शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (28) Ramesh Desai द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (28)

                 

                शहद की गुड़िया - प्रकरण 28

        " ना जाने हसमुख ने कौन सा शेर मार लिया था? ललिता पवार और उन के परिवार के लोग ऊस के दीवाने हो गये थे. "

        " वैसे भी उन के घर की प्रणाली थी. परिवार से ज्यादा बाहरी लोगो का ज्यादा चलता था. "

          " हसमुख के कुछ हकारात्मक बातें थी जिस से वह ललिता पवार के घर का खास आदमी बन गया था. एक तो वह मीठा बोलता था, दूसरा ऊस के नोन वेज का खजाना था तीसरा वह बहुत लोगो को पहचानता था जिससे वह चीज वस्तु की खरीदी में फायदा करा देता था.. ललिता पवार एक नंबर के मतलबी, खुदगर्ज थे. "

            " हसमुख भी उन को जानता था. पहचान की आड़ लेकर वह ललिता पवार को सस्ते में चीजे दिलाने का दावा करता था और कमिशन खाता था. दादू को ऊस का आना जाना पसंद नहीं था, लेकिन वह कुछ नहीं कर सकते थे. "

            " एक बार पुष्पा बहन ने अपने जन्म दिन पर छोटी सी पिकनिक का आयोजन किया था. वह खुद हसमुख को ऊस में शामिल नहीं करना चाहते थे.. उन्हो ने उसे बताया नहीं था लेकिन ललिता पवार ने बिना पूछे उसे आमंत्रित किया था. "

             " यह रविवार को तुम्हारी बीवी को लेकर सुबह छह बजे चर्नी रोड स्टेशन आ जाना. "

              " यह जानकर दादू का मूड ख़राब हो गया था. पुष्पा बहन को भी यह बात पसंद नहीं आया था.. लेकिन वह अपना जन्म दिन ख़राब नहीं करना चाहते थे तो चुप रहे थे. "

               " लेकिन ऊस वजह से वह अपने परिवार की खुशियां छीनना नहीं चाहते थे. इस लिये चुपचाप पिकनिक के लिये ज्वाइन हो गये थे."

                 " पिकनिक में बहुत से लोग थे लेकिन ऐसा लगता था सुहानी हसमुख और ऊस की बीवी से साथ पिकनिक में आई थी. वह हसमुख की बीवी से अंद्धाधून मिल गई थी. "

             " ऊस वक़्त दादू को याद आया था. सुहानी ने कहां था: मैं अपनी बड़ी बहन से बहुत प्यार करती हूं. लेकिन यहाँ अलग ही माहौल था ऊस ने अपनी बहन को पराया कर दिया था. "

             " हसमुख और ऊस की बीवी की मौजूदगी ने दादू को काफ़ी डिस्टर्ब किया था. ऊस की बेचैनी बढ़ती जा रही थी लेकिन सुहानी को ऊस से कोई मतलब नहीं था. "

               " वह लोग विरार लेक पिकनिक को आये थे. वहाँ एक ग्रुप आया था. दादू की उन के पहचान हो गई थी. उन से मिलकर दादू ने फ़िल्म शहीद का गाना गाने की कोशिश की थी. "

            "मेरा रंग दे बसंती चोला माये रंग दे बसन्ती!"

            " दम निकले इस देश की खातिर बस इतना अरमान हैं,......"

      " जिस चौले को पहन शिवाजी निकले अपनी आन पे        जिसे पहनकर मिट गई रानी झाँसी अपनी आन पे"

       " आज उसी को पहन के निकला हम मस्तो का टोला!"

         " दादू को यह पूरा गीता जुबानी याद था लेकिन ऊस वक़्त वह भूल गये थे. "

          " और ऊस के लिये शर्मिंदगी महसूस कर रहे थे. "

           " वह किस दौर से गुजर रहे थे यह जानने का भी सुहानी ने प्रयास नहीं किया था. ऊस बात का दादू को बहुत बुरा लगा था.,"

            " घर लौटते समय टांगे में चढ़ते समय सुहानी के साथ उनका झगड़ा हुआ तो ऊस ने हसमुख का बचाव किया तो दादू को बहुत बुरा लगा था. लेकिन किसी को उन से कुछ लेना देना नहीं था., "

           " सुहानी के ऐसे निर्मम व्यवहार से दादू के दुख की मात्र काफ़ी बढ़ गई थी. उन्होंने सब से बोलना बंद कर दिया था. दूसरे दिन भी उन का वही हाल था. वह काम पर जा नहीं पाये थे. सुहानी तो सुबह सुबह कोलेज चली थी ऊस को दादू के बारे में पता नहीं था., "

           " शाम को वह घर आई थी तब उसे दादू की हालत का पता चला था और वह उन के पास आई थी. दादू के चेहरे को अपने दोनों  हाथो पकड़ क़र सवाल किया था और माफ़ी मांगी थी तब जाकर उन का गुस्सा ठंडा पड़ा था. "

            " ऊस वक़्त दादू के दिमाग़ में अपेक्षा ने जन्म लिया था. सुहानी हर बार उसे ऐसे संभाले लेकिन ऐसा इस युग में संभावित नहीं था. यह बात वह मानने को तैयार नहीं थे. "

            " हसमुख ने सही मायने में सुहानी को उन से छिन लिया था. यह बात दादू बर्दास्त नहीं कर पाये थे  "

             " उन्होंने ने अपने ससुराल के सभी सदस्यों के लिये फ़िल्म ' अमर प्रेम ' फ़िल्म की टिकिट बुक थी.. यह कुछ फैमिली गेट तु गेदर था इस लिये हसमुख को आमंत्रित नहीं किया था. "

            " लेकिन वह बड़ा शातिर था, अपनी बीवी को लेकर दादू और परिवार के पहले थिएटर पहुंच गया था."

             " इस बात से दादू को धक्का लगा था. उन्होंने अपने परिवार के लिये कार्यक्रम बनाया था और नफफ्ट होकर थियेटर पहुंच गया था."

              " और बड़े रोब से कहां था, उन्हें एक्स्ट्रा टिकट मिल गया था. थियेटर के दरवाजे पर हाउस फूल का बोर्ड लटक रहा था.."

               " हम सब लोग होल में दाखिल हुए थे और सुहानी हमारी बाजु में बैठी थी. और वह दोनों उसी रो में बैठे थे. हसमुख ने इशारा कर के सुहानी को अपने पास बुला लिया था, और भी दादू को पूछे बिना जाकर उन की बगल में बैठ गई थी, जो सीट उन की बाजु में खाली था?

           " ऐसा कैसे हो सकता हैं एक्स्ट्रा टिकिट में बाजु में सीट कैसे मिला. दादू का दिमाग़ चकरा गया था. उन को सब कुछ समझ आया था. दादू ने टिकिट बुक किया ऊस के बाद हसमुख टिकिट बुक करने गया था. ऊस ने दो के बदले तीन टिकिट ख़रीदा था. ऊस की ऐसी हरकत से दादू को बहुत गुस्सा आया था. ऊस से ज्यादा सुहानी पर ज्यादा गुस्सा आया था. "

             " उन्होंने थियेटर से बाहर निकल कर बहुत गुस्सा किया था. लेकिन उन का कोई असर नहीं पडा था. दादू को एक ही बात का अफ़सोस हुआ था वह उन सब को फ़िल्म देखने लाया था और वह बिना पूछे जाकर उन के पास बैठे गई थी. "

                     00000000000   ( क्रमश