यात्रा Pandey SaKsHaM द्वारा यात्रा विशेष में हिंदी पीडीएफ

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यात्रा

पहाड़ पर चढ़ते समय आपका कम से कम श्रम लगना चाहिए. उसे फ़तह करने जैसी कोई इच्छा भी आपके भीतर नहीं होनी चाहिए. आपके अपने स्वभाव की वास्तविकता ने तय करना चाहिए आप किस रफ़्तार से चढ़ेंगे. ऐसा करते हुए अगर आप बेचैन हो जाते हैं तो रफ़्तार बढ़ा दें. हांफने लगें तो धीमे हो जाएं. 

पहाड़ पर चढ़ना बेचैनी और थकान के बीच संतुलन कायम करना होता है. जब आप बहुत आगे के बारे में न सोच रहे हों, आपका हर कदम न केवल एक गंतव्य हो जाता है, वह अपने आप में एक अद्वितीय घटना भी बनता है. आप अपने आसपास के माहौल का जायजा लेना शुरू करते हैं. जमीन पर गिरे इस सूखे पत्ते के किनारे दांतेदार हैं. सामने इस जगह पर चट्टानें ढीली हैं. इस स्थान से बर्फ कम नज़र आती है. ये वे चीजें हैं जिन पर आपने वैसे भी गौर करना चाहिए. सिर्फ भविष्य के किसी लक्ष्य के लिए जीना एक खोखली बात है. असल जीवन पहाड़ की बगलों में होता है, चोटी में नहीं. चीजें वहीं उगती हैं.

लेकिन अगर चोटी न हो तो पहाड़ की बगलें भी नहीं होंगी. चोटी से ही उसकी बगलों को परिभाषित किया जा सकता है. हम इसी तरह चढ़ना सीख सकते हैं – एक बार में एक कदम – कोई हड़बड़ी नहीं. 

पहाड़ पर चढ़ने को लेकर रॉबर्ट परसिग की किताब ‘जेन एंड द आर्ट ऑफ़ मोटरसाइकिल मेन्टेनेन्स’ में एक से एक शानदार बातें पढ़ने-समझाने को मिलती हैं.

रॉबर्ट परसिग की इस आत्मकथात्मक किताब का नायक दो तरह के जीवन मूल्यों से उपजने वाले संघर्ष का समाधान ढूँढने निकला है – एक तरफ शास्त्रीय मूल्य हैं जो मोटरसाइकिल जैसी मशीनों का निर्माण करते हैं, दूसरी तरफ रूमानी मूल्य हैं जिनकी मदद से आप गाँवों से गुज़र रही किसी सड़क की खूबसूरती का अनुभव करते हैं. 

स्कूल से लेकर यूनिवर्सिटी तक की पढ़ाई में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले रॉबर्ट परसिग ने दर्शनशास्त्र में डिग्री हासिल की, तकनीकी लेखक और अंग्रेज़ी अध्यापक के रूप में काम किया लेकिन 1960 के दशक के शुरुआती सालों में उन्हें मानसिक बीमारी से गुज़रना पड़ा जिसकी वजह से उनका लंबा समय अस्पतालों और पागलखानों में बीता. 

अस्पताल के इन अनुभवों ने उनके जीवन दर्शन को उलझा कर रख दिया जिसे राह पर लाने के लिए उन्होंने 1968 में ग्यारह साल के अपने बड़े बेटे क्रिस्टोफर के साथ 17 दिन की एक मोटरसाइकिल यात्रा की. परसिग तब चालीस के हो चुके थे. यही यात्रा ‘जेन एंड द आर्ट ऑफ़ मोटरसाइकिल मेन्टेनेन्स’ की बुनियाद बनी. 

यात्रा के शुरुआती नौ दिनों में पिता-पुत्र के साथ उनके नज़दीकी परिचित जॉन और सिल्विया भी रहते हैं. यात्रा के दौरान उनके साथ तमाम विषयों पर वार्तालाप चलते रहते हैं. इन वार्तालापों में प्राचीन रोमन, ग्रीक, जापानी और अन्य दार्शनिक सिद्धांतों को कसौटी पर घिसा जाता है. परसिग यह सारी जद्दोजहद जीवन को समझने के लिए भी कर रहे हैं और अपने बीते समय को स्वीकार करने के लिए भी. 

‘जेन एंड द आर्ट ऑफ़ मोटरसाइकिल मेन्टेनेन्स’ के सिद्धांत को एक वाक्य में यूं कहा जा सकता है – अगर कोई काम किये जाने लायक है तो वह बेहतर तरीक़े से किये जाने लायक भी होता है. 

तुर्की के कवि नाजिम हिकमत की तरह रॉबर्ट परसिग भी बार-बार इस बात को दोहराते चलते हैं कि आपने हर दिन को ऐसे जीना चाहिए जैसे आप अनंत काल तक जिये चले जाएंगे लेकिन उस जीने में यह अहसास भी शामिल होना चाहिए कि हर दिन आपका आख़िरी दिन है. ये सवाल एक ही समय में आपको उम्मीद से भी भरते हैं और यातना से भी. 

भाषा और दर्शन के विविध स्तरों पर समानांतर चलने वाले इस उपन्यास का नैरेटिव अलग-अलग तरीकों से जीवनदर्शन, विज्ञान के इतिहास, प्रकृति, साहस और मशीनों जैसे विषयों को छूता चलता है. आप एक चीज की उपस्थिति को समझना शुरू करते हैं दूसरी चीज सामने आ जाती है जिसे समझा जाना उतना ही महत्वपूर्ण है. फिर तीसरी फिर चौथी. यह क्रम चलता रहता है और किताब के समाप्त होने पर आप एक बेहतर मनुष्य होकर निकलते हैं जिसके प्रश्नों और विचारों में स्पष्टता की मुलायम रोशनी है.

रॉबर्ट परसिग की इस किताब को छपने से पहले एक सौ इक्कीस प्रकाशकों ने अस्वीकार किया. ‘जेन एंड द आर्ट ऑफ़ मोटरसाइकिल मेन्टेनेन्स’ से परसिग किसी तरह का लाभ कमाने की उम्मीद नहीं थी. यह अलग बात है उसका अनुवाद सत्ताईस भाषाओं में हुआ और अकेले अंग्रेज़ी में उसकी पचास लाख से ज्यादा प्रतियाँ बिकीं.

अपने यहां फुटपाथ पर किताब बेचने वाले हर दुकानदार के पास इसकी कम से कम एक पायरेटेड कॉपी तो होती ही है. शानदार किताब है. पढ़ी जानी चाहिए.