नायक: अनकही जंग का सिपाही
आर्यन की जिदंगी एक ऐसी किताब थी जिसके पन्ने समय बीतने के साथ पुराने और धूल भरे हो गए थे। उन पन्नों पर लिखी हर लाइन में संघर्ष था, जिम्मेदारी थी… और कहीं गहराई में दबे हुए अधूरे सपने भी थे।
उसकी असलियत तो अलार्म की उस आवाज से शुरू होती थी, जो सुबह 6 बजे उसके कमरे की खामोशी को चीर देती। यह आवाज सिर्फ नींद नहीं तोड़ती थी, बल्कि उसे हर रोज उसकी जिम्मेदारियों की याद भी दिलाती थी।
नींद, जो शायद पिछले सात सालों से उसने ठीक से ली ही नहीं थी। सुबह की पहली किरण के साथ ही उसके कंधों पर उम्मीदों का और जिम्मेदारियों का जो बस्ता टंगता था, उसका बोझ सिर्फ वही जानता था।
आर्यन की सुबह दफ्तर की फाइलों और रातें घर के हिसाब-किताब के बीच गुजरती थीं। लेकिन इस मशीन जैसी ज़िंदगी में कुछ धड़कनें ऐसी थीं, जो उसे हारने नहीं देती थीं।
जिम्मेदारियों का अंतहीन चक्रव्यूह
ऑफिस की कैंटीन में जब उसके दोस्त नए आईफोन या लेह-लद्दाख के ट्रिप के लिए 'राइडिंग गियर्स' की बातें करते, आर्यन चुपचाप अपनी ठंडी चाय पीता रहता। उसके दिमाग में दोस्तों की बातें नहीं, बल्कि एक अलग ही कैलकुलेटर चलता—अगले महीने पापा का डायलिसिस है, बहन की कोचिंग की फीस जमा करनी है, और घर की छत की मरम्मत करानी है। उसकी दुनिया में सपनों की जगह जिम्मेदारियों ने ले ली थी।
देर रात दफ्तर की कड़वाहट और बॉस की बेवजह की डांट का बोझ लिए जब आर्यन ऑफिस से निकला, तो उसकी नजर सड़क किनारे एक चमचमाते शोरूम में रखे उस 'कैनन प्रोफेशनल कैमरा' पर पड़ी। यह वही कैमरा था, जिसके जरिए वह कॉलेज के दिनों में डूबते सूरज को कैद करने के सपने देखता था।
उसने एक पल के लिए अपनी आंखें मूंद लीं। उसे याद आया कि कैसे वह घंटों पहाड़ों की पगडंडियों पर चलने के बाद एक 'परफेक्ट शॉट' के लिए इंतजार करता था। उसने कांपते हाथों से अपना बटुआ टटोला। महीने की सैलरी आई थी, पैसे हाथ में थे। उसके मन के एक कोने ने शोर मचाया—"बस एक बार! आज इसे ले ले आर्यन, तूने बहुत किया है दूसरों के लिए।"
पर तभी… समीक्षा की आवाज जैसे उसके कानों में गूंज उठी—"भाई, घर का राशन खत्म हो गया है और दवाई वाले के पिछले महीने के पैसे भी देने हैं..."
