अध्याय 3: सुकून की कीमत
ज़ोया ने पैसे तो दे दिए थे, लेकिन उसके कदम अपनी गाड़ी की तरफ नहीं मुड़े। वह वहीं खड़ी रही, उस छोटी सी दुकान को देख रही थी जहाँ मिट्टी के दीये, पुराने ताले और कुछ पीतल के सामान सजे थे। वहां कोई एयर-कंडीशनर नहीं था, कोई मखमली कालीन नहीं था, फिर भी वहां की हवा में एक अजीब सी शांति थी।
ज़ोया का सवाल...
"अज़ीम," ज़ोया ने पहली बार उसका नाम लिया। "तुम बोर नहीं होते? यहाँ दिन भर बैठे रहना, वही पुराने सामान, वही परिंदे... क्या तुम्हें कभी नहीं लगता कि तुम किसी बड़ी जगह पर होने चाहिए थे? जहाँ ज़्यादा पैसा हो, ज़्यादा लोग हों?"
अज़ीम ने एक पुराना ताला साफ़ करते हुए सिर उठाया। उसने ज़ोया को देखा, जो अपनी करोड़ों की गाड़ी के सामने खड़ी थी, पर उसके चेहरे पर वह सुकून नहीं था जो अज़ीम की आँखों में था।
अज़ीम का जवाब...
"साहिबा, बड़े शहरों में लोग 'ज़्यादा' की तलाश में इतना भागते हैं कि जो 'पास' है, उसे जीना ही भूल जाते हैं। मेरी दुकान छोटी है, पर यहाँ की छत के नीचे मुझे कभी घुटन नहीं हुई। मुझे पता है कि शाम को मुझे कितने पैसों की ज़रूरत है, और खुदा उतना दे देता है। बाकी वक़्त मैं इन परिंदों की बातें सुनता हूँ और दरिया को देखता हूँ।"
उसने ज़ोया की तरफ एक मिट्टी का प्याला बढ़ाया जिसमें चाय थी।
"सुकून पैसे से नहीं मिलता साहिबा, सुकून तो 'बस' कर देने से मिलता है। जब इंसान को लगने लगे कि उसके पास जो है वो काफी है, वहीं से शांति शुरू होती है।"
ज़ोया की कशमकश...
ज़ोया ने वह प्याला पकड़ लिया। चाय कड़क थी और उसमें इलायची की खुशबू थी। उसे लगा जैसे यह चाय उसके अंदर की सारी कड़वाहट को धीरे-धीरे धो रही है। पर तभी उसके फोन की घंटी बजी—उसके पिता का कॉल था।
स्क्रीन पर 'Dad' लिखा देखकर ज़ोया का चेहरा फिर से सख्त हो गया। वह वापस उसी दुनिया की याद दिलाने वाला कॉल था जहाँ 'काफी है' जैसा कोई शब्द ही नहीं था।
ज़ोया ने गहरी सांस ली और फोन उठाया।
ज़ोया: "हेलो, डैड? सुनिए, मैं अभी एक ज़रूरी काम में हूँ। प्लीज मुझे थोड़ी देर के लिए डिस्टर्ब मत कीजिएगा। मैं खुद फोन करूँगी।"
बिना जवाब का इंतज़ार किए उसने फोन काट दिया और उसे साइलेंट पर डाल दिया। अज़ीम खामोशी से उसे देख रहा था। उसे हैरानी हुई कि एक फोन कॉल ने ज़ोया के चेहरे पर इतनी शिकन ला दी थी।
अज़ीम: "बड़ी दुनिया के बड़े मसले... कभी-कभी फोन बंद करना ही सबसे बड़ा चैन होता है।"
ज़ोया ने अपनी नज़रें दरिया की लहरों पर टिका दीं।
ज़ोया: "अज़ीम, क्या कभी ऐसा हुआ है कि तुम भागना चाहते हो? अपनी पहचान से, अपनी ज़िम्मेदारियों से... बस कहीं दूर निकल जाने का मन करे?"
अज़ीम ने एक हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, "भागकर कहाँ जाएँगे साहिबा? हम जहाँ भी जाते हैं, अपने आप को साथ ही ले जाते हैं। अगर अंदर शोर है, तो पहाड़ों में भी सुकून नहीं मिलेगा। और अगर अंदर शांति है, तो इस बाज़ार के शोर में भी इबादत हो जाएगी।"
ज़ोया को उसकी बातें किसी मरहम जैसी लग रही थीं। लेकिन तभी, वहां का माहौल अचानक बदल गया। दुकान के बाहर दो-तीन लोग आए, जिनके हाथ में कुछ सरकारी कागज़ात थे। अज़ीम का चेहरा पहली बार थोड़ा फिक्रमंद (चिंतित) दिखा।
यह मोड़ अज़ीम की खुद्दारी और उसकी सादगी को और भी निखार देता है। वह नहीं चाहता कि ज़ोया उसकी इस परेशानी का हिस्सा बने या उसके लिए कोई एहसान करे।