फिर क्या था…चट मंगनी, पट ब्याह! हवेली एक बार फिर सज उठी। इस बार दुल्हन थी — पारो। सादगी भरा लाल जोड़ा, माथे पर सिंदूर…चेहरे पर हल्की घबराहट, लेकिन आँखों में भरोसा।
शादी पूरे रीति-रिवाज से हुई। मोहन ने फेरे लेते समय पारो का हाथ कसकर थामा —
जैसे वादा कर रहा हो —
अब कभी अकेली नहीं छोड़ूँगा।
पूजा भी ससुराल से आई थी। अपनी छोटी भाभी को देखकर वह खिल उठी।
पूजा (हँसते हुए) बोली—
अब तो आपकी भी देवरानी आ गई! भाभी, अब आप अकेली नहीं रहीं।
संस्कृति मुस्कुराई। सच में… उसकी देवरानी आ चुकी थी।
अगले दिन मुंह दिखाई की रस्म थी। हवेली में पड़ोस की औरतें आईं। गहनों की छनक… मीठी बातें… और बीच-बीच में ताने।
पारो घूंघट में चुप बैठी थी। एक औरत ने घूंघट उठाया…चेहरा देखा… और हल्का सा मुंह बना लिया।
दूसरी ने धीरे से फुसफुसाया —
अरे… रंग तो दबा हुआ है…मोहन जैसा गोरा लड़का… और ये?
कुछ ने नकली मुस्कान दी…कुछ ने नजरें चुरा लीं। वो शब्द भले धीमे थे…पर तीर की तरह पारो के दिल में लगे। रस्म खत्म होते ही वो चुपचाप अपने कमरे में चली गई। दरवाज़ा बंद… और आँसू खुलकर बह निकले।
पारो आईने के सामने खड़ी थी। आँसू उसके काजल को बहा रहे थे।
वो खुद से ही कह बैठी —
शायद मोहन जी को मुझसे बेहतर मिल सकता था…
तभी दरवाज़ा धीरे से खुला। संस्कृति अंदर आई। उसने कुछ नहीं पूछा…बस चुपचाप पारो को गले लगा लिया।
पारो फूट पड़ी और बोली—
भाभी… मैंने कोशिश की थी मजबूत बनने की…
लेकिन सबकी बातें… सह नहीं पाई…
संस्कृति ने उसके आँसू पोंछे।
संस्कृति (दृढ़ स्वर में) बोली—
तुम्हें मजबूत बनने की ज़रूरत ही क्यों है?
गलती तुम्हारी नहीं… सोच की है।
कुछ देर बाद संस्कृति बाहर आँगन में आई। वो सिर्फ इस घर की बहू नहीं थी…एक इंजीनियर थी — पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर, आत्मसम्मानी। पड़ोस की औरतें अभी भी बैठी थीं।
संस्कृति ने मुस्कुराते हुए कहा —
आप सब आईं, धन्यवाद।
पर जाते-जाते एक बात कहना चाहती हूँ।
सबकी नजरें उसकी ओर मुड़ गईं।
संस्कृति बोली—
हम इंजीनियर लोग जब कोई इमारत बनाते हैं,
तो उसकी नींव देखते हैं… रंग नहीं।
क्योंकि असली मजबूती नींव से आती है।
आँगन में सन्नाटा।
वो आगे बोली —
मेरी देवरानी की नींव बहुत मजबूत है —
उसका दिल साफ है, इरादे पक्के हैं।
और हमारे घर में इंसान की कीमत उसके रंग से नहीं…
उसके चरित्र से तय होती है।
एक औरत कुछ बोलने लगी —
अरे बहू, हमने तो बस यूँ ही…
संस्कृति ने विनम्र लेकिन सख्त आवाज़ में कहा —
यूँ ही कहे गए शब्द भी किसी का आत्मसम्मान तोड़ सकते हैं।
हम चाहते हैं कि हमारी हवेली से नई सोच शुरू हो।
अब किसी के पास जवाब नहीं था। एक-एक कर औरतें उठने लगीं। संस्कृति वापस कमरे में गई। पारो अब भी चुप बैठी थी।
संस्कृति ने उसका चेहरा ऊपर उठाया और बोली—
आज तुमने कुछ नहीं खोया…बल्कि इस घर ने तुम्हें पाकर गर्व पाया है।
तभी मोहन भी अंदर आया। उसने पारो के आँसू देखे…और बिना कुछ कहे उसके सामने घुटनों पर बैठ गया।
मोहन बोला—
अगर दुनिया कुछ कहे… तो कहने दो।
मेरे लिए तुम सबसे खूबसूरत हो।
पारो की आँखों में इस बार आँसू थे…पर दर्द के नहीं… अपनापन के। हवेली के आँगन में शाम की हवा चल रही थी। संस्कृति बालकनी में खड़ी थी।
कार्तिक ने पीछे से आकर पूछा —
फिर से लड़ाई जीत ली?
