शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (75) Ramesh Desai द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (75)

                   शहद की गुड़िया- प्रकरण 75

         " दादू की सासु मा ललिता पवार का अंतिम दौर चल रहा था. बिन हक का खाना खाकर उन का पेट मानो फट सा गया था. उन्हें कई बीमारियो ने अपनी गिरोह में लपेट लिया था. "

          "उन को खुद को एक लड़का था. जो कई सालो से बिस्तर में केवल सांसे गिन रहा था. वह मा बाप की गैर कानूनी तरीके से जमा की गई संपत्ति पर साप की भ्रान्ति बैठ गया था, लेकिन उस का क़ोई उपभोग कर नहीं पाया था. "

       " इस बात का तो क़ोई भी इन्कार नहीं हो  सकता था."

        " साथ में तो क़ोई आदमी एक छोटी सी सुई भी साथ नहीं ले जाता. फिर किस के लिये उन्हों ने गलत तरीके से पैसे जमा किये थे?!! ."

        " बिन हक्क के पैसे पर किसी का गुजारा नहीं होता हैं."

         " पिछले दिनों में बड़ी मा की हालत बड़ी नाजुक थी.. इस स्थिति में उन के बारे के ना सोचते हुए वह उन के पैसों का हिसाब कर रहे थे."

         "उन को अपने साथ रखने को भी तैयार नहीं थे. उन दिनों मैंने उन्हें अपने घर में पनाह दी थी, उन की सेवा श्रुश्रुषा की थी. वह मुझे पैसा देने को तैयार थे. लेकिन ललिता पवार ने हाथ चालाकी कर के ऐसा होने नहीं दिया था. "

        " समय और ईश्वर किसी को नहीं छोड़ता.."

        " आशुतोष उस को अपने साथ रखना चाहता था, लेकिन वह खुद दूसरों के घर में रहता था. इस स्थिति में वह लाचार, विवश था."

         " आदमी कितना भी गलत करे,  लोगो के साथ धोखा गर्दी करे लेकिन उस का क़ोई फायदा नहीं होता हैं.."

        " भगवान हर किसी की छोटी मोटी, अच्छी बूरी बातों को बराबर अपने तराजू में तोलकर  हिसाब करता हैं, उस के बारे में फैंसला करता हैं, उस का न्याय करता हैं."

         " ललिता पवार का पाप का घड़ा भरकर फट गया था. जिस के बदले में उन्हें महेंगी बीमारी का वरदान मिला था.  और उन्हे सभी चीजों से हाथ धोने का समय आया था. "

          " उस के बेटे ने भी बहुत पाप किये थे. देख नहीं पाता था, फिर भी अपनी मा की तरह अपने पिताजी को काफ़ी प्रताड़ित किया था. "

         "  वह शेष जिंदगी बिस्तर का मेहमान बनकर रह गया था. "

        " सब कुछ पास था लेकिन उस के लिये ना के बराबर था. क्यों की वह उस का इस्तेमाल करने के लायक नहीं बचा था. "

       "  भगवान ने उसे तीन संतान दिये थे."

        " लड़का विदेश में रहता था. वह अपनी दादी मा के नक्शे कदम पर चलता था.. उस ने भी बहुत गलत किया था. उस की भगवान ने उसे सजा दे दी थी. उस की बीवी एक लड़की को छोड़कर चली गई थी. "

         " फिर भी उसे अपनी दादी मा की तरह ज्यादा अकड़ थी, बड़ा गुमान था."

          "  उस का बाप अंधा था. इस लिये स्वदेश में रहकर उसे अपने पिताजी को सँभालने की जरूरत  थी,  लेकिन उस ने अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया था, जिस के लिये भी भगवान ने उसे नहीं बक्शा था."

       " उस की लड़की को भी भगवान ने क़ोई बीमारी का उपहार दिया था. वह अपने ससुराल में सुखी नहीं थी."

         " पति पत्नी के बीच हमेशा मनमुटाव रहता था."

          "  इन सभी के बीच दादू के साले की बहु घंटी के दो पड़ो के बीच पिसती रहती थी. उस के नसीब में क़ोई सुख नहीं था. "

          "  उन का साला बिस्तर मे पड़ा था.. देख नहीं सकता था.. "

           "ललिता पवार ने धोखे से अपने बेटे को उस के गले बांधा था. उस की भी भगवान ने उन्हें सजा दी थी."

       " लंबा जीवन मिले वह अच्छा हैं लेकिन वह ज्यादा कुकर्मो की बदौलत मिलता हो तो उस का कया मतलब? ललिता पवार की लंबी जिंदगी का यही रहस्य था."

        " उन्हों ने अपनी जेठानी की दुकान और बिल्डिंग पर भी कब्जा कर लिया था. बड़ी मा ने दूसरा फ्लेट ख़रीदा था और तृषाली को दे दिया था."

       "  सुहानी ने बड़ी मा की जगह को लेकर अपनी मा से झगड़ा किया था, लेकिन मा की जो हुकमी के सामने उस की एक नहीं चल पाई थी. "

       " उस ने तो हक से अपनी मा से जो बनता था वह ले लिया था."

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         "सभी बहनों में तृषाली किस्मत वाली थी. उस की जिंदगी में काफ़ी उतार चढाव आया था. बहुत तकलीफे भुगती थी उस के लिये वह खुद जिम्मेदार थी, लेकिन असल में ललिता पवार का हीं दोष था. हसमुख की तरह उन्हों ने बाबू को भी अपने घर में घुसने दिया था, जिस की भारी किंमत चुकाई थी. सुहानी की तरह उस की जिंदगी में दो लडके आये थे. वह दोनों तृषाली को प्यार करते थे."

        "अगर उस ने बाबू की जगह दूसरे लडके को चुना होता तो इतनी सारी मुसीबतों से गुजरना नहीं पड़ा होता. दूसरे लडके के मा बाप उसे बहु बनाने तैयार थे. लेकिन ललिता पवार को यह रिश्ता कबूल नहीं था. "

         "  उस के सास ससुरने सारी मिल्कत तृषाली ओर उस के बेटो के नाम कर दी थी. आशुतोष से शादी के बाद उस ने दूसरे लडके को जन्म दिया था."

           " बड़ी मा की मौत भी एक बड़ा रहस्य था."

           "ऐसा कहां जाता था, ललिता पवार ने अपनी जेठानी को चौथी मंज़िल की गेलेरी से धक्का देकर नीचे फेंक दिया था. जिस के बदले उन्हो ने आख़री पांच साल जिंदा लाश बनकर गुजारने पड़े थे.. "

          " वह क्या थे? उन्हों ने क्या क्या किया था? कितने लोगो को परेशान किया था? किस का खून पिया था. वह एक बड़ा इतिहास था. शायद उस के लिये उन की क़ोई गलती नहीं.  मा बाप ने इकलौती बेटी को कुछ अच्छा सिखाना जरूरी नहीं समझा था.. पानी मांगे तो बेटी को दूध मिलता था. इस स्थिति में वह क्या सिखेगी? ..खूब लाड प्यार की  वजह से उन्हों ने कुछ भी सही सिख़ने की जरूरत भी नहीं समजी थी. "

           उन की तरह मा ने भी घर में किसी गलत आदमी को घुसने दिया था, जिस ने उन की जिंदगी उजाड़ कररख दिया था. "

          " ललिता पवार और पड़ोस के उस लडके में अच्छी बनती थी. दोनों भाई बहन हैं. यह मानकर उस की मा ने क़ोई एतराज नहीं दर्शाया था. "

        " लेकिन बात कुछ ओर थी. दोनों भाई बहन का पहनावा उतारकर आगे निकल गये थे. उस की मा ने उस लडके के साथ विवाह करने से मना किया था. और उन्हों - ने दिखावे के लिये भाई बहन का रिश्ता स्वीकार लिया था. "

          "ललिता पवार की मा ने उस पर भरोसा किया था. और दोनों ने उन का विश्वास घात किया था. शादी हो जाने के बावजूद दोनों चोरी छुपी मिलते थे और अपनी प्यास बुझाते थे.  जिस के फल स्वरूप सुहानी का जन्म हुआ था. जिस का किसी को पता नहीं था.  लेकिन दोनों के चेहरे उस बात की चाड़ी खाते थे."

                    000000000000      ( क्रमशः )