श्यामलाल को लोग पहले दिन से ही अजीब आदमी मानते थे। अजीब इसीलिए नहीं कि वह पेड़ पर चढ़ जाता था या बिना कारण हंसता रहता था। अजीब इसलिए कि वह साफ कपड़े पहनता था, कम बोलता था, सीधा चलता था और सबसे बड़ी बात, दिखावा नहीं करता था।
गली के लोग समझते थे कि ऐसा आदमी या तो बहुत बड़ा आदमी होगा, या फिर बहुत छोटा। बीच की सादगी आजकल लोगों को शक में डाल देती है। अगर आदमी बहुत चमकदार हो, तो लोग कहते हैं, “देखो, कितना सफल है।” और अगर आदमी बहुत सादा हो, तो तुरंत फैसला सुन जाता है, “अरे, यह तो दब्बू टाइप है।”
श्यामलाल मोहल्ले के स्कूल में क्लर्क था। तनख्वाह ज्यादा नहीं थी, लेकिन चेहरे पर शिकायत भी नहीं थी। वह रोज़ समय पर दफ्तर जाता, समय पर लौटता, और शाम को छत पर बैठकर चाय पीता। किसी से उधार नहीं मांगता, किसी की तारीफ में जरूरत से ज्यादा नहीं झुकता, और किसी को गिराने के लिए ऊँची आवाज़ भी नहीं लगाता। यही उसकी सबसे बड़ी कमी मानी जाती थी।
मोहल्ले की चाची जी कहतीं, “भई, श्यामलाल की सादगी तो ठीक है, पर ज़माना बड़ा चालाक हो गया है। थोड़ा स्मार्ट होना चाहिए।”पास के पंडित जी कहते, “सादगी अच्छी चीज़ है, पर हद से ज्यादा हो तो लोग समझते हैं आदमी में दम नहीं है।”बगल वाले दुकानदार हरिचरण तो और भी आगे थे। वह श्यामलाल को देखकर कहते, “इंसान को थोड़ा रंगीला होना चाहिए। वरना लोग समझते हैं इसे जीवन की समझ ही नहीं।”
श्यामलाल इन बातों पर मुस्कुरा देता था। वह जानता था कि जिन लोगों को उसकी सादगी पर हँसी आती है, वे अपनी बनावटीपन को शान समझते हैं।
एक दिन मोहल्ले में एक नया आदमी आया। नाम था महेश बाबू। सफेद चमकदार शर्ट, काली पतलून, बालों में तेल, हाथ में चमचमाता मोबाइल, और बात करने में ऐसा आत्मविश्वास जैसे आधा शहर उसी का हो। उसने दो दिन में ही अपना परिचय इस तरह फैलाया कि लोग समझने लगे कि यह आदमी जरूर बहुत कुछ जानता है।
महेश बाबू ने पहले ही हफ्ते में कहा, “आजकल सादगी से कुछ नहीं होता। दुनिया चाल से चलती है।”लोगों ने तुरंत सिर हिलाया। क्योंकि ऐसी बात कहने वाला आदमी उन्हें समझदार लगता है।
श्यामलाल ने एक दिन उससे बस इतना पूछा, “आप क्या काम करते हैं?”महेश बाबू ने हँसकर कहा, “काम तो बहुत हैं। नेटवर्किंग, मैनेजमेंट, एडजस्टमेंट, स्ट्रैटेजी।”श्यामलाल ने फिर पूछा, “मतलब?”महेश बाबू ने बिना रुके जवाब दिया, “मतलब यही कि आदमी को हर जगह अपनी मौजूदगी दर्ज करानी चाहिए।”
यह वाक्य मोहल्ले में बहुत पसंद किया गया। आदमी अगर सचमुच कुछ न करता हो, लेकिन अपनी मौजूदगी दर्ज कराना जानता हो, तो उसे बुद्धिमान मान लिया जाता है।
कुछ दिनों बाद स्कूल में एक नई पोस्ट निकली। हेड क्लर्क की। श्यामलाल की बरसों की मेहनत, फाइलों की समझ, नियमों की जानकारी, सब कुछ उसके काम आने वाला था। उसे पूरा भरोसा था कि इस बार उसका नंबर होगा। वह अपने काम में निपुण था, और दफ्तर में उससे अच्छा फाइल समझने वाला कोई नहीं था।
लेकिन दफ्तर में तो दुनिया दूसरी ही चलती है।
प्रिंसिपल साहब ने महेश बाबू को बुलाया। किसी ने कान में फुसफुसाया कि महेश बाबू का “ऊपर तक” पहुंच है। कोई कहता कि वे बड़े नेताओं के करीबी हैं, कोई कहता कि उन्होंने पहले ही सब जोड़ लिया है।
फिर वही हुआ, जो ऐसे मौकों पर हमेशा होता है। श्यामलाल की जगह महेश बाबू को हेड क्लर्क बना दिया गया।
