डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 23 Jyoti Prajapati द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 23

आधी रात के उस सन्नाटे में, जब भूपेंद्र और काया एक-दूसरे के वजूद में खोए हुए थे, अचानक पास के कमरे से मनोरमा देवी के ज़ोर-ज़ोर से खांसने की आवाज़ गूँजी। वह आवाज़ किसी बर्फीले पानी के झोंके की तरह थी। दोनों झटके से अलग हुए। काया ने थरथराते हाथों से अपनी साड़ी संभाली और भूपेंद्र ने तेज़ी से अपनी टी-शर्ट ठीक की।

मनोरमा के खांसने की आवाज़ थम गई, लेकिन रसोई में अब एक भारी अधूरापन पसरा था। भूपेंद्र की आँखों में अब भी वही प्यास थी और काया के चेहरे पर घबराहट के साथ एक अजीब सी कसक। बिना एक शब्द बोले, भूपेंद्र दबे पाँव अपने कमरे की ओर लौट गया, पर उसके होंठों पर अब भी काया का स्वाद बाकी था।

अगली सुबह सूरज की पहली किरण के साथ घर में सब कुछ वैसा ही था जैसा हमेशा होता है। मनोरमा अपनी चाय माँग रही थीं, शिखा फोन में व्यस्त थी और वंशिका बच्चों को तैयार कर रही थी। लेकिन भूपेंद्र और काया के बीच की हवा बदल चुकी थी। वे एक-दूसरे के सामने बिल्कुल अनजान बने रहे, पर जब भी उनकी आँखें मिलतीं, उनमें एक ऐसी शरारत और राज़ होता जो केवल वे दोनों जानते थे।
रसोई के कोने में, जब भूपेंद्र अपनी दूसरी चाय लेने पहुँचा, तो वहां कोई नहीं था।

"साहब, रात को तो आप बिल्कुल पागल हो गए थे," काया ने मुस्कुराते हुए धीमे स्वर में तंज कसा। "जंगली जानवरों की तरह व्यवहार कर रहे थे।"

भूपेंद्र ने तिरछी नज़र से उसे देखा और चुटकी लेते हुए जवाब दिया, "मुझे पागल तुमने बनाया था काया। वो नीली साड़ी और तुम्हारी वो चिढ़ाती हुई हँसी... अभी तो हिसाब बाकी है। रात को तो माँ जी ने बीच में टोक दिया, वरना हिसाब बराबर करके ही दम लेता।"

काया की गर्दन शर्म से झुक गई, पर उसने पलटवार किया, "साहब, डर नहीं लगता आपको? अगर पकड़े जाते तो?"

"अब डर की सीमा पार हो चुकी है काया," भूपेंद्र ने चाय का घूँट लेते हुए कहा और दबे स्वर में अपनी योजना साझा की। "आज दफ्तर नहीं जा रहा हूँ, छुट्टी ली है। बहाना बनाऊँगा कि ज़रूरी मीटिंग के लिए बाहर जा रहा हूँ। तुम एक घंटे बाद सब्जी या राशन के बहाने पीछे वाली गली में मिलना।"

काया का दिल धक से रह गया। "साहब, ये बहुत बड़ा जोखिम है।"

"जोखिम में ही तो मज़ा है," भूपेंद्र ने जाते-जाते उसे आँखों से इशारा किया और बाहर निकल गया।

भूपेंद्र दफ्तर के बहाने निकला और काया ने भी आधा घंटे बाद मनोरमा से बहाना बनाया कि घर में मसाले खत्म हो गए हैं और वह ताज़ा मसाले पिसवाने बाज़ार जा रही है।
शहर के एक कोने में, एक छोटे मगर सलीकेदार होटल के बाहर भूपेंद्र खड़ा इंतज़ार कर रहा था। जैसे ही काया वहां पहुँची, उसका चेहरा डर से पीला था। "साहब, ये हम क्या कर रहे हैं? बहुत गलत कर रहे हैं हम।"

भूपेंद्र ने उसका हाथ पकड़कर उसे अंदर ले जाते हुए कहा, "कर रहे हैं तो कर रहे हैं काया। अब पीछे मुड़कर देखने का कोई फायदा नहीं। जो आग लग चुकी है, उसे बुझाना अब मुमकिन नहीं।"

कमरे के भीतर पहुँचते ही काया ने फिर से अपनी आशंकाएँ ज़ाहिर कीं, "साहब... दीदी, अवनी, विहान... उनका क्या होगा? अगर उन्हें पता चला तो वे टूट जाएँगे।"

भूपेंद्र ने बड़ी लापरवाही से कंधे उचकाए, "वंशिका अपनी दुनिया में मस्त है, उसे जिम और अपनी आज़ादी से फुर्सत नहीं। और बच्चे? उन्हें कुछ पता नहीं चलेगा। मैं उनका पिता हूँ और रहूँगा। सबके बारे में सोचते सोचते मै अपने बारे में सोचना भूल गया था । तुम्हारी वजह से मैने अपने बारे में सोचना शुरू किया है काया...।"

"और माँ जी?" काया ने पूछा।

"माँ जी को तो तुम अपनी चापलूसी से पहले ही वश में कर चुकी हो," भूपेंद्र ने हंसते हुए उसे दीवार से सटा दिया। "आज का दिन सिर्फ हमारे लिए है। मैंने ये छुट्टी सिर्फ तुम्हारे लिए ली है। रात को जो अधूरापन रह गया था, उसे आज यहाँ पूरा करना है।"

काया ने भूपेंद्र की आँखों में देखा। वहां वही दीवानगी थी जिसने कल रात उसे पिघला दिया था। अब कोई दीवार नहीं थी, कोई सासू माँ की खाँसी नहीं थी और न ही बच्चों का शोर। भूपेंद्र ने अपनी बाहें काया के गिर्द कस दीं। आज वह अपनी उस अधूरी चाहत को हर मुमकिन तरीके से पूरा करने वाला था, जो उसे पिछले कई दिनों से तड़पा रही थी। होटल के उस बंद कमरे में, भूपेंद्र और काया ने अपनी मर्यादाओं के आखिरी धागे भी तोड़ दिए। उस बंद कमरे में वक्त जैसे ठहर गया था। खिड़की के पर्दों से छनकर आती रोशनी उस माहौल को और भी रूमानी बना रही थी। अपनी मर्यादाओं के आखिरी धागे तोड़ने के बाद, भूपेंद्र और काया एक-दूसरे की बाहों में सिमटे हुए थे। वह अधूरापन, जो रात को रसोई में रह गया था, अब एक गहरी संतुष्टि में बदल चुका था।

काया ने अपना सिर भूपेंद्र के चौड़े सीने पर टिका रखा था। वह अपनी उंगलियों से भूपेंद्र के सीने के बालों से खेल रही थी। भूपेंद्र ने उसे इतनी कसकर अपनी आगोश में भर रखा था, मानो वह कