रूहों का सौदा - 20 mamta द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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रूहों का सौदा - 20


​अध्याय 20: नियति का वज्रपात और खंडित मर्यादा

​'ब्रह्म-कक्ष' के वे विशाल और भारी शीशम के द्वार जब अंततः खुले, तो उनकी चरचराहट पूरे प्रांगण में किसी अशुभ संकेत की तरह गूँज उठी। बाहर मैदान में खड़े सैकड़ों छात्र-छात्राओं की सांसें जैसे गले में ही अटक गई थीं। सूर्य अब आकाश के मध्य में था, लेकिन उसकी रोशनी में वह गरमाहट नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी सिहरन थी जो हड्डियों तक पहुँच रही थी।

​महागुरु बाहर आए, उनके पीछे आचार्या वसुंधरा और अन्य वरिष्ठ आचार्यों की टोली थी। उनके चेहरों पर वह सौम्यता नहीं थी जो सुबह उत्सव के समय दिखी थी; अब वहां केवल पत्थर जैसी कठोरता और एक गहरा सन्नाटा था—ऐसा सन्नाटा जो किसी बहुत बड़े सच को अपने भीतर दफ़न किए हुए हो।

​महागुरु की रहस्यमयी घोषणा

महागुरु ऊँचे पाषाण-चबूतरे पर जाकर खड़े हो गए। उनकी सफ़ेद जटाएँ हवा में लहरा रही थीं, और उनकी आँखें दूर उन पहाड़ियों पर टिकी थीं, मानो वे वहां कुछ ऐसा देख रहे हों जो साधारण आँखों से ओझल था। उन्होंने अपनी दृष्टि नीचे खड़े शिष्यों पर डाली। उनकी आवाज़ किसी गहरी खाई से आती हुई प्रतीत हुई:

​"शिष्यों, गुरु-मंडल की मंत्रणा समाप्त हुई। आपमें से कई लोग इस अकारण देरी से विचलित हैं, लेकिन याद रखें, गुरुकुल की सुरक्षा और मर्यादा सर्वोपरि है। जो कुछ भी निर्णय लिया गया है, वह आर्यावर्त के भविष्य को ध्यान में रखकर लिया गया है। आप सबको विचलित होने की आवश्यकता नहीं है, कुछ भी अनिष्ट नहीं हुआ है। सब शांत रहें।"

​एक विश्वासघाती प्रहार

छात्रों के बीच एक दबी हुई राहत की लहर दौड़ने ही वाली थी कि महागुरु के अगले शब्दों ने उस राहत को एक भयानक 'शॉक' में बदल दिया। महागुरु की प्रखर नज़रें अचानक लौरा पर टिकीं, जो अपनी नीली मूठ वाली तलवार थामे प्रथम चरण के लिए पूरी तरह तैयार खड़ी थी।

​"किंतु," महागुरु का स्वर और भी भारी और कठोर हो गया, "परिस्थितियों और युद्ध-रणनीति की नई समीक्षा के बाद, हमने एक बड़ा और अनिवार्य बदलाव किया है। इस 'शिखर मुकाबले' के प्रथम चरण से लौरा को तत्काल प्रभाव से बाहर किया जाता है। वह अब इस गौरवशाली प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं होंगी।"

​स्तब्ध सभा और लौरा का आक्रोश

यह घोषणा किसी बिजली की कड़क की तरह मैदान पर गिरी। पूरे प्रांगण में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे काल ने सबकी आवाज़ छीन ली हो। लौरा के पैरों तले जैसे ज़मीन खिसक गई। उसके हाथ में जो तलवार उसकी शक्ति का प्रतीक थी, वह अब उसे बोझ लगने लगी और हल्का सा कांपने लगी।

​"क्या? पर क्यों महागुरु?" लौरा की आवाज़ में क्रोध और आंसुओं का एक भयानक मिश्रण था। "क्या मेरा कौशल रातों-रात कम पड़ गया? क्या आचार्या वसुंधरा का मुझ पर से विश्वास उठ गया? या फिर यह वही पक्षपात है जिसे मैं अब तक मर्यादा समझती रही? क्या एक स्त्री का शिखर पर पहुँचना इस गुरुकुल को स्वीकार नहीं?"

​लौरा का यह सीधा सवाल सभा की मर्यादा को चीर गया, लेकिन महागुरु ने उसकी आँखों में नहीं देखा। उनके चेहरे पर एक ऐसी विवशता थी जिसे वे प्रकट नहीं कर सकते थे।

​शेष योजना का पाश

महागुरु ने उसकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया, मानो वे पहले ही अपना मन पत्थर कर चुके हों। उन्होंने आगे घोषणा की, "शेष तीन राउंड की योजना वैसी ही रहेगी। दूसरे और तीसरे राउंड के योद्धा तैयार रहें। और जैसा कि पहले से निर्धारित था, रुद्र को 'ब्रह्मास्त्र' की भांति केवल अंतिम और निर्णायक राउंड के लिए सुरक्षित रखा जाएगा।"

​लौरा को इस तरह अपमानित करके बाहर करना कन्या गुरुकुल की छात्राओं के लिए एक गहरे घाव जैसा था। चारों ओर दबी हुई सिसकियाँ और गुस्से भरी फुसफुसाहटें शुरू हो गई थीं। आचार्या वसुंधरा भी चुपचाप खड़ी थीं, उनके होंठ सिले हुए थे जैसे उन पर कोई कठोर शपथ बांध दी गई हो।

​लौरा ने अपने अपमान के कड़वे घूँट को निगला, अपनी तलवार को झटके से म्यान में डाला—जिसकी आवाज़ उस सन्नाटे में किसी चीख जैसी लगी—और बिना किसी को प्रणाम किए सभा से बाहर निकल गई।

​रुद्र का बढ़ता संशय

रुद्र, जो भीड़ के अंत में खड़ा था, सन्न रह गया। वह देख सकता था कि लौरा का चेहरा क्रोध से काला पड़ रहा है। उसके मन में हजारों सवाल उठ रहे थे—'अगर सब कुछ ठीक है, तो महागुरु ने लौरा जैसी सर्वश्रेष्ठ योद्धा को रणभूमि से क्यों हटाया? क्या उस गुप्तचर के संदेश में लौरा को लेकर कोई विशेष खतरा था? क्या महागुरु रुद्र को बचाने के लिए लौरा की बलि चढ़ा रहे थे, या फिर सच इससे भी कहीं अधिक डरावना था?'

​मैदान में अब उत्सव नहीं, बल्कि एक युद्ध शुरू होने वाला था, जिसकी पहली हार बिना शस्त्र उठाए ही हो चुकी थी।