संस्कृति मुस्कुराई और बोली—
नहीं… बस सोच को थोड़ा सुधार दिया।
कार्तिक ने उसका हाथ थाम लिया। इस हवेली में अब सच में बदलाव था। जहाँ कभी साज़िशें थीं…अब वहाँ सम्मान, बराबरी और प्यार था। ❤️
एक दोपहर…संस्कृति अलमारी में कुछ ढूँढ रही थी। पुराने फाइल्स, कागज़ात, सर्टिफिकेट्स… तभी एक पारदर्शी फोल्डर उसके हाथ लगा। उस पर लिखा था — Paro Rajvanshi
संस्कृति ने उत्सुकता से फाइल खोली…और जैसे ही उसकी नज़र मार्कशीट पर पड़ी वो सचमुच दंग रह गई।
Diploma in Electronics Engineering
MCEA — USA
संस्कृति की आँखें सच में फैल गईं।
वो बोली -
ये… ये तो अमेरिका से पढ़ाई की है!
उसी समय पारो कमरे में आई।
पारो बोली —
भाभी… आप कुछ ढूँढ रही थीं?
संस्कृति ने फाइल उठाकर उसकी ओर देखा।
संस्कृति (हैरानी से) बोली —
ये सब क्या है, पारो?
तुमने Electronics Engineering में डिप्लोमा किया है? वो भी USA से?
पारो थोड़ा सकुचा गई।
पारो बोली—
हाँ भाभी… पापा ने ज़िद करके मुझे बाहर भेजा था।
मैंने MCEA से डिप्लोमा किया… कुछ प्रोजेक्ट्स भी किए।
लेकिन… शादी के बाद सोचा… अब घर ही संभालूँगी।
संस्कृति ने तुरंत उसकी बात काट दी।
संस्कृति बोली —
क्यों?
इतनी पढ़ाई सिर्फ अलमारी में रखने के लिए की थी?
पारो चुप।
संस्कृति ने कुर्सी खींचकर उसके सामने बैठते हुए कहा —
सुनो पारो,अगर तुम USA से पढ़कर आई हो…
तो तुम यहाँ भी नौकरी कर सकती हो।
तुम्हारी डिग्री, तुम्हारा हुनर — ये तुम्हारी पहचान है।
पारो की आँखों में संकोच था।
पारो बोली
लेकिन भाभी… लोग क्या कहेंगे?
अभी तो… मुंह दिखाई वाली बातें भी खत्म नहीं हुईं…।
संस्कृति की आवाज़ मजबूत हो गई।
संस्कृति बोली -
लोगों ने रंग पर बात की…अब अगर तुम्हारी काबिलियत पर बात करें…तो उन्हें करने दो।
तुम इस हवेली की बहू हो…लेकिन उससे पहले तुम एक इंजीनियर हो।
उसी वक्त दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई। मोहन अंदर आया।
मोहन बोला -
क्या सीरियस मीटिंग चल रही है?
संस्कृति मुस्कुराई और बोली—
देवर जी आपकी पत्नी की असली पहचान सामने आई है।
मिस पारो राजवंशी — Electronics Engineer from USA!
मोहन पहले तो हैरान हुआ…फिर गर्व से पारो की ओर देखा।
मोहन बोला
सच में?
और मुझे बताया भी नहीं?
पारो धीरे से बोली —
डर था… कहीं तुम्हें लगे कि मैं… बहुत आगे हूँ।
मोहन तुरंत बोला —
पागल हो क्या?
मुझे तो गर्व है कि मेरी पत्नी मुझसे भी ज़्यादा पढ़ी-लिखी है!
संस्कृति ने मुस्कुराकर कहा —
तो तय रहा।
हम पारो का रिज़्यूमे बनाएँगे।
और इंटरव्यू की तैयारी भी करेंगे।
पारो की धड़कन तेज हो गई।
पारो बोली -
लेकिन भाभी… इतने साल हो गए…क्या मैं कर पाऊँगी?
संस्कृति ने उसका हाथ थाम लिया और बोली—
तुम सिर्फ करोगी नहीं…चमकोगी।
उस शाम हवेली के आँगन में नई चर्चा थी।अब बात सिर्फ रिश्तों की नहीं…सपनों की थी। संस्कृति बालकनी में खड़ी थी।
कार्तिक ने पीछे से पूछा —
फिर क्या प्लान है, मैडम इंजीनियर?
