अंधेरा कमरे में पूरी तरह फैला हुआ था।
कोई रोशनी नहीं… सिर्फ़ बाहर दूर से आती हवा की आवाज़ और टूटे हुए दिलों की धड़कनें।
कार्तिकेय और शानवी उसी छोटे से छुपे हुए कमरे में थे।
दोनों थके हुए, चोटिल, और डर के साये में बैठे थे।
शानवी का पूरा शरीर कांप रहा था।
उसकी आँखों में अभी भी पारितोष का सच घूम रहा था।
शानवी ने धीमी आवाज़ में कहा—
मुझे… उम्मीद नहीं थी कि वो पारितोष… मुझे मारना चाहता था…
अगले ही पल उसकी आवाज़ रुक गई। आँसू अपने आप बहने लगे। वो खुद को रोक नहीं पाई और कार्तिकेय के सीने से लग गई।
कमरा और भी भारी हो गया।
शानवी (रोते हुए, कांपती आवाज़ में) बोली -
मुझे माफ़ कर दो कार्तिकेय…मैं… मैं तुम्हें समझ ही नहीं सकी…।
कार्तिकेय कुछ पल चुप रहा। उसके चेहरे पर दर्द भी था, और एक अजीब सा सुकून भी। जैसे इतने दिनों की लड़ाई के बाद पहली बार शानवी ने उसे सच में महसूस किया हो। उसने धीरे से अपना हाथ शानवी के सिर पर रखा।
कार्तिकेय (धीरे, कमजोर लेकिन शांत आवाज़ में) बोला -
तुम्हारी गलती नहीं थी शानवी…
तुमने बस वही देखा जो तुम्हें दिखाया गया…
मैंने तुम्हें बचाने की कोशिश की… शायद गलत तरीके से…।
शानवी और ज़ोर से रो पड़ी। उसने उसकी शर्ट को पकड़ लिया, जैसे अब छोड़ना नहीं चाहती। बाहर हवा और तेज़ हो गई थी…
जैसे आने वाले समय का खतरा अभी खत्म नहीं हुआ था।
कार्तिकेय ने खिड़की की तरफ एक बार देखा।
उसकी आँखों में साफ़ था—
ये लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई…
और उसी अंधेरे में, दो टूटे हुए लोग एक-दूसरे के सहारे खड़े थे…
लेकिन खतरा अभी भी उनके बहुत करीब था।
कमरे में सन्नाटा था। अंधेरा अब थोड़ा हल्का पड़ने लगा था, जैसे रात अपने आख़िरी पल गिन रही हो।
शानवी अभी भी कार्तिकेय के सीने से लगी हुई थी।
उसकी साँसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं, लेकिन दिल अभी भी भारी था। कुछ देर तक दोनों ने कुछ नहीं कहा।
बस वो खामोशी… जो बहुत कुछ कह रही थी।
कार्तिकेय ने धीरे से अपनी आँखें बंद कीं,
फिर धीमी आवाज़ में बोला—
तुम जानती हो शानवी… मैं कभी तुम्हें ये सब बताना नहीं चाहता था।
शानवी ने धीरे से सिर उठाया। उसकी आँखें अब भी नम थीं।
शानवी (धीमे, कांपते हुए) बोली -
क्या बताना नहीं चाहते थे?
कार्तिकेय ने एक लंबी साँस ली। जैसे अंदर का बोझ बाहर निकाल रहा हो।
कार्तिकेय बोला -
कि मैं… हमेशा से तुम्हारे पास रहा हूँ।
कभी बिल्ली बनकर… कभी इंसान बनकर…लेकिन हर रूप में… मैं सिर्फ़ तुम्हें देख रहा था… तुम्हें बचाने के लिए।
शानवी कुछ पल चुप रही। उसकी आँखों में confusion था… लेकिन अब डर कम था।
शानवी (धीरे) बोली -
लेकिन क्यों?
कार्तिकेय ने उसकी तरफ देखा। इस बार उसकी आँखों में डर नहीं था—सिर्फ़ सच था।
कार्तिकेय (धीरे, साफ़ आवाज़ में) बोला -
क्योंकि मैं तुम्हें पहले भी खो चुका हूँ…बहुत पहले…
और इस बार… मैं वही गलती दोबारा नहीं होने दे सकता।
शानवी का दिल तेज़ धड़कने लगा।
शानवी बोली -
पहले भी…? तुम क्या कह रहे हो?
कार्तिकेय ने हल्का सा सिर झुका लिया, जैसे कोई बहुत पुराना दर्द याद आ गया हो।
कार्तिकेय बोला -
मुझे श्राप मिला था…और उसी श्राप की वजह से मैं ये रूप बदलता हूँ। मैं तुम्हें पहचानता था… शायद तुम मुझे नहीं पहचान पाई…।
शानवी की आँखें और नम हो गईं। लेकिन इस बार डर नहीं था—बस एक अजीब सा खिंचाव था। वो धीरे-धीरे उसके करीब आई।
शानवी (धीमे, टूटे लेकिन नरम स्वर में) बोली -
अगर तुम सच में मुझे बचाना चाहते थे…तो फिर मुझसे दूर क्यों भागते रहे?
