शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (83) Ramesh Desai द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (83)

                

                 शहद की गुड़िया -  प्रकरण 83

         " संजना के साथ भगवान ने उन्हें दूसरा उपहार दिया था."

         "उस का नाम माया था."

          " ऊस के पति ने भी दादू के साथ रिश्तो को तहेदिल से कबूल किया था."

          " सचमुच प्यार के मुआमले में भगवान दादू पर बड़ा मेहरबान था."

        " माया सचमुच प्यार की अनमोल मिशाल थी.  उस की  दो संतान थी जो जवानी की दहलीज पर आकर ख़डी थी. लड़का चिनाई में काम करता. उस का पति का भी खुद का धंधा था. वह सोसायटी का सेक्रेटरी था. वह प्रभु का चुस्त भक्त था. दिन में चार पांच घंटे भगवान की सेवा में व्यस्त रहता  था. वह अपनी बीवी माया से बहुत प्यार करता था. दोनों सुखी दाम्पत्य जीवन बिता रहे थे."

             " दादू ने ऊस की बहन का काम किया था. तब से उन की पहचान बनी थी. उस बात को काफ़ी समय बीत गया था. फिर दोबारा दादू इस दम्पति को मिले थे.  और दोनों ने बडे विश्वास और आस्था के साथ यह रिश्ता  निभाया  था. "

               " माया के पति को भी दादू पर बड़ा विश्वास था. वह हमेशा  दादू से कहता रहता था."

               " आप हमारे घर आते रहना! "

               "  उस के पति का नाम मनोज था. वह दो बजे के बाद काम पर निकलता था. और देर रात घर लौटता था. "

               " उस के किसी ने पैसे हड़प लिये थे जो वापस देने का नाम नहीं लेता था.  उस बात का मनोज को हमेशा दुःख रहता था."

              " कर्जदार  से पैसे वापस लेने के लिये ऊस ने स्टंट किया था. ऊस ने पार्टी को दादू के सामने पैसे के लिये फोन किया था. और स्पीकर चालू किया था. दादू ने ऊँची आवाज में पैसे की डिमांड की थी."

              " पार्टी एक महिला थी. वह ऊस वक़्त बैंक में थी. ऊस ने बाद मैं फोन करती हूं. कहकर फोन काट दिया था."

                " दादू घर से निकल रहैं थे . ऊस समय उन्होंने  मना करते हुए दादू की कमीज की जेब में 200 रूपये की नोट सरका दी थी."

                " उन दोनों पति पत्नी को को दादू की तरह भगवान पर अटूट विश्वास था."

                 " माया हर समय दादू की खातिर दारी करती थी. कभी भी उन्हें बिना चाय नास्ता कराये बिना छोड़ती नहीं थी. "

                  " दादू शुरु में सुबह रात उसे मेसेज करते थे और वह भी उन्हें जवाब देती थी. रात को दो बजे उस के पति के घर पहुंचने के बाद अचूक वह दादू के मेसेज का जवाब देती थी."

                 " दादू उन दिनों काफ़ी परेशान थे. उन्होंने अपनी कहानी बताई थी. सुनकर माया ने सहानुभूति व्यक्त की थी."

                 " घर में लडके की वजह से काफ़ी तनाव पैदा होता था.  क्षितिज के कारण आरती की हालत बिगड गई थी. वह भी कुछ ना कुछ बकबक करती रहती थी. दोनों के बीच 24 घंटे कुछ ना कुछ गरमा गरमी होती रहती थी. इस स्थिति में दादू  बिल्कुल कंटाल गये थे. उन्हें घर छोड़कर भाग जाने का मन करता था. "  

           "ओल्ड एज होम ' में भर्ती होने का ख्याल आता था. लेकिन वह दोनो दादू के बिना एक कदम भी चलने को सक्षम नहीं थे . वह कुछ नहीं कर सकते थे. इस लिये दादू चाहते हुए भी दोनों को अकेला छोड़ नहीं सकते थे. "

              " दादू ने अपनी समस्या उस के सामने बयान की थी. सुनकर उसे बहुत दुःख हुआ था. उस ने दादू को आश्वस्त भी किया था. उस के हर क़ोई मेसेज अपने आप प्रेरणा स्रोत बन जाता था."

          "  वह  बारबार उन के घर जाते थे. वह दादू का पूरा ख्याल करती थी. दादू को चाय नास्ता करवाती थी. और बदले में उन्हें अहसान फरामोश होने का ख्याल आता था. वह उन को अपने घर बुलाकर उन की खातिरदारी करना चाहते थे लेकिन आरती की मानसिकता को लेकर समस्या खड़ी होगी, ऐसा सोचकर वह चाहते हुए भी उन्हे घर नहीं बुला पाते थे. "

         " आरती ने कुछ उल्टा सुलटा बोलकर कुछ बोल दिया तो? "

          " यह सवाल उन्हें खटकता था. रिश्ता दोनों तरफ तराजू की तरह समतौल होना चाहिये.. लेकिन यहाँ रिश्ता एक तरफी हो रहा था. उस के लिये दादू ने माया की माफ़ी मांगी थी.  "

         " मा बेटे के चुप रखने के लिये झूठ ही उन का सहारा बन गया था. उन्हें हर बात में झूठ बोलना पड़ता था. उन्होंने आरती से  माया के परिवार से संबंध होने की बात भी मजबूरन छिपाई थी."