उसने धीरे से अपना बटुआ वापस जेब में रख लिया। शोरूम की कांच की दीवार अब उसे एक ऐसी सरहद की तरह लगी जिसे वह कभी पार नहीं कर पाएगा। एक गहरी सांस लेकर उसने उस अधूरे सपने को वहीं छोड़ा और बस की भीड़ में धक्का खाने चल दिया।
जब वह थका हारा घर पहुँचा और दरवाजा खोला, तो देखा कि पिछले कई दिनों से बिस्तर पर पड़े उसके पिता आज सोफे पर बैठे पुराना अखबार पलट रहे थे।
आर्यन ने पास जाकर उनके पैर छुए, तो पिता ने बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा और बोले, "बेटा, आज पड़ोस वाले खन्ना जी बता रहे थे कि तूने ऑफिस में बड़ा अच्छा काम किया है। मुझे गर्व है कि तूने इस घर को इतनी बखूबी संभाला है।"
पिता की उस एक बात ने आर्यन की आँखों की सारी थकान और मन का भारीपन धो दिया। उसने पिता का हाथ थाम लिया, उस खुरदरे और बूढ़े हाथ की पकड़ में जो भरोसा और सुकून था, वह दुनिया की किसी भी बड़ी सैलरी या कीमती कैमरे से कहीं ज्यादा बड़ा था। अपनी सारी टेंशन और अधूरे अरमान भूलकर आर्यन मुस्कुरा उठा।
वह धीरे से मुस्कुराया और पिता के पास से उठकर अपने कमरे की ओर बढ़ गया। कमरे की मंद रोशनी में उसने अपनी कमीज की आस्तीनें ऊपर चढ़ाईं और वाशबेसिन के पास जाकर चेहरे पर ठंडे पानी के छपाके मारे। दिन भर की भागदौड़, ऑफिस की राजनीति और उस कैमरे को न खरीद पाने का मलाल... सब कुछ उस ठंडे पानी के साथ बह गया।
तौलिये से मुँह पोंछते हुए उसने आईने में खुद को देखा। थका हुआ चेहरा… लेकिन आँखों में एक अजीब सा सुकून। उसे एहसास हुआ कि जिम्मेदारियां इंसान को थकाती जरूर हैं, लेकिन अपनों का एक छोटा सा शाबाशी भरा शब्द… उसके थकान को मिटाकर उसे फिर से तरो-ताजा कर देता है।
सपनों और समझौतों की कशमकश
तभी उसकी छोटी बहन, 'समीक्षा', कमरे में दौड़ते हुए आई। उसके हाथ में मार्कशीट थी। "भाई! मैं यूनिवर्सिटी में टॉप कर गई!"
आर्यन की आँखों में एक ऐसी चमक आई, जो सालों पहले धुंधली पड़ चुकी थी। उसने उसे कसकर गले लगा लिया, जैसे उसकी कामयाबी के बहाने वह अपनी सारी नाकामियों और त्याग को भूल जाना चाहता हो। पर जैसे ही वह पीछे हटा, समीक्षा की नजर अचानक टेबल पर रखे उस पुराने धूल जमे कैमरे पर पड़ी, जिसकी चमक अब सिर्फ यादों में बची थी।
समीक्षा ने धीरे से उस पर जमी धूल को अपनी उंगलियों से साफ किया और फिर आर्यन की तरफ मुड़कर बोली, "भाई," उसकी आवाज में एक भारीपन था, "अब तो मेरी पढ़ाई का आधा बोझ भी कम हो जाएगा, स्कॉलरशिप मिल जाएगी मुझे। अब आप अपने इस शौक को क्यों नहीं फिर से शुरू करते हैं? आपकी फोटोग्राफी में जो बात है, वो इस कोडिंग में नहीं है।"
आर्यन थोड़ा घबरा गया। उसने उस कैमरे की तरफ देखा, जो कभी उसकी पहचान हुआ करता था, और फिर घर की दीवारों को। "समीक्षा, शौक पालने के लिए वक्त और बेफिक्री चाहिए होती है। मेरे पास अभी सिर्फ जिम्मेदारियां हैं, और ये मुझे उस कैमरे के पीछे खड़े होने की मोहलत नहीं देती।"
उसकी आवाज में एक डर था, यह डर उस इंसान का था जिसे लगता है कि अगर उसने एक पल के लिए भी अपने सपनों के पीछे भागने की कोशिश की, तो कहीं उसके अपनों की उम्मीदों का महल ताश के पत्तों की तरह ढह न जाए।
समीक्षा चुप हो गई। उसे पता था कि भाई के इन लफ्जों के पीछे सात सालों का वो दर्द छिपा है जिसे उन्होंने कभी किसी से साझा नहीं किया। लेकिन उसकी आँखों में एक जिद थी एक ऐसी जिद, जो सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि अपने उस भाई के लिए थी जिसने उसके लिए अपने बचपन की कुर्बादी दी थी।
उसने मन ही मन ठान लिया था—"चाहे कुछ भी हो जाए, मुझे भाई को उनका खोया हुआ सपना वापस दिलाना है।"
समीक्षा की आँखों में अब एक शरारत भरी चमक थी, जैसे उसने भाई की 'अनकही जंग' में साथ देने के लिए किसी को अपनी तरफ कर लिया हो। उसे भरोसा था कि जल्द ही वो उसके भाई की 'जिम्मेदारियों की बारिश' में 'उम्मीद का नीला छाता' बनकर आने वाली है।