शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (33) Ramesh Desai द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (33)

                   

               शहद की गुड़िया - प्रकरण -33

          " सुशील ज्ञानी और कंपनी के सीनियर भागीदार कोलेज कालीन दोस्त थे.  उन्हो ने बहुत गलत काम किये थे. उन का खुद का अपना एक्सपोर्ट इम्पोर्ट का धंधा था. उन्होने बड़ा फ़्रॉड किया था. इस लिये उन्हें जेल जाना पडा था. तब नाथालाल ने उन्हें जामीन पर छुड़वाया था."

             " सुशील ज्ञानी किसी के भी दस्तखत करने में माहिर थे. अपना इम्पोर्ट कार्गो क्लियर करने के लिये उन्होंने बैंक मैनेजर की साइन की थी.. इस फोर्जरी के लिये सजा हुई थी.. "

             " नाथालाल उन की आदतों से पूरी तरह वाकिफ थे, उन्हें अपनी कंपनी में मैनेजर की उपाधि दी थी और उन की 420 की आदतों का अपने मतलब के लिये उपयोग करते थे. सुशील ज्ञानी वाकई में कंपनी के आश्रित थे. "

              " दिल्ली के एक एजेंट के जरिये उन्हें बासमती चावल का बहुत बड़ा ओर्डर मिला था. कॉन्ट्रैक्ट की शर्त थी, 80% बासमती और 20% परिमल चावल सप्लाई करने की लेकिन उन्हो ने उल्टा काम किया था. "

              " 80% परिमल और 20% बासमती चावल सप्लाई किया था ऊस में उन्होने करोड़ो रूपये बनाये थे.

             " ऊँचे भाव से बिल्स बनाये जाते थे और ऊस का चेकस के जरिये भुगतान किया जाता था फिर सुशील ज्ञानी 30% से 40% पैसे केश में ले आते थे. इस तरह एकाउंट्स बुक्स नुकसान दिखाती थी और कंपनी की तिजोरिया भर्ती जाती थी. "

              " यह सब से बड़ा सकेण्डल था जो सी बी आई की नजरो में आ गया था. वह लोग ताकतें ही बैठे थे. उन्हें सुशील ज्ञानी के बारे में जानकारी मिली थी. वह लोग उन्हें रंगे हाथ पकड़ना चाहते थे. सुशील ज्ञानी को  भी ऊस का पता चल गया था. ऊस वक़्त वह चिनोय में थे. वैसे तो वह फ्लाइट में यात्रा करते थे, लेकिन उन्होने ऊस वक़्त ट्रैन का विकल्प पसंद किया और दूसरे ही स्टेशन पर सी बी आई टीम ने उन्हें घर लिया. उन के पास केवल ब्रीफ केस था. "

          " सी बी आई टीम ने उन्हें सवाल किया था. इस में क़्या हैं? "

          , " कंपनी के जरुरी कागजात और कुछ खर्च के पैसे. "

            " बेग खोलिये. "

            " और ऊस में 70 से 80 लाख रूपये नकद राशि प्राप्त हुई थी. मर्यादित राशि से कई ज्यादा राशि रखने के लिये और झूठ बोलने के लिये उन्हे अटक में लिया गया था. "

            " और दूसरे दि सी बी आई की टीम नाथालाल की ओफिस में पहुँच गई थी. ऊस वक़्त उन के लडके ने झूठी जानकारी दी थी. उन्हो ने पूछा था. "

             " सुशील ज्ञानी नाम का मुलाजिम आप की ओफिस में काम करता हैं? "

             " ऊस के जवाब में ऊस ने ना कहां था.

             " ऊस ने सुशील ज्ञानी के नाम की तकती भी निकाल दी थी जिस के निशान भी उन की केबिन के बाहर मिले थे. "

              " और सारा मुआमला हाथ से निकल गया था.. "

            " तब रहम दिल दादू के दिल में उन के लिये तरस आया था. उन्हो ने कंपनी के लिये खुद को मुसीबत में झोंका था बदले में उन्हें क़्या मिला था? कारावास? "

             " ऊन की बीवी ही बहुत परेशान थी. "

           " दादू ने 6 साल से अधिक नाथा लाल की कंपनी में काम किया था. और लोगो का भला करने की कोशिश में उन्हें जोब छोड़ना पडा था.

            " अपने स्टाफ सदस्यों के हित के लिये वह मैनेजमेंट के साथ भीड़ गये थे. वह सब की तनख्वाह बढ़ाना चाहते थे लेकिन एक सदस्य उन की पीठ के पीछे मैनेजमेंट की गोद में बैठे गया था जिस की वजह से उन्हें जोब छोड़ने की नौबत आई थी."

           " तब से दादू ने कान पकड़े था अब वह किसी के हित के बारे में नहीं सोचेंगे. "

             " उन्हो ने इस्तीफा दे दिया था, लेकिन दूसरा जोब मिलने तक नाथा लाल की कंपनी से जुड़े रहे थे.. इस बात से बोंड्या को तकलीफ हुई थी. वह बार बार उन को अपने इस्तेफे की याद दिलाता था और अपनी प्रतिष्ठा के लिये उन्हो ने जोब छोड़ दिया था. "

           " और उन्हो ने एक परिचित शख्स की मदद से अखबारी दुनिया में पैर रखे थे. तब उन का मानना था की उन की लेखन प्रवृत्ति को बूस्ट मिलेगा. लेकिन यहाँ भी कौवे काले थे. सब एक से बढ़कर थे. सब ईगोईस्ट और संकुचित मानस वाले जो छोटी छोटी बातों में बच्चों की तरह लड़ते झगड़ते रहते थे. "

           " दादू को प्रूफ रीडर की हैसियत से जोब मिला था. इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप एक नया गुजराती दैनिक अख़बार लौंच कर रहा था. ऊस के शुरू होने के तीन महीनो पहले स्टाफ की नियुक्ति कर दी गई थी. "

          " दादू को पहली प्रूफ रीडिंग का कोई अनुभव नहीं था, ऊस के उन्होंने झूठ का सहारा लिया था और दूसरा वह लेखक थे. उन के अनुभव का किस्सा ऊस अख़बार में छपा था.

           " स्पोर्ट्स दादू  की पसंदगी का विषय था. "

            " नियत समय पर मकर संक्रांति के दिन अख़बार शुरू हो गया था. ऊस के तंत्री थे मनोज शास्त्री जो अन्य सांध्य दैनिक अख़बार में असिस्टेंट एडिटर थे जो एक मेनियाक था. "

             " प्रूफ रीडिंग के हेड रमेश पारेख थे जिस को घमंड था, उन के जैसे दूसरा प्रूफ रीडिंग मास्टर अन्य कोई नहीं हो सकता. "

              " प्रूफ रीडिंग में दादू के आलावा 6-7 लोग भी थे ऊस में सुमेर कर के एक लड़का था, जिस पर रमेश पारेख के चार हाथ थे. ऐसी क़्या बात थी? जो दादू को पसंद नहीं करते थे. "

              " वह तंत्री महोदय को दादू के बारे में भड़काते रहते थे. स्पोर्ट्स तंत्री से उन की पहचान हो गई थी. उन्हें दादू के स्पोर्ट्स ज्ञान के बारे में जानकारी थी. वह ऊस से प्रभावित भी थे. उन्हो ने दादू को अपने हाथ नीचे काम पर रख लिया था इस से सारा प्रूफ रीडिंग डिपार्टमेंट के पेट में दर्द शुरू हो गया था. "

             " मनोज शास्त्री भी ऊस के काम से ख़ुश हुए थे.. उन के क्रिकेटिंग ज्ञान की सराहना की थी.. दादू में डबल शिफ्ट में काम किया था., 11-00 से 6-00 बजे तक वह प्रूफ रीडिंग का काम करते थे और 6-00 बजे से 12-00 बजे तक स्पोर्ट्स डिपार्टमेंट में काम करते थे.

                          0000000000  ( क्रमशः)