प्रियांशी की नींद अचानक टूटी, वह हड़बड़ाकर जागी और घबराते हुए बोली, "अरे... क्या हुआ?"
अंकिता ने चुटकी लेते हुए मज़ाक किया, "कुछ नहीं हुआ... बस सुबह हो गई है! अब उठ भी जाओ... जो एक-दूसरे की गोद में सिर रखकर सो रहे थे।" अंकिता की बात सुनकर हम तीनों के चेहरों पर एक हल्की-सी मुस्कान तैर गई।
हम हाथ-मुँह धोकर फ्रेश हुए ही थे कि ट्रेन में घोषणा हुई—हमारा स्टेशन करीब ही था। मैंने जल्दी से आवाज़ दी, "अंकिता, प्रियांशी... जल्दी करो, गया स्टेशन आने वाला है।"
कुछ ही देर में ट्रेन की रफ्तार धीमी हुई और वह प्लेटफॉर्म पर आकर रुक गई। खिड़की के बाहर देखा तो सूरज का लाल गोला क्षितिज पर दस्तक दे चुका था। हम सामान समेटकर गया स्टेशन पर उतर गए। बाहर आते ही ऑटो वालों का शोर कानों में गूंजने लगा— "चलो भाई, चलो बोधगया...!" कोई यात्रियों को अपनी ओर खींच रहा था, तो कोई आवाज़ें लगा रहा था। हम भी एक ऑटो में सवार हो गए जो बोधगया की ओर जा रहा था।
जैसे ही हम बौद्ध मंदिर के पास पहुँचे, प्रियांशी की आँखें चमक उठीं। वह उत्साह से भर उठी, "अरे वाह! कितनी खूबसूरत जगह है यह!" ऑटो रुकते ही वह लगभग कूदकर उतरी और वहाँ की भव्यता को निहारने लगी। वह खुशी से धीरे-धीरे झूम रही थी और अंकिता भी मंत्रमुग्ध होकर इधर-उधर देख रही थी।
सच कहूँ तो, मेरा ध्यान मंदिर की सुंदरता से ज़्यादा उन दोनों के चेहरों पर खिली खुशी पर था। मैं मन ही मन सोच रहा था— काश! मैं इन्हें उम्र भर यूँ ही खुश रख पाऊँ।
प्रियांशी ने मेरी ओर देखा और चहकते हुए कहा, "देखो ना, कितना सुकून है यहाँ! चलो, उस विशाल पीपल के पेड़ के नीचे बैठते हैं।"
मैंने मुस्कुराकर सहमति दी, "बेशक, चलो।"
हम उस पवित्र पीपल के पेड़ की घनी छाँव में जा बैठे। वहाँ बहती ठंडी हवा सीधे रूह को छू रही थी। चारों तरफ लोगों की भीड़ थी, लेकिन उस पेड़ के नीचे एक अजब सी शांति थी... जैसे समय की सुइयाँ वहीं ठहर गई हों। हम तीनों उस रूहानी माहौल में पूरी तरह खो चुके थे।
तभी प्रार्थना का समय हुआ। देश-विदेश से आए बौद्ध अनुयायी और उपासक धीरे-धीरे अपने-अपने स्थान पर बैठने लगे। हर चेहरा श्रद्धा और शांति से भरा था। कुछ अनुयायी गहरे ध्यान में थे, तो कुछ अपने 'त्रिपिटक' ग्रंथ को पढ़ने में मग्न।
उत्सुकतावश मैंने पास बैठे एक भंते जी से धीरे से पूछा, "भंते जी, क्या मैं यह पुस्तक देख सकता हूँ?"
