मेरा प्यार - 17 mamta द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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मेरा प्यार - 17

​एपिसोड 17: राख से उठती उम्मीद
​गेस्ट हाउस का मंज़र:
अज़ीम ने आईने में खुद को देखा। उसने ज़ारा के भेजे हुए साफ कपड़े पहने थे, पर उसकी आँखों में अभी भी वही पुरानी सादगी और हल्का सा डर था। उसे लग्जरी गेस्ट हाउस की दीवारों से घुटन हो रही थी। उसे अपनी वही छोटी सी लकड़ी की दुकान याद आ रही थी, जहाँ परिंदों का शोर था, न कि इन महँगे कमरों का सन्नाटा।
​उसने मेज़ पर रखे खाने को हाथ तक नहीं लगाया। उसका मन बस एक ही बात सोच रहा था— "क्या ज़ोया साहिबा के ठीक होने के बाद दुनिया हमें चैन से जीने देगी? क्या एक मामूली दुकानदार और एक शहज़ादी की कहानी का अंजाम सच में मुकम्मल हो सकता है?"
​अस्पताल का वार्ड - ज़ोया और ज़ारा:
ज़ोया की आँखों में अब चमक लौट आई थी। ज़ारा उसके पास बैठी उसका हाथ सहला रही थी।
"दी... अज़ीम कहाँ है?" ज़ोया ने फिर वही सवाल पूछा।
​ज़ारा मुस्कुराई, "वह यहीं है छोटी, थोड़ा आराम कर रहा है। पर तू बता, तूने इतना बड़ा कदम क्यों उठाया? क्या तुझे अपनी दी पर भरोसा नहीं था?"
​ज़ोया की आँखों में आँसू आ गए, "भरोसा था दी, पर डैड का गुस्सा... अज़ीम की उजड़ी हुई दुकान... मुझे लगा कि अगर मैं नहीं रहूँगी तो डैड उसे परेशान करना छोड़ देंगे। मैं उसे खोने के डर से खुद को खो बैठी।"
​ज़ारा का कड़ा फैसला:
तभी मिस्टर खन्ना कमरे में दाखिल हुए। उनके हाथ में कुछ ताज़े फूल थे, पर उनकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि ज़ोया से नज़रें मिला सकें।
​ज़ारा खड़ी हुई और अपने पिता की तरफ देख कर ठंडी आवाज़ में बोली, "मिस्टर खन्ना, आपने जो ज़ोया के साथ किया, उसके बाद आप इस कमरे में आने का हक खो चुके हैं। पर ज़ोया की खातिर मैं आपको एक मौका दे रही हूँ। अज़ीम की दुकान उसी जगह पर फिर से बनेगी, और इस बार वह लकड़ी की नहीं, संगमरमर की होगी। और हाँ... उसका उद्घाटन आप खुद करेंगे और सबके सामने अपनी गलती मानेंगे।"
​मिस्टर खन्ना के चेहरे पर पसीना आ गया, "ज़ारा... तुम क्या कह रही हो? शहर के सामने मैं उस लड़के से..."
​"हाँ!" ज़ारा दहाड़ी। "वरना याद रखिएगा, खन्ना ग्रुप के इंटरनेशनल शेयर्स कल सुबह कौड़ियों के भाव बिकेंगे। फैसला आपका है—रुतबा बचाना है या अपनी इंसानियत का आखिरी कतरा।"

​ज़ोया का इकबाल-ए-जुर्म और ज़ारा का खौफनाक गुस्सा
​दृश्य: अस्पताल का शांत कमरा
​ज़ोया ने ज़ारा का हाथ कसकर पकड़ लिया, जैसे वह डर रही हो कि अगर हाथ छोड़ा तो वह फिर से उसी अंधेरे में गिर जाएगी।
​ज़ोया: (रुँधे हुए गले से) "दी, आपको पता है अज़ीम ने मेरे लिए क्या नहीं किया? जब मैं रईसी के इस शोर में अपना दम घुटते हुए महसूस कर रही थी, तब उसने मुझे बिना किसी स्वार्थ के वो सुकून दिया जिसकी मुझे बरसों से तलाश थी। उसने कभी मुझसे मेरा सरनेम नहीं पूछा, कभी मेरी दौलत की तरफ आँख उठाकर नहीं देखा। वह तो बस परिंदों को दाना खिलाता था और मेरी खामोशियों को पढ़ता था।"
​ज़ारा: (खामोशी से सुनती हुई, उसकी मुट्ठियाँ भिंच रही थीं)
​ज़ोया: "लेकिन डैड... डैड ने इसे एक गुनाह समझ लिया। दी, मैंने उनके सामने हाथ जोड़े, मैं उनके पैरों में गिर गई। मैंने उनसे भीख माँगी कि 'डैड, वह बेगुनाह है, उसे मत उजाड़िए'। मैंने यहाँ तक कहा कि मैं उनसे कभी नहीं मिलूँगी, बस उसकी दुकान मत तोड़िए। पर उन्होंने मुझ पर रत्ती भर भी रहम नहीं खाया।"
​ज़ोया की आँखों से आँसू बहकर तकिये को भिगोने लगे।
​ज़ोया: "उन्होंने मेरी आँखों के सामने मेरी सबसे कीमती चीज़—मेरा सुकून—छीनने का हुक्म दे दिया। मुझे कमरे में बंद कर दिया जैसे मैं कोई मुजरिम हूँ। दी, जब मैं उस कमरे की खिड़की से बुलडोजर की आवाज़ सुन रही थी, तब मुझे लगा कि डैड ने सिर्फ़ एक दुकान नहीं तोड़ी, उन्होंने अपनी बेटी का भरोसा और ज़िंदा रहने की वजह भी तोड़ दी है।"
​ज़ारा: (सफेद पड़ते चेहरे के साथ) "उसने तुझे गिड़गिड़ाते हुए देखा और फिर भी नहीं रुका?"
​ज़ोया: "नहीं दी। उनके लिए मेरा दर्द उनकी 'साख' से छोटा था। उन्होंने अज़ीम को सड़कों पर ला दिया सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उसने मुझसे दोस्ती करने की हिम्मत की थी। मुझे अपनी इस रईसी से नफरत हो गई है दी... मुझे इस घर से नफरत है।"
​ज़ारा खड़ी हुई, उसकी आँखों में अब आँसू नहीं, बल्कि वो आग थी जो खन्ना साम्राज्य को राख करने के लिए काफी थी। उसने ज़ोया के माथे को चूमा और बेहद ठंडी आवाज़ में बोली—
​ज़ारा: "बहुत भीख माँग ली तूने ज़ोया, अब उनके माँगने की बारी है। जिस 'साख' के लिए उन्होंने तुझे मौत की दहलीज़ पर खड़ा किया, अब मैं उसी साख को सरेआम नीलाम करूँगी। अब रहम की भीख मिस्टर खन्ना माँगेंगे और फैसला तू करेगी।"