रक्त की प्यास (भाग-4) Shivraj Bhokare द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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रक्त की प्यास (भाग-4)

(⚠️ नोट :
इस कहानी में “काली माँ” नाम सिर्फ एक काल्पनिक पात्र के लिए इस्तेमाल किया गया है, जिसका किसी देवी, धर्म या आस्था से कोई संबंध नहीं है।
मेरा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना बिल्कुल भी नहीं है।)

भाग 4: पूर्णिमा का नरसंहार 

रात…

धीरे-धीरे और गहरी होती जा रही थी।

आसमान में चाँद पूरा चमक रहा था—

पूर्णिमा।

लेकिन उसकी रोशनी अब सुकून नहीं दे रही थी…

बल्कि हर चीज़ को और डरावना बना रही थी।

हवेली के चारों तरफ फैली सफेद चाँदनी में…

परछाइयाँ लंबी हो चुकी थीं।

हवा…

भारी हो चुकी थी।

जैसे पूरे माहौल ने सांस लेना बंद कर दिया हो।

हर चीज़…
एक अनजाने डर से जकड़ी हुई थी।


---
राहुल वहीं खड़ा था।

जैसे किसी अदृश्य ताकत ने उसे जकड़ लिया हो।

उसके पैरों के नीचे जमीन हल्के-हल्के कांप रही थी…

पहले धीमी…

फिर थोड़ी तेज।

और तभी—

कुएँ के अंदर से एक आवाज उठी।

धीमी… खिंचती हुई…

लेकिन बेहद गहरी।

> “आओ…
आओ…”



ये आवाज सिर्फ कानों से नहीं…

सीधे दिमाग के अंदर गूंज रही थी।

कुएँ के अंदर से निकलती लाल रोशनी अब और तेज हो चुकी थी।

जैसे अंधेरे के अंदर कोई आग जल रही हो।

काली माँ—

कुएँ के बिल्कुल पास खड़ी थी।

उसके बाल हवा में बेतरतीब उड़ रहे थे…

लेकिन हवा… सिर्फ उसके आसपास चल रही थी।

बाकी सब स्थिर था।

उसका चेहरा…

अब इंसानी नहीं रहा था।

त्वचा पीली और सूखी…

आँखें पूरी तरह लाल…

मुँह हल्का खुला हुआ…

और उसके दाँत—

लंबे… नुकीले…

जैसे किसी शिकारी जानवर के।

उसके आसपास की हवा तक भारी हो चुकी थी।

वो अब सिर्फ एक आत्मा नहीं थी।

वो…

कुछ और बन चुकी थी।

कुछ ऐसा…

जिसे शब्दों में समझाना मुश्किल था।

---
राहुल के घुटने जवाब दे गए।

वो जोर से जमीन पर गिर पड़ा।

उसका सिर दर्द से फटने लगा।

उसकी आँखों के सामने तस्वीरें चमकने लगीं—

टुकड़ों में…

बिखरी हुई…

एक आदमी…

कठोर चेहरा…

आँखों में निर्दयता…

गुस्सा…

और फिर—

कुएँ के पास वही औरत…

चीखती हुई…

गिड़गिड़ाती हुई…

“नहीं…” राहुल बड़बड़ाया
“ये… ये सच नहीं हो सकता…”

उसने अपना सिर पकड़ लिया।

लेकिन सच…

उसे छोड़ने वाला नहीं था।

क्योंकि वो सच…

उसके खून में था।

---
काली माँ धीरे-धीरे उसके पास आई।

हर कदम के साथ—

जमीन ठंडी होती जा रही थी।

वो उसके सामने झुकी।

उसने राहुल के चेहरे को गौर से देखा।

और पहली बार—

उसकी आँखों में एक अजीब सी नरमी झलकी।

> “तुम… अलग हो…”


राहुल ने काँपते हुए उसकी तरफ देखा।

उसकी आवाज टूट रही थी—

“मुझे… मत मारो…”

कुछ पल के लिए—

सन्नाटा छा गया।

फिर…

औरत के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।

> “तुम्हें मारना… मेरा काम नहीं है…”


वो और झुकी…

उसके चेहरे के बिल्कुल पास।

उसकी ठंडी सांस राहुल के चेहरे को छू रही थी।

और फिर—

उसने धीरे से फुसफुसाया—

> “तुम्हें जीना है…
वैसे ही… जैसे मैं जी रही हूँ…”