मोहल्ले में खबर फैली। कुछ लोगों ने अफसोस जताया, लेकिन आधे लोग खुश भी थे। क्योंकि अगर ईमानदार और सादा आदमी आगे निकल जाए, तो चालाक लोगों की नींद खराब हो जाती है। और नींद खराब होने से समाज को बड़ा नुकसान होता है।
चाची जी ने कहा, “देखा, मैंने कहा था न, सादगी से कुछ नहीं होता।”दुकानदार हरिचरण बोले, “दुनिया की रीति यही है। थोड़ा स्मार्ट बनो, नहीं तो लोग कुचल देंगे।”
श्यामलाल सब सुनता रहा। वह न तो गुस्सा हुआ, न दुखी होने का नाटक किया। वह बस अपने घर लौट आया और छत पर बैठ गया।
उसकी पत्नी सुशीला ने पूछा, “तुम दुखी नहीं हो?”श्यामलाल बोला, “दुखी हूं, पर हैरान नहीं।”
सुशीला चुप रही। फिर बोली, “लोग तुम्हारी सादगी का मजाक उड़ाते हैं, इसका बुरा नहीं लगता?”श्यामलाल ने चाय का घूंट लिया और कहा, “लगता है। पर और बुरा तब लगता, अगर मैं भी उनकी तरह बन जाता।”
कुछ हफ्तों बाद महेश बाबू का असली चेहरा खुलने लगा। वह बड़े मीठे शब्द बोलता था, लेकिन काम से उसका दूर का रिश्ता था। फाइलें अटकने लगीं, गलतियां होने लगीं, और जिनसे वह हफ्ते में चार बार “बहुत प्यारा रिश्ता” बना रहा था, वही लोग अब उससे चिढ़ने लगे।
एक दिन एक अभिभावक अपने बच्चे की स्कॉलरशिप की फाइल लेकर आया। महेश बाबू ने फाइल देखे बिना कहा, “कल आइए।”दूसरे दिन फिर कहा, “परसों आइए।”तीसरे दिन वह आदमी रोते हुए बोला, “सर, मेरा बेटा पढ़ाई छोड़ देगा।”
उसी समय श्यामलाल वहां से गुजरा। उसने फाइल ली, आधा घंटा देखा और वही काम कर दिया जो तीन दिन से टल रहा था।
अभिभावक ने हाथ जोड़ दिए, “आपने मेरी इज्जत बचा ली।”
महेश बाबू ने यह देखा। पहली बार उसके चेहरे पर वह मुस्कान नहीं थी जो लोगों को मूर्ख बनाती है। अब वह मुस्कान खुद उसके लिए भारी पड़ रही थी।
धीरे-धीरे दफ्तर में सब समझने लगे कि सादगी का मतलब कमजोरी नहीं होता। श्यामलाल कम बोलता था, लेकिन समझ साफ थी। वह चमकता नहीं था, लेकिन काम में रोशनी थी। वह भीड़ में नहीं चिल्लाता था, लेकिन जहां जरूरत होती थी, वहां खड़ा मिल जाता था।
एक दिन प्रिंसिपल साहब ने श्यामलाल को बुलाया। बोले, “आपने कई बार ऐसे काम किए हैं जो पद पर रहते हुए किसी और को करना चाहिए था। आपने शिकायत नहीं की।”श्यामलाल ने शांत स्वर में कहा, “शिकायत करने का मतलब यह नहीं कि तकलीफ नहीं है। बस हर तकलीफ को दिखावे की जरूरत नहीं होती।”
प्रिंसिपल साहब कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, “लोग आपको गंभीरता से नहीं लेते थे।”श्यामलाल मुस्कुराया। “लोग बहुत कुछ गंभीरता से नहीं लेते, साहब। कभी ईमानदारी को, कभी धैर्य को, कभी सादगी को।”
अगले महीने महेश बाबू का तबादला हो गया। उसकी जगह फिर वही पुराना, शांत, सादा श्यामलाल लौट आया। इस बार लोग थोड़ा बदल चुके थे। अब वे उसे देखकर धीमे स्वर में बोलते थे।
चाची जी ने एक दिन कहा, “श्यामलाल, तुम तो सचमुच बहुत सादा आदमी हो।”श्यामलाल ने मुस्कुराकर कहा, “सादा होना और कमजोर होना, दोनों अलग बातें हैं चाची जी।”
दुकानदार हरिचरण ने इस बार कुछ नहीं कहा। शायद पहली बार उन्हें समझ आया था कि जिसे वे अब तक हल्का समझ रहे थे, वही मोहल्ले का सबसे मजबूत आदमी था।
सादगी का मजाक उड़ाना आसान है, क्योंकि सादगी शोर नहीं करती। वह अपनी सफाई खुद देने नहीं दौड़ती। लेकिन समय आने पर वही सादगी बनावटीपन के पूरे तमाशे को एक ही वाक्य में खोल देती है।
और तब लोग कहते हैं, “अरे, यह तो बहुत गहरा आदमी निकला।”
जबकि सच यह होता है कि वह शुरू से गहरा ही था।बस उसकी गहराई में दिखावा तैरता नहीं था।