बुखार की तपिश उसे अंदर तक जला रही है।
कबीर (रोते हुए) बोला -
मैं हूं यहां, Shreya…
बस आँखें खोलो एक बार…बस एक बार...।
लेकिन श्रेया सोई रहती है। थकी, टूटी, जलती हुई।
कबीर उस एक घंटे को जैसे पूरी जिंदगी की तरह जीता है। बस उसे देखता रहता है… और अपनी हर कमी को मन ही मन कोसता रहता है।
एक घंटा बाद
कमरे का दरवाजा धीरे से खुलता है। करन अंदर आता है—चेहरा थका हुआ। वो घड़ी देखता है। कबीर तुरंत उठ जाता है। दोनों की नज़रें मिलती हैं—
दो टूटी हुई नज़रों की तरह।
कबीर कुछ कहना चाहता है… लेकिन करन कुछ भी बोले बिना—बस हल्की सी गर्दन हिलाता है।
संकेत स्पष्ट था—
अब वापस चलने का समय हो गया था।
कबीर का दिल फिर से टूट जाता है। लेकिन वह चुपचाप सिर झुकाकर कमरे से बाहर निकल जाता है।
करन अंदर आता है, और श्रेया के पास बैठ जाता है।
उसके माथे पर हाथ रखता है, और धीरे से उसकी उंगलियाँ पकड़ लेता है।
कमरे के बाहर—
कबीर दीवार से टिक जाता है। आँसू उसे बहा ले जाते हैं।