शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (44) Ramesh Desai द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (44)

               शहद की गुड़िया - प्रकरण -44

         " दादू चलकर स्टेशन की ओर जा रहे थे. ऊस वक़्त मराठी सामायिक की मददनीश तंत्री उन्हें रास्ते में मिली थी. दोनों बातचीत करते हुए स्टेशन की और बढ़ रहे थे. दादू को इस लड़की से अच्छा बनता था. दोनों एक ही लाइन में रहते थे. ऊस की वजह से दोनों अक्सर साथ हो जाते थे."

           " सुबह में दोनों बांद्रा से एक ही गाड़ी में चढ़ते थे औऱ रोज साथ हो जाते थे. दोनों चलकर ओफिस पहुंचते थे. दोनों को साथ देखकर राज हंस को जलन होती थी. वह दादू को पूछता था."

          " आप रोज साथ आते हो? "

            " दादू को मालूम था. राज हंस जरूर बम विस्फोट करेगा. औऱ वह ऊस के लिये तैयार थे. वहाँ से एक सांध्य दैनिक  प्रकाशित होता था जिस का एडिटर ऊस का स्कूली दोस्त था. वह जोगानुजोग स्टेशन पर दादू को मिल गया था. औऱ दादू ने उसे सब कुछ बता दिया था. औऱ ऊस ने दादू को सांत्वना देते हुए कहां था. "

            " संभव ऊस के खिलाफ बड़ी कार्यवाही चल रही हैं. वह ज्यादा देर टिकने वाला नहीं हैं. यह सुनकर दादू नचिंत हो गये थे. फिर भी राज हंस जरूर कुछ ना कुछ खिलवाड़ करेंगा इस बात से वह सतर्क हो गये थे.. ऊस को नानी याद दिलाने के लिये तैयार हो गये थे. "

            " सोमवार को दफ्तर में दाखिल होते ही पियून ने उन्हें बताया था. ".

              " औऱ दादू पानी पीकर बोस की केबिन में पहुंच गये थे, अनुमति लेकर केबिन में दाखिल हुए थे. बोस ने उन्हे सामने की खुर्शी पर बिठाया था.."

               " साथ में कंपनी का मैनेजर भी मौजूद थे.. उन्होंने ने दादू को सवाल किया था. आप राज हंस को कोऑपरेट नहीं करते! "

               " सर ! मैं को ऑपरेट नहीं करता तो सामायिक कौन पूर्ण करता हैं? "

               " सुनकर मैनेजर सन्न रह गये थे. कुछ देर की चुप्पी के बाद उन्होंने आगे कहां था

                " मिस्टर राजहंस ने आप की कहानी छापने से मना किया तो आप ऊस के साथ टेढ़े चलते हो. "

              " सर! ऐसी कोई बात नहीं मैं एक लेखक हूं मेरी कहानिया साभार परत हुई है ऊस के कोई अफ़सोस नहीं किया उसे री एडिट कर के दोबारा लिखी है और वह अच्छे से अच्छे सामायिक में प्रकाशित हुई है. अब कल की ही बात लीजिये ऊस ने अस्वीकृत की हुई कहानी कल के शहर के प्रतिष्ठित दैनिक की मेगेझीन पूर्ति में  प्रसिद्ध हुई है. शायद आप लोगो ने देखी होगी. "

              " देखी भी है और पढ़ी भी है. "

             " सर वह ज्यादातर ओफिस में आते नहीं आप से पैसा लेकर ओरो का काम करते है. मैं ऊस की सारी बदमाशी से अवगत हूं. कहीं उन का भांडा फोड़ ना दू इस लिये ऐसा ड्रामा किया हैँ. "

             " आप फ़िक्र नहीं कीजिये हमने भी ऊस के खिलाफ बहुत सारी बातें सुनी हैँ लेकिन प्रूफ ना होने से हमने ऊस के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की. अब ऊस की चोटी हमारे हाथ में हैँ हम ऊस को छोडेगे नहीं. "

             " सर! उसे तो मेरी जिंदगी में भी टांग अड़ाने की आदत लग गई हैँ. मराठी विभाग की लड़की सुधा से मेरी अच्छी दोस्ती हैँ. हम लोग एक ही लाइन में रहते थे औऱ अक्सर स्टेशन पर साथ हो जाते हैँ औऱ साथ ही ओफिस आते हैँ इस बात से भी दिक्क़त हैँ.."