संस्कृति मुस्कुराई —
अब इस हवेली की बहुएँ सिर्फ घर नहीं…भविष्य भी संभालेंगी।
और नीचे…पारो पहली बार खुद को सिर्फ “सांवली बहू” नहीं…
बल्कि इंजीनियर पारो राजवंशी महसूस कर रही थी। ✨
कुछ दिन शांति से बीत गए। पारो अपने जॉब की तैयारी में लगी थी। हवेली में सब सामान्य था। लेकिन एक सुबह…पारो को अचानक एहसास हुआ उसके पीरियड्स शुरू हो गए थे। उसके हाथ काँप गए। उसे कॉलेज के दिन याद आ गए…
जब मोहन ने मज़ाक-मजाक में बताया था —
हमारे घर में लड़कियों को पीरियड्स होने पर कलकोठरी में अलग रख दिया जाता है…।
तब सब हँस पड़े थे…पर आज वही बात पारो के दिल में डर बनकर उतर गई।
पारो बोली -
कहीं… मुझे भी…?
उसकी साँस तेज हो गई। उसने किसी को कुछ नहीं बताया। चुपचाप अपने कमरे में बंद हो गई। दर्द से दोहरी हो रही थी…
और डर से भी। तकिये में मुँह छुपाकर वो फूट-फूट कर रोने लगी।
वो बोली -
अगर सबको पता चल गया तो…?
क्या मैं फिर से अलग कर दी जाऊँगी…?
संस्कृति नीचे से ऊपर आ रही थी। उसे लगा पारो आज कुछ ज्यादा चुप है। दरवाज़ा खटखटाया।
संस्कृति बोली -
पारो? सब ठीक है?
कोई जवाब नहीं। संस्कृति ने दरवाज़ा हल्का सा खोला। अंदर पारो सिकुड़ी हुई बैठी थी… आँखें लाल। संस्कृति तुरंत उसके पास बैठ गई।
संस्कृति बोली -
क्या हुआ?
पारो ने पहले सिर हिलाया और बोली—
कुछ नहीं।
लेकिन आँसू खुद बोल पड़े।
बहुत पूछने पर वो हकलाते हुए बोली —
भाभी… वो… मेरे पीरियड्स…और… आपने सुना होगा… इस घर में…।
संस्कृति समझ गई। उसने गहरी साँस ली…।
फिर बहुत शांत लेकिन मजबूत आवाज़ में कहा —
पारो, मेरी तरफ देखो।
पारो ने काँपती आँखों से ऊपर देखा।
संस्कृति बोली—
ये 2037 है।
और ये हवेली अब वो नहीं रही जो पहले थी।
पीरियड्स कोई अपवित्रता नहीं…ये तो तुम्हारे शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया है।बजिससे एक दिन तुम माँ भी बन सकोगी। पारो की आँखों में हैरानी थी।
पारो बोली -
तो… मुझे कहीं अलग नहीं रहना होगा?
संस्कृति हल्का सा मुस्कुराई।
संस्कृति बोली -
अगर अलग रहना है… तो सिर्फ आराम के लिए।
दर्द कम करने के लिए।
सज़ा के लिए नहीं।
पारो की आँखों से राहत के आँसू बह निकले। तभी कार्तिक भी कमरे के बाहर आ गया।
संस्कृति ने साफ शब्दों में कहा —
इस घर में अब कोई भी लड़की अपने पीरियड्स के कारण अलग नहीं की जाएगी।ये फैसला आज से नहीं… हमेशा के लिए है।
कार्तिक ने बिना झिझक कहा —
बिलकुल।
ये सब पुरानी गलत परंपराएँ थीं।
अब हमारे घर में सिर्फ सम्मान रहेगा।
मोहन भी आ गया। जब उसे पारो के डर का पता चला… तो वो खुद शर्मिंदा हो गया।
वो बोला -
मुझे वो बात मज़ाक में भी नहीं कहनी चाहिए थी…।
वो पारो के पास बैठ गया।
मोहन बोला -
तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।
संस्कृति किचन में गई। अदरक की चाय बनाई। गरम पानी की बोतल लाई। पारो को आराम से लिटाया।
संस्कृति बोली -
आज कोई काम नहीं।
सिर्फ आराम। और अगर बहुत दर्द हो तो डॉक्टर के पास चलेंगे।”
पारो पहली बार मुस्कुराई।
पारो बोली -
भाभी… अगर आप नहीं होतीं तो…मैं सच में डर से टूट जाती।
संस्कृति ने उसके बाल सहलाए।
संस्कृति बोली -
डर तब तक रहता है…जब तक कोई सच बताने वाला न मिले।
और ये मैं अच्छे से समझती हूं कि उस time कितना ज्यादा दर्द होता है, कितना ज्यादा डर लगता है।
उस रात हवेली के आँगन में शांति थी। लेकिन आज एक और अंधविश्वास खत्म हुआ था। संस्कृति बालकनी में खड़ी थी।
कार्तिक ने पूछा —
आज फिर एक लड़ाई जीत ली?
संस्कृति मुस्कुराई और बोली—
नहीं… आज एक लड़की का डर जीत लिया।
और कमरे के अंदर…पारो अब दर्द में थी…लेकिन अकेली नहीं। 🌸