इस घर में प्यार मना है - 4 Sonam Brijwasi द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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इस घर में प्यार मना है - 4

घर में शाम का सन्नाटा था। कमरे की खिड़की से हल्की धूप अंदर आ रही थी। लेकिन कमरे में मौजूद कार्तिक उस हल्की रोशनी के बीच भी पूरी तरह खोया हुआ लगता था।
वो थका हुआ था… और मानसिक रूप से पूरी तरह खाली।
उसका दिमाग ब्लैंक था। सिर्फ दीवार को घूर रहा था,
जैसे दुनिया में कुछ भी न हो।
संस्कृति खिड़की से बाहर झांक रही थी। उसके मन में एक ख्याल आया—

संस्कृति (मन में) बोली - 
अगर मैं इस घर को फिर से पहले जैसा बनाना चाहती हूँ…
तो पहले घर के बड़े बेटे को अपने वश में करना होगा।
पर कैसे?

वो कुछ पल के लिए रुकी। फिर धीरे-धीरे कदम बढ़ाए और कमरे में दाखिल हुई।

संस्कृति ने देखा—
कार्तिक खोया हुआ बैठा है। उसकी स्थिति देखकर संस्कृति का दिल पिघल गया।
वो तुरंत कार्तिक के पास गई और बिना सोचे समझे उसके सीने से चिपक गई।

संस्कृति (धीमी, हल्की आवाज़ में) बोली - 
कार्तिक जी… सब ठीक है… मैं हूँ न।

कार्तिक तुरंत हड़बड़ा गया। उसने संस्कृत‍ि को ज़ोर से अलग किया। चेहरे पर गुस्से की परछाईं।

कार्तिक (गंभीर, सख्त स्वर में) बोला - 
इस घर में… प्यार मना है!

वो इतना गुस्से में था कि कुछ और कहने की जगह नहीं बची।
सिर्फ़ इतना कहा और कमरे से बाहर चला गया।

संस्कृति वहीं खड़ी रह गई। उसके सीने में धड़कन तेज़ थी।
लेकिन आंखों में आँसू नहीं थे।

संस्कृति (मन में) बोली - 
ये घर… और ये आदमी…दोनों मेरे लिए चुनौती हैं। लेकिन मैं हार नहीं मान सकती।

वो जान चुकी थी—
अगर घर को बदलना है, तो उसे सबसे पहले कार्तिक को समझना होगा।
कमरे में अब सिर्फ़ संस्कृति और दीवारें थीं। और दीवारें भी उसके सामने कुछ नहीं कह रही थीं।
लेकिन संस्कृति के दिल में एक नई आग जगी थी—
न केवल घर को बदलने की… बल्कि उस आदमी को भी थोड़ा नरम करने की।

संस्कृति ने शादी से पहले जो सपने देखे थे… वे अब उसकी आँखों के सामने बस धुंधले परछाइयों की तरह थे।

संस्कृति (मन में, हल्की मुस्कान के साथ) बोली - 
क्या क्या सोचा था मैने,  मैं यहाँ जाऊँगी, और घरवालों से दोस्ती करूँगी। हनीमून पर पति के साथ जाऊँगी। सास-ससुर से प्यार कमाऊँगी। देवर के कान खींचूंगी… मज़ाक भी करूँगी। सास को इतना प्यार दूँगी कि वो मुझे अपनी बेटी समझेगी। ननद से दोस्ती करूँगी… साथ हँसेंगे, बातें करेंगे, और सब साथ होंगे।”

संस्कृति ने यह सब सपने अपने दिल में संजोए थे।
हर पल उन्हें महसूस करती थी… जैसे वो सच होंगे।

लेकिन हकीकत कुछ और ही थी।
घर में ना हँसी थी, ना मज़ाक, ना प्यार, ना खुशी।

संस्कृति (मन में) बोली - 
कहाँ गए मेरे सपने?
कहाँ गया वो हँसता-खिलता घर?

देवर कमरे में पास से गुज़रा—
उसने कान खींचने की सोची…लेकिन डर गई।
ननद कॉलेज चली गई। सास और ससुर ने सिर्फ़ देखा और चुप रहे। कार्तिक तो बस नाम का पति था।
संस्कृति की उम्मीदें एक-एक करके धूल में मिल रही थीं।
संस्कृति के अंदर गुस्सा जगा।

संस्कृति (धीरे से, मन में) बोली - 
इतना बड़ा परिवार…और सब नीरस क्यों हैं?
सबका जीवन बुरी सज़ा क्यों भुगत रहा है?

वो धीरे-धीरे कार्तिक की बुआ की ओर नज़र दौड़ाती रही।

संस्कृति (मन में, गुस्से में) बोली - 
अगर सबकी ये हालत है…तो इसका दोष तो उसी का है।
बुआ ने गलती की, और पूरा घर…सज़ा भुगत रहा है।

संस्कृति कमरे में अकेली बैठी थी। दिल में गुस्सा, आँखों में हल्की उदासी।
वो जान चुकी थी—
सपने तो यहाँ सिर्फ़ देखे जाते हैं। पूरा होना… शायद कभी नहीं।

संस्कृति (धीरे से) बोली - 
मैं अपने तरीके से बदलूँगी…और उस बुआ का डर घर से मिटा दूँगी।

लेकिन अभी… वो सिर्फ़ गुस्सा महसूस कर रही थी। अंदर ही अंदर।

क्या संस्कृति अपने गुस्से और आक्रोश को सही दिशा में बदल पाएगी?
या ये गुस्सा उसे और परेशानी में डाल देगा?