Preta - Hungry Sprit Vedant Kana द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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Preta - Hungry Sprit

सन 1897 की बात है। नदी के किनारे बसा छोटा सा गांव अजीब डर के साए में जी रहा था। हर शाम सूरज ढलते ही लोग अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेते, क्योंकि रात के बाद उस नदी के पास कोई नहीं जाता था। कहते थे वहां एक अधूरी आत्मा भटकती है, जो अपने अधूरे संस्कारों के कारण इस दुनिया में अटकी हुई है।

उस गांव में गोविंद नाम का एक युवक रहता था, जो शहर से पढ़कर लौटा था और इन बातों पर विश्वास नहीं करता था। उसे लगता था कि यह सब अंधविश्वास है। एक दिन उसने ठान लिया कि वह खुद उस नदी के किनारे जाकर सच्चाई देखेगा। गांव वालों ने उसे बहुत रोका, पर वह नहीं माना।

उस रात आसमान में पूरा चांद था, लेकिन अजीब बात यह थी कि उसकी रोशनी भी धुंधली लग रही थी। गोविंद जब नदी के पास पहुंचा, तो उसे एक अजीब सी गंध महसूस हुई, जैसे गीली राख और सड़ी हुई चीजों की मिलीजुली बदबू हो। पानी बिल्कुल शांत था, पर उसके अंदर से हल्की हल्की लहरें उठ रही थीं, जैसे कोई अंदर हिल रहा हो।

गोविंद ने चारों तरफ नजर दौड़ाई। तभी उसे दूर पानी में एक आकृति खड़ी दिखाई दी। वह इंसान जैसी लग रही थी, पर उसका शरीर असामान्य रूप से फूला हुआ था, और उसके बाल गीले होकर शरीर से चिपके हुए थे। उसकी आंखें हरे रंग में चमक रही थीं, और उसके आसपास धुएं जैसी लहरें उठ रही थीं।

गोविंद का दिल तेज धड़कने लगा, पर उसने खुद को संभाला और धीरे धीरे उस आकृति के पास बढ़ने लगा। जैसे ही वह करीब पहुंचा, पानी में खड़ी वह आकृति धीरे से उसकी ओर मुड़ी। उसका चेहरा काला था, और उसके होंठों के पास कुछ चिपका हुआ था, जैसे राख या गंदगी हो। उसकी आंखें सीधे गोविंद के अंदर झांक रही थीं।

तभी वह आकृति धीरे से बोली, बहुत भूख लगी है।

उसकी आवाज इतनी भारी और गूंजती हुई थी कि गोविंद के कानों में दर्द होने लगा। वह पीछे हटना चाहता था, पर उसके पैर जैसे जम गए थे। अचानक उसने महसूस किया कि उसके शरीर से ताकत खींची जा रही है। उसकी सांस भारी होने लगी, और उसकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा।

गोविंद ने किसी तरह खुद को छुड़ाया और भागते हुए गांव की ओर लौट आया। वह पूरी तरह कांप रहा था। अगले दिन उसने गांव के बुजुर्गों को सब कुछ बताया। तब एक बूढ़े आदमी ने बताया कि वह प्रेत है, एक ऐसी आत्मा जिसे मरने के बाद सही संस्कार नहीं मिले। उसकी भूख कभी खत्म नहीं होती, और वह जीवित लोगों की ऊर्जा खाकर खुद को जिंदा रखती है।

बुजुर्ग ने यह भी कहा कि जब कोई व्यक्ति उसकी पकड़ में आ जाता है, तो वह धीरे धीरे कमजोर होता जाता है और अंत में उसी जैसा बन जाता है।

उस रात के बाद गोविंद की हालत बदलने लगी। वह कम बोलने लगा, उसकी आंखों के नीचे काले घेरे पड़ गए, और वह हमेशा थका हुआ दिखता। उसे अक्सर नदी की तरफ जाने का मन करता, जैसे कोई उसे बुला रहा हो।

कुछ दिनों बाद गांव में एक और अजीब घटना हुई। एक परिवार के घर में अचानक आग लग गई, पर आग अजीब थी। उसमें लपटें कम थीं, पर राख ज्यादा थी, जैसे कुछ अधूरा जल रहा हो। उस घर में हाल ही में किसी की मृत्यु हुई थी, और उसके संस्कार ठीक से नहीं हुए थे।

गोविंद को अब समझ आने लगा कि वह प्रेत केवल नदी तक सीमित नहीं है। वह उन जगहों पर जाता है जहां अधूरे संस्कार होते हैं, जहां लोगों का दुख और शोक अधूरा रह जाता है।

एक रात गोविंद खुद को रोक नहीं पाया और फिर से नदी के किनारे पहुंच गया। इस बार वह अकेला नहीं था। वहां कई और लोग खड़े थे, जिनकी आंखें खाली थीं। वे सब पानी की ओर देख रहे थे।

और फिर पानी में हलचल हुई। वही आकृति फिर से उभरी, पर इस बार वह अकेली नहीं थी। उसके पीछे और भी कई आकृतियां थीं, सबकी आंखें हरे रंग में चमक रही थीं।

गोविंद ने देखा कि उन आकृतियों में एक चेहरा उसे जाना पहचाना लगा। वह उसका अपना चेहरा था।

उसने घबराकर नीचे देखा, और पाया कि उसका शरीर वहीं खड़ा है, लेकिन उसकी परछाईं पानी में उस प्रेत के साथ खड़ी है। उसे समझ आ गया कि वह धीरे धीरे उसका हिस्सा बन चुका है।

अगली सुबह गांव वालों ने नदी के किनारे कई लोगों के पैरों के निशान देखे, जो पानी की तरफ जाते थे, पर वापस आने के निशान नहीं थे।

गोविंद भी उनमें से एक था।

उसके बाद से गांव में हर उस घर के पास जहां कोई अधूरा संस्कार होता, रात में पानी की आवाज सुनाई देने लगी। और कभी कभी, लोग कसम खाकर कहते कि उन्होंने अपने ही घर के अंदर किसी को खड़े देखा, जिसकी आंखें हरे रंग में चमक रही थीं।

और आज भी, अगर किसी को बिना वजह कमजोरी महसूस हो, या उसे लगे कि कोई उसकी ऊर्जा खींच रहा है, तो गांव के लोग बस इतना कहते हैं, उसने तुम्हें देख लिया है, और अब वह तुम्हें छोड़ने वाला नहीं है।