---
उसी पल—

गांव में कुछ बदल गया।

अचानक…

पूरे गांव में अंधेरा छा गया।

एक-एक करके घरों की लाइट्स बुझने लगीं।

जैसे किसी ने पूरी जगह की रोशनी छीन ली हो।

लोग अपने घरों में सो रहे थे…

अनजान…

आने वाले खतरे से।

तभी—

दरवाजे अपने आप खुलने लगे।

क्रीईक…

खिड़कियाँ तेज़ी से हिलने लगीं।

हवा अंदर घुसने लगी—

ठंडी… और डरावनी।

और फिर—

परछाइयाँ।

दीवारों पर…

फर्श पर…

छत पर…

जैसे अंधेरा जिंदा हो गया हो।

एक घर में—

एक आदमी चीखा।

दूसरे में—

एक औरत भागने लगी।

तीसरे में—

कोई आवाज ही नहीं आई।

बस…

खामोशी।

कुछ लोग भागे—

लेकिन उन्हें लगा जैसे कोई उनका पीछा कर रहा हो।

हर मोड़ पर…

हर गली में…

कोई था।

और फिर—

एक-एक करके…

सब गायब।

सुबह के लिए…

सिर्फ खून के निशान छोड़कर।

---
 हवेली के अंदर—

अब सब कुछ टूटने लगा था।

दीवारें हिल रही थीं।

छत से धूल गिर रही थी।

नीचे से—

एक भारी आवाज आ रही थी।

जैसे कुएँ के अंदर…

कुछ जाग चुका हो।

कुछ…

जो बाहर आना चाहता था।

और फिर—

धड़ाम!!!

एक जोरदार धमाका हुआ।

कुएँ का ढक्कन टूट गया।

लाल रोशनी फटकर बाहर आई।

इतनी तेज—

कि पूरी हवेली लाल रंग में डूब गई।

और उसी के साथ—

एक चीख गूंजी।

ऐसी चीख…

जो इंसान की नहीं थी।

---
धीरे-धीरे—

वो कुएँ से बाहर आई।

अब वो पूरी तरह बदल चुकी थी।

उसका शरीर लंबा और टेढ़ा-मेढ़ा हो चुका था…

हड्डियाँ साफ दिख रही थीं…

त्वचा खिंची हुई…

और उसके पीछे—

धुंध में कई परछाइयाँ हिल रही थीं।

जैसे उसके साथ…

और भी कुछ आया हो।

उसने अपना सिर उठाया…

और राहुल की तरफ देखा।

उसकी आँखें अब और भी चमक रही थीं।

> “अब…
खून की रात शुरू होती है…”

---
राहुल डर के मारे पीछे हटने लगा।

लेकिन उसके पैर जवाब दे गए।

वो फिर से गिर पड़ा।

उसका शरीर उसका साथ नहीं दे रहा था।

काली माँ उसके पास आई।

धीरे-धीरे…

बिल्कुल शांत।

उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

और राहुल की छाती पर रख दिया।

उस स्पर्श के साथ—

राहुल को लगा…

उसका दिल रुक गया है।

सांस अटक गई।

सब कुछ… खत्म।

लेकिन…

अगले ही पल—

कुछ और हुआ।

उसके अंदर…

कुछ जाग गया।

कुछ अंधेरा।

कुछ प्यासा।

उसकी आँखें धीरे-धीरे लाल होने लगीं।

उसके दाँत…

नुकीले होने लगे।

उसकी नसों में…

जैसे आग दौड़ने लगी।

उसने अपने हाथों की तरफ देखा—

वे खून से रंगे हुए थे।

लेकिन…

उसे डर नहीं लग रहा था।

बल्कि…

अजीब सा सुकून मिल रहा था।

---
काली माँ मुस्कुराई।

इस बार…

उसकी मुस्कान डरावनी नहीं—

संतुष्ट थी।

> “अब तुम तैयार हो…”

---
रात अभी खत्म नहीं हुई थी।

लेकिन…

राहुल बदल चुका था।

वो धीरे-धीरे खड़ा हुआ।

उसकी चाल अब अलग थी।

उसकी सांसें भारी थीं।

और उसकी आँखों में—

अब डर नहीं था।

बल्कि…

प्यास थी।

खून की प्यास।

To be Continued....

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