कार्तिकेय कुछ पल चुप रहा।
फिर धीरे से बोला—
क्योंकि मैं खुद से डरता था…कि कहीं तुम मुझसे दूर न हो जाओ… या फिर मुझे ही अपना ना मानो…।
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया। लेकिन इस बार वो सन्नाटा भारी नहीं था…थोड़ा सा सच्चा था। शानवी ने धीरे से अपना हाथ उसके हाथ पर रखा।
शानवी (धीरे, भावुक होके) बोली -
मैंने तुम्हें बहुत देर से समझा…लेकिन अब… शायद मैं समझने लगी हूँ…।
कार्तिकेय ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में पहली बार राहत थी। दोनों के बीच अब डर नहीं था… बस एक अधूरी सी कहानी थी, जो धीरे-धीरे पूरी हो रही थी। और बाहर…सुबह की पहली रोशनी दस्तक दे रही थी। 🌅
कमरे में हल्की-हल्की सुबह की रोशनी फैलने लगी थी।
रात का अंधेरा अब पीछे हट रहा था, लेकिन खतरे की परछाई अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी।
कार्तिकेय ने शानवी की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी urgency थी—जैसे उसके पास समय बहुत कम हो।
कार्तिकेय (तेज़ लेकिन भावुक आवाज़ में) बोला -
शानवी… listen! मेरी तरफ देखो…
शानवी ने उसकी तरफ देखा, अभी भी उसकी आँखों में रात का दर्द और confusion था।
कार्तिकेय बोला -
जब मैं बिल्ली बन जाऊँ… तो तुम मुझे अपने साथ कहीं दूर ले जाना। क्योंकि वो पारितोष… तुम्हें नुकसान पहुँचा सकता है।
और मैं ये कभी नहीं चाहूँगा…।
शानवी कुछ बोलने ही वाली थी, लेकिन तभी हवा में एक अजीब सा कंपन हुआ। कमरे की रोशनी थोड़ी और तेज़ हुई…
और अगले ही पल कार्तिकेय का शरीर धीरे-धीरे बदलने लगा।
उसकी आँखें बदल गईं… हाथ छोटे होने लगे… और कुछ ही सेकंड में वो फिर से बिल्ली बन गया — टुक-टुक। 🐾
शानवी एकदम चौंक गई।
शानवी (धीरे, हैरान होकर) बोली -
कार्तिकेय…?
लेकिन सामने अब सिर्फ़ एक सफेद मासूम बिल्ली थी, जो उसे देख रही थी। उसकी आँखों में वही इंसानी चेतावनी अभी भी मौजूद थी। टुक-टुक ने हल्का सा म्याऊँ किया…
जैसे कह रहा हो—
समय कम है… संभल जाओ…।
और फिर वो धीरे से शानवी के पास आ गया, जैसे खुद को उसके भरोसे छोड़ रहा हो। बाहर सूरज पूरी तरह निकल चुका था…लेकिन अंदर का सच अब और भी बड़ा और खतरनाक हो चुका था। 🌅🔥
शानवी ने टुक-टुक को अपनी बाहों में कसकर उठा लिया।
उसकी आँखों में अब पहले वाला गुस्सा नहीं था, बल्कि एक अजीब सा फैसला था—डर के साथ लिया गया फैसला। वो चुपचाप घर से निकल पड़ी। सड़कें पार करती हुई, हर मोड़ पर पीछे मुड़कर देखती हुई, जैसे उसे हर छाया में कोई खतरा दिख रहा हो।
दिल में बस एक ही आवाज़ थी—
अब मुझे उसे बचाना है…
कुछ दिनों बाद उसने एक बड़ा फैसला लिया। उसने अपना ट्रांसफर करवा लिया और दिल्ली छोड़ दी। अब वो मुंबई में थी। 🌆 छोटे से फ्लैट में, नई ज़िंदगी के साथ… लेकिन वही पुराना डर अभी भी उसके साथ था। टुक-टुक उसके साथ ही था। लेकिन अब वो पहले जैसा शांत नहीं था। उसकी आँखों में भी वही बेचैनी थी—जैसे वो जानता हो कि ये दूरी भी उन्हें पूरी तरह सुरक्षित नहीं कर सकती।
शानवी कभी-कभी बालकनी में खड़ी होकर दूर शहर की रोशनी देखती।
और मन ही मन सोचती—
क्या मैं सच में सही कर रही हूँ… या मैं बस भाग रही हूँ?
टुक-टुक उसके पास आकर धीरे से उसके पैरों में बैठ जाता।
उसकी आँखों में वही पुरानी चेतावनी होती थी—
खत्म नहीं हुआ… अभी भी सब बाकी है…
मुंबई की रातें बड़ी थीं…लेकिन शानवी और टुक-टुक के बीच का सन्नाटा उससे भी बड़ा था। 🌙🐾