कहानी के दूसरे भाग (Part 2) की तरफ बढ़ते हैं,
जहाँ इस रहस्यमयी घटना के बाद की सस्पेंस और थ्रिलर से भरी जाँच शुरू होती है।
धोखाधड़ी करने वाले विक्रेता: हिस्सा-2 (जाँच का खौफ़)
वाराणसी पुलिस के सबसे काबिल इंस्पेक्टर, विनायक, 'अनंत विंटेज पैलेस' के अंदर खड़े थे। चारों तरफ सन्नाटा था, लेकिन हवा में अभी भी उस रात की भारीपन और सड़न की बू महसूस की जा सकती थी। फर्श पर अभिषेक की लाश के इर्द-गिर्द सफेद चाक से निशान बनाया गया था।
विनायक ने दस्ताने पहनकर उस नकली हार को उठाया जो अभिषेक के गले में गहरे धंसा हुआ था। अजीब बात यह थी कि हार कांच का था, लेकिन अभिषेक की त्वचा पर जलने के निशान किसी दहकते लोहे जैसे थे।
सस्पेंस की नई शुरुआत:-
"सर, सीसीटीवी फुटेज में कुछ भी साफ नहीं है," हवलदार ने घबराते हुए कहा। "कैमरे की रिकॉर्डिंग रात के 12 बजते ही धुंधली हो गई थी। बस एक साया दिख रहा है, जो हवा में तैरता हुआ लगता है।"
विनायक ने मेज पर रखा वह पुराना रजिस्टर उठाया। आखिरी पन्ने पर ख़ून से लिखी इबारत अभी भी गीली लग रही थी— "विक्रेता सावधान रहे, क्योंकि रूहें कभी सौदा नहीं करतीं।"
"यह किसी रूह का काम नहीं, बल्कि एक बहुत ही शातिराना दिमाग़ का खेल है," विनायक बुदबुदाए। लेकिन उनके मन के एक कोने में डर ने दस्तक दे दी थी। आख़िर कॉंच का हार किसी का गला कैसे जला सकता था?
प्यार का एक और चेहरा:-
जाँच के दौरान विनायक को अभिषेक के गुप्त केबिन से एक डायरी मिली। उसमें अभिषेक ने मायरा के बारे में लिखा था— "वह जितनी खूबसूरत है, उतनी ही रहस्यमयी। मुझे लगता है कि वह उस हार के बारे में मुझसे कहीं ज्यादा जानती है।"
तभी थाने में एक फोन आया। "इंस्पेक्टर, अगर आप मायरा को ढूंढ रहे हैं, तो मणिकर्णिका घाट पर आइए। वह आपका इंतजार कर रही है।" फोन कट गया।
विनायक तुरंत घाट की तरफ भागे। आधी रात का वक्त था। चिताओं की आग के बीच एक आकृति सफेद साड़ी पहने पत्थर की सीढ़ियों पर बैठी थी। वो मायरा थी।
थ्रिलर और रोंगटे खड़े करने वाला सच:-
"तुमने उसे क्यों मारा?" विनायक ने अपनी रिवॉल्वर तानते हुए पूछा।
मायरा धीरे से मुड़ी। उसकी ऑंखों में वही सम्मोहन था जिसने अभिषेक को बर्बाद कर दिया था। "मैंने उसे नहीं मारा इंस्पेक्टर। उसे उसके अपने लालच और मेरे कफ़न के टुकड़ों ने मारा है।"
"कफन के टुकड़े?"
विनायक का गला सूखने लगा।
"अभिषेक जिसे 'नूर-ए-मोहब्बत' समझकर बेच रहा था, वह दरअसल एक अभिशप्त हार था, जिसे सदियों पहले एक धोखेबाज जौहरी ने बनाया था। वह हार सिर्फ तभी चमकता है जब उसे किसी मासूम का ख़ून मिले। अभिषेक ने मुझे धोखा दिया, और बदले में उस हार ने उसकी आत्मा का सौदा कर लिया।"
अचानक, विनायक के हाथ में पकड़ा वह नकली हार जो सबूत के तौर पर उनके पास था, गरम होने लगा। उन्होंने उसे जेब से निकाला
वो अब कॉंच का नहीं, बल्कि दहकता हुआ पन्ना बन चुका था।
डर का अंतिम प्रहार:-
"इसे फेंक दीजिए इंस्पेक्टर, वरना यह आपकी भी जान ले लेगा," मायरा की आवाज हवा में गूंजने लगी और धीरे-धीरे उसकी आकृति धुंधली होने लगी।
विनायक ने वह हार गंगा की लहरों में फेंक दिया। जैसे ही हार पानी में गिरा, एक जोरदार धमाका हुआ और पानी का रंग कुछ पलों के लिए ख़ून जैसा लाल हो गया। जब विनायक ने पीछे मुड़कर देखा, तो मायरा गायब थी। वहॉं सिर्फ वही मुड़ा हुआ कागज़ पड़ा था जो अभिषेक की जेब में मिला था।
अगले दिन, विनायक ने इस्तीफ़ा दे दिया। 'अनंत विंटेज पैलेस' को हमेशा के लिए सील कर दिया गया, लेकिन आज भी लोग कहते हैं कि अमावस की रात वहॉं से अभिषेक की चीखें सुनाई देती हैं, जो आज भी उस नकली हार का सौदा करने की कोशिश कर रहा है।
लेखक: अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'
जानिए अगले भाग में अगला रहस्य......