उन्होंने एक सौम्य मुस्कान के साथ कहा, "क्यों नहीं बेटा, आप अवश्य पढ़िए।"
मैंने आदर के साथ किताब हाथ में ली, लेकिन पन्ना खोलते ही मैं उलझन में पड़ गया। अक्षर जाने-पहचाने थे, पर भाषा बिल्कुल अलग। मैंने धीरे से प्रियांशी के कान में कहा, "यह कौन सी भाषा है? मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा।"
अंकिता ने मेरी बात सुन ली और हँसते हुए बोली, "जब पापा स्कूल भेजते थे, तब तो तुम घूमने के बहाने ढूंढते थे... अब कैसे समझ आएगा?" इतना कहकर उसने मेरे हाथ से किताब झपट ली। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र पन्नों पर पड़ी, उसकी हँसी गायब हो गई और वह चुप हो गई।
उसने चुपचाप किताब मुझे वापस थमाई और नज़रें चुराते हुए बोली, "लो... आप ही पढ़ो... मेरा तो अभी पढ़ने का मन नहीं है।"
मैंने धीमी आवाज़ में कहा, "अरे, मैंने बहुत सी किताबें पढ़ी हैं, पर इसकी लिखावट तो सिर के ऊपर से जा रही है।"
हमें यूँ किताब के साथ उलझते देख वे बौद्ध अनुयायी मुस्कुरा उठे। उन्होंने प्यार से पूछा, "क्या हुआ बेटा? पढ़ क्यों नहीं रहे? कोई समस्या है?"
मैंने ईमानदारी से कहा, "भंते जी, मुझे इसकी लिखावट समझ नहीं आ रही। मैं पहचान नहीं पा रहा कि यह किस भाषा में है।"
उन्होंने शांत स्वर में समझाया, "कोई बात नहीं बेटा। इस किताब को हर कोई तुरंत नहीं समझ सकता। इसे पढ़ने और समझने के लिए अलग दृष्टि और भाषा का ज्ञान चाहिए। शुरू में मैं भी इसे नहीं पढ़ पाता था, लेकिन निरंतर अभ्यास से सब आसान हो गया।"
मैंने उत्सुकता से पूछा, "क्या आप बता सकते हैं कि यह कौन सी भाषा है?"
उन्होंने गौरवपूर्ण स्वर में कहा, "बेटा, यह दुनिया की सबसे प्राचीन भाषाओं में से एक है— इसे 'पालि भाषा' कहते हैं।"
प्रियांशी के चेहरे पर हैरानी के भाव थे। वह बोली, "मैंने इसके बारे में सुना बहुत था, पर आज देख भी लिया।" फिर उसने उम्मीद भरी नज़रों से पूछा, "क्या हम भी इसे सीख सकते हैं?"
अनुयायी जी ने प्रोत्साहित करते हुए कहा, "क्यों नहीं बेटी! तुम बिल्कुल सीख सकती हो। बस इसके लिए रोज़ थोड़ा समय, अभ्यास और ढेर सारा धैर्य चाहिए।"
अनुयायी जी ने हमारी जिज्ञासा देख कर मुस्कुराते हुए कहा, "अगर तुम दोनों सीखना चाहती हो, तो मेरे साथ एक छोटा सा वाक्य दोहराओ।"
प्रियांशी की आँखों में चमक आ गई, उसने झट से कहा, "जी, बिल्कुल! हम ज़रूर कोशिश करेंगे।"
अनुयायी जी ने अपनी आँखें मूँद लीं और बड़े शांत स्वर में कहा— "सव्वे सत्ता सुखी होन्तु"। फिर उन्होंने इसका अर्थ समझाया, "अर्थात— संसार के सभी जीव सुखी हों।"
अब बारी प्रियांशी और अंकिता की थी। जैसे ही उन्होंने एक साथ इस वाक्य का उच्चारण करने की कोशिश की, पालि भाषा के कठिन शब्दों पर उन दोनों की जीभ लड़खड़ा गई। प्रियांशी ने कहा— "सव्वे सत्ता..." और अंकिता ने कुछ और ही बोल दिया।
उन दोनों को शब्दों के साथ यूँ कुश्ती लड़ते देख मेरी हँसी छूट गई। मैं खुद को रोक ही नहीं पाया और ज़ोर से हँस पड़ा।
अंकिता ने मुझे घूरते हुए कहा, "ज़्यादा हँसो मत! तुम खुद बोलकर दिखाओ, तब पता चलेगा।"
मैंने अपनी हँसी पर काबू पाते हुए कहा, "अरे, मैं तो बस तुम्हारी कोशिश देख रहा था।"
अनुयायी जी भी हमारी इस मासूम नोक-झोंक को देख कर खिलखिला उठे। उस पल, पीपल के पेड़ के नीचे की वह शांति, हमारी हँसी और पालि भाषा की वह पवित्र मिठास... सब कुछ जैसे एक खूबसूरत याद में बदल गया।
प्रियांशी और अंकिता की उस प्यारी सी नोक-झोंक के बाद, माहौल और भी खुशनुमा हो गया था। अनुयायी जी हमारी मासूमियत देख कर धीरे से मुस्कुराए और बोले, "कोई बात नहीं बेटा, पहली बार में सबकी जीभ ऐसे ही लड़खड़ाती है। चलो, अब एक और छोटा सा वाक्य दोहराते हैं।"
प्रियांशी ने अपनी चुन्नी ठीक की और पूरी गंभीरता के साथ तैयार हो गई। अंकिता ने भी मुझे चिढ़ाते हुए एक नज़र देखा, जैसे कह रही हो— 'इस बार देखना, हम सही बोलकर दिखाएंगे।'
अनुयायी जी ने दूसरा वाक्य बोला— "अप्पो दीपो भव"।
अनुयायी जी ने जब दूसरा वाक्य दोहराया, तो इस बार प्रियांशी और अंकिता ने पूरी एकाग्रता दिखाई। उन्होंने धीरे से, लेकिन पूरी स्पष्टता के साथ कहा— "अप्पो दीपो भव"।
इस बार उनके शब्द कहीं भी नहीं लड़खड़ाए। जैसे ही उन्होंने सफलतापूर्वक उच्चारण पूरा किया, प्रियांशी के चेहरे पर एक विजेता जैसी चमक आ गई। उसने तुरंत मेरी ओर देखा और बड़ी शान से बोली, "लो, सुन लिया? मैंने एकदम सही बोल दिया! तुम ही हो जो बस हँस सकते हो, बोल नहीं पाते।"
अंकिता ने भी उसका साथ देते हुए चुटकी ली, "सही कहा प्रियांशी! ये तो बस हमें चिढ़ा रहे थे, अब खुद बोलकर दिखाएँ तो जानें।"
उनकी इस मासूम जीत और खींचाई को देखकर मेरी बोलती बंद हो गई। मैं बस उन्हें देखता रह गया। प्रियांशी की वह चहकती हुई आवाज़ और उसकी आँखों की शरारत उस पीपल के पेड़ की ठंडी छाँव में और भी दिलकश लग रही थी।
मैंने मुस्कुराते हुए हार मान ली और कहा, "ठीक है भई, तुम दोनों तो पालि की विद्वान बन गईं! अब मुझ जैसे साधारण इंसान पर थोड़ा रहम करो।"
हमारी इस छोटी सी तकरार पर अनुयायी जी भी अपनी हँसी नहीं रोक पाए। उस पवित्र स्थान पर हमारी हँसी और पालि के वे शब्द मिलकर एक ऐसी याद बुन रहे थे, जिसे मैं कभी भूलना नहीं चाहता था।
अंकिता ने श्रद्धा भाव से पूछा, "भंते जी, क्या आप शाम के समय भी यहीं रहते हैं?"
अनुयायी जी ने मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया, "हाँ बेटी, मैं यहीं रहता हूँ। बुद्ध की शरण में ही मेरा बसेरा है।"
प्रियांशी उत्साहित होकर बोली, "भंते जी, फिर तो बहुत अच्छा है! अभी हम थोड़ा और घूम लेते हैं, फिर शाम को आपसे दोबारा मिलते हैं।"
"क्यों नहीं बेटी! लेकिन अगर तुम चाहो, तो मेरे साथ चल सकती हो। मैं तुम्हें यहाँ की कुछ ऐसी खास जगहें दिखा सकता हूँ, जहाँ शांति का असली अनुभव होता है," अनुयायी जी ने प्रस्ताव रखा।
मैंने तुरंत हामी भर दी, "क्यों नहीं भंते जी! आपके साथ घूमना तो हमारे लिए सौभाग्य की बात होगी।"
तभी अंकिता धीरे से पेट पर हाथ रखकर बोली, "भैया, घूमना तो ठीक है... पर अब ज़ोरों की भूख लगी है।"
अनुयायी जी खिलखिलाकर हँस पड़े, "अरे! खाने का समय तो हो ही गया है। चलो मेरे साथ, मैं तुम्हें यहाँ का सादा और शुद्ध भोजन कराता हूँ।"
हम तीनों उनके पीछे-पीछे चल दिए। मुझे नहीं पता था कि एक अनजान शहर में एक अजनबी इतना अपनापन दे सकता है।