रूहों का सौदा - 4 mamta द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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रूहों का सौदा - 4

​'विशाल गुरुकुल' का सबसे ऊँचा शिखर, जिसे 'ब्रह्म-कक्ष' कहा जाता था, आज किसी श्मशान जैसी शांति ओढ़े हुए था। बाहर सर्द हवाएँ दीवारों से टकराकर कराह रही थीं, लेकिन कक्ष के भीतर का वातावरण उससे भी कहीं अधिक ठंडा और तनावपूर्ण था।

​कक्ष के केंद्र में ऊँचे आसन पर महागुरु विराजमान थे। उनकी श्वेत जटाएँ कंधे तक बिखरी थीं और माथे पर खिंची तीन रेखाएँ—जिन्हें आमतौर पर ज्ञान का प्रतीक माना जाता था—आज चिंता की गहरी खाइयों में बदल चुकी थीं। उनके सामने गुरुकुल के चार प्रमुख आचार्य, जो स्वयं शस्त्र और शास्त्र के प्रकांड विद्वान थे, अपराधी की भांति सिर झुकाए खड़े थे।​वह भयानक सत्य

​महागुरु की आँखें बंद थीं, जैसे वे अपनी अंतर्दृष्टि से किसी घटित हो चुकी घटना को फिर से देख रहे हों। कक्ष में जल रही भारी पीतल की मशालों से निकलता धुआँ छत की कड़ियों में उलझ रहा था।

​अचानक, महागुरु ने अपनी आँखें खोलीं। उनकी पुतलियों में एक विचित्र सी चमक थी—क्रोध की नहीं, बल्कि एक अज्ञात भय की।

​"वह कब निकला?" महागुरु की आवाज़ इतनी धीमी थी कि आचार्यों को सुनने के लिए आगे झुकना पड़ा, लेकिन उसमें छिपा भारीपन किसी पहाड़ की गूँज जैसा था।

​आचार्य विक्रम ने कांपते स्वर में उत्तर दिया, "महागुरु... सूर्यास्त के ठीक बाद। जब संध्या वंदन का समय था। रुद्र को रोकने का प्रयास किया गया था, किंतु उसकी गति और हठ के आगे कोई नहीं टिक सका।"

​महागुरु का हाथ आसन की नक्काशीदार मूठ पर कस गया। लकड़ी के चरचराने की आवाज़ सन्नाटे को चीर गई। "तुमने उसे रोका नहीं? या तुम उसे रोकना नहीं चाहते थे? क्या तुम सब भी उसी अहंकार के वश में आ गए हो कि 'रुद्र अपराजेय है'?"​अनर्थ की आहट

​एक अन्य आचार्य, आचार्य सोम, ने हिम्मत जुटाकर कहा, "क्षमा करें महागुरु, किंतु रुद्र ने अब तक हर असंभव कार्य को संभव किया है। उसकी तलवार के सामने बड़े-बड़े योद्धा नहीं टिकते। हमें लगा कि वह इस संकट को भी अकेले ही समाप्त कर देगा।"

​"मूर्खता!" महागुरु अपने आसन से बिजली की गति से खड़े हुए। उनके खड़े होते ही कक्ष की मशालें फड़फड़ाने लगीं। "तुम उसे केवल एक योद्धा देख रहे हो, मैं उसे वह 'स्तंभ' देख रहा हूँ जिस पर इस समूचे आर्यावर्त का भविष्य टिका है। रुद्र का अकेले जाना वीरता नहीं, एक आत्मघाती कदम है। वह उस स्थान की ओर बढ़ा है जहाँ शस्त्र नहीं, केवल 'शापित शक्तियाँ' चलती हैं।"

​वे झरोखे की ओर बढ़े और दूर अंधेरे में डूबी पहाड़ियों को देखने लगे।

​"तुम नहीं जानते," महागुरु बुदबुदाए, "रुद्र का रक्त यदि उस भूमि पर गिरा, तो वह एक ऐसे अनर्थ को जन्म देगा जिसे रोकने की शक्ति न तुम्हारे शस्त्रों में है और न ही मेरे शास्त्रों में। यह एक ऐसी भूल है जिसकी कीमत आने वाली पीढ़ियां चुकाएंगी।"​छाया का भय

​महागुरु ने पलटकर आचार्यों की ओर देखा, उनकी आँखों में अब स्पष्ट नमी थी। "वह अभी बच्चा है। उसके भीतर जितनी वीरता है, उतना ही भोलापन भी। तुमने उसे एक जलती हुई आग में धकेल दिया है, यह सोचकर कि वह उसे बुझा देगा। लेकिन सत्य यह है कि वह आग रुद्र को ही ईंधन बना लेगी।"

​पूरे कक्ष में सन्नाटा पसर गया। आचार्यों को अब अहसास हुआ कि उन्होंने कितनी बड़ी चूक कर दी है। महागुरु की चेतावनी केवल एक छात्र के लिए नहीं थी, बल्कि वह उस विनाश की घोषणा थी जो अब गुरुकुल की ओर बढ़ने वाला था।

​महागुरु ने आदेश दिया, "अभी इसी क्षण, गुप्तचरों को भेजो। मुझे हर प्रहर की सूचना चाहिए। और याद रहे, यदि रुद्र को कुछ हुआ, तो 'विशाल गुरुकुल' की ये दीवारें इतिहास का सबसे बड़ा कलंक ढोएंगी।"

"मुख्य द्वार पर हुई उस ज़ोरदार दस्तक ने सबके दिलों की धड़कन रोक दी। महागुरु की नज़रें उस बंद दरवाज़े पर जमी थीं, लेकिन उनकी रूह पंद्रह साल पीछे जा चुकी थी। वह दस्तक दरवाज़े पर नहीं, बल्कि रुद्र के उस अतीत पर थी जिसे राख समझकर दबा दिया गया था। उस आवाज़ के पीछे से एक नन्हे बालक की दबी हुई चीख सुनाई देने लगी— ... और यहीं से शुरू हुआ वह काला अध्याय, जिसे दुनिया 'रूहों का सौदा' कहती है।"