           " माया को रोज तो मिलना संभावित नहीं था.. क्यों की दोनों घरों के बीच बीच काफ़ी दुरी थी. दादू पालघर में रहते थे और वह विरार में."

           " महिने में एक बार कैसे भी बहाना बनाकर दादू दोनों को मिलने जाते थे .. यह गलत था.. लेकिन उन्होंने घर की शांति बरकरार रखने के liye, घर की शांति के लिये झूठ बोलना पड़ता था जो सच्चाई से बढ़कर था."

           " मनोज बहुधा सेवा पूजा में व्यस्त रहता था. उस के लिये उस से ज्यादा बातें नहीं होती थी, फिर भी वह ईश्वर प्रति मेरी आस्था से बड़ा प्रभावित होता था., मेरी कद्र करता था."

             " दादू ने क्षितिज के लिये सब कुछ किया था. लेकिन उसे अपने बाप की कोई कद्र नहीं थी. वह दादू को बाप भी नहीं कहता था.. कभी उन का हालचाल भी नहीं पूछता था. "

              " उस के लिये शेयर बाजार के सिवा और कुछ बचा नहीं था. वह बाकी समय में एक घाटी की तरह काम करता था. सुबह छह बजे उठकर वह सभी चीजे इधर उधर लगाने में व्यस्त हो जाता था. "

              " घर में वोशिंग मशीन में कपड़े धोना, पोता लगाना.. इत्यादि कामों में जुड़ जाता था. एक मिनिट भी वह शांति से बैठता नहीं था."

              " उस की जुबान भी  एक मिनिट शांत नहीं रहती थी. "

               " किसी की क़ोई भी बात सुनकर वह जोरो से बात कर के सारी दुनिया को बताता था."

               " उस के ऐसे रवइये से दादू को गुस्सा आता था. ऊस की आवाज का वॉल्यूम बढ़ जाता था. उस के लिये वह खुद जिम्मेदार था.. फिर भी सारा दोष अपने बाप पर मढ़ देता था."

             " और कहता था: "

             " तुम्हारे चिल्लाने की वजह से सोसायटी वाले तुम्हे घर से निकाल देंगे. "

              " किसी भी बात को सीधे अर्थ में  ले नहीं सकता था."

               " आरती का दिमाग़ भी उस ने बिगाड़ दिया था."

             "  वह एक मा होकर अपने बेटे की हालत का अनादर करती थी."

             "वह अंधा था. यह जानते हुए भी वह अपने बेटे से नोर्मल व्यकित की तरह हर चीज की अपेक्षा करती थी, हर छोटी मोटी गलती के लिये बडबडाती रहती थी."

            " क्षितिज किसी का एक शब्द भी सुन नहीं पाता था. एक शब्द के बदले दस शब्दों से जवाब देने के बाद भी चुप नहीं रहता था. उस की जुबान रुकने का नाम नहीं लेती थी..उस की बातों से उबकर वह क्षितिज पर हाथ उठाती थी तो वह अपनी मा को सामने से मारता था."

              "घर में पूरा दिन उन दोनों की बहस चालू रहती थी.  उन की शाब्दिक लड़ाई का अंत नहीं आता था. इस स्थिति में घर में रहना मुश्किल हो जाता था. जाऊं तो कहाँ जाऊं? दादू दुविधा में रहते थे. "

            " एक पढ़े लिखे लडके ने नकारात्मक सोच की उंगली पकडकर अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारी थी, यह बात वह समझ नहीं पाता था . डोक्टर की बात को मानकर उस ने अपने सारे हथियार फेंक दिये थे."

        " उस के सामने दादू ने एक जिवंत उदाहरण पेश किया था."

          "एक आदमी चिंता ग्रस्त स्थिति में मौत के करीब पहुंच गया था. डोक्टर ने उस के बारे में आगाही की थी."

        " छह महिने में आप की मृत्यु हो जायेगी "

         " उस की उम्र  24-25 साल के करीब थी."

          " उस समय उस ने डेल कारनेगी की लिखी हुई किताब  ' How to stop worrying and start living ' किताब पढ़ने की किसी दोस्त ने उसे सिफारिश की थी.  और वह 82 साल तक जिया था.."

           " दादू ने यह किस्सा क्षितिज को सुनाया था.वह बिना वजह किसी छोटी मोटी बातों में चिंता करने लगता था.. वह जैसा सोचता था वैसा होता नहीं था..लेकिन फालतू चिंता ने उसे बीमार कर दिया था और अपनी बर्बादी का प्रणेता बनने जा रहा था."

       " उस वक़्त वोही किताब उस के काम आई थी."

        " और वह बड़ी लंबी जिंदगी जीने का हकदार हो गया था. "

          "लेकिन क्षितिज में  क़ोई सुधार नहीं आया था."

           " उस की मा का दिमाग़ उस ने ख़राब कर दिया था. उस की सारी हरकते दादू के दिमाग़ ख़राब कर रही थी.

                        000000000000   ( क्रमशः)

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