             " राज हंस को दादू से क़्या दुश्मनी थी? जो ऊस ने अपने साथ काम करने का ओफर किया था. "

              " दादू का मन सामायिक से ऊब गया था. वह जोब छोड़ने को तैयार हो गये थे.. लेकिन मैनेजमेंट ने उन्हें जोब छोड़ने को मना किया था. लेकिन दादू ने जोब छोड़ दिया था.. औऱ जोग संजोग तो देखो उसी दिन मैनेजमेंट ने उसे बाहर का दरवाजा दिखा दिया था. "

              " ऊस के बाद नाथा लाल के एक फुमिगेशन सेंटर के बोस की मदद से माधुरी एक्सपोर्ट्स के जोब मिला था. "

               " दादू को जरी वाला के साथ करना पडा था.  उन के साथ दो औऱ लडके काम करते थे.. जिसे उन्होंने कुत्ते की तरह पालकर अपने साथ काम पर रखा था. वजह जरीवाला के इशारे पर नाचता था. ऊस का उन्हें गुमान था. वह दादू को भी अपने इशारो पर नचायेगा. लेकिन वहाँ उन की दाल नहीं गली थी..,"

             " दादू का सरकारी दफ्तरो से पाला पडा था. वह ड्यूटी ड्रॉबैक, सेंट्रल एक्साइज रिफंड, ओक्टोरोइ रिफंड रिप्लाइशमेंट लाइसेंस औऱ कैश इंसेंटिव इत्यादि काम संभालते थे. कभी उन्होंने जरिवाला को बोलने का मौका नहीं दिया था. "

              " सरकारी विभाग में बिना रिश्वत कोई काम नहीं होता था. साब को पैसा देना पड़ता था.. यह काम जरीवाला ने अपने हस्तक रखा था. ऊस के लिये वह कंपनी से पैसे उठाते भी देते थे लेकिन बहुत थोड़ा पैसा देते थे इस लिए काम में दिक्क़त आती थी औऱ दादू काम नहीं कर पाते थे. औऱ जरीवाला दादू को दोषित मानते थे..        

            " एक बार दोपहर को ऊस ने दादू को ड्रॉबैक का चेक लेने को कस्टम में भेजा था. उन्होंने काफ़ी मेहनत की थी लेकिन चेक साइन करने वाले अफसर ने उन्हें दूसरे दिन बुलाया था.. काम पूरा करने के पीछे काफ़ी भगा दौड़ी इस लिये वह साढ़े पांच तक जरीवाला को बता नहीं पाये थे. औऱ बताते ही वह उखड़ गये थे. ऊस ने दादू को कहां था. " यह बात अभी बताते हो? "

               " उन की बातें सुनकर दादू भी भड़क गये थे. उन्होंने जरीवाला को सामने सवाल किया था. "

              " पहले काम करू? या तुम्हे फोन करू? "

              " दादू ऊस दिन अपने आपे में नहीं थे. उन्होंने जरीवाला को साफ शब्दों में धमकी दी थी. "

              " कल आकर मैं बड़े साब से बात करता हूं.. "

           " वह समय पर पैसे नही देता था औऱ देता था तो आधा बाकी अपनी जेब में डालता था.. दादू की बात से वह थर थर  कांपने लगा था. "

            " सुनकर ऊस की बोलती बंद हो गई थी. "

           " ओफिस में सब को पता चल गया था. दोनों के बीच मच मच हो गई थी. ओफिस में दादू ही थे जो ऊस के खिलाफ आवाज उठाने का सामर्थ्य रखते थे."

            " दूसरे दिन क़्या होगा? सब लोग ऊस के लिये बेताब थे. "

                     000000000000  ( क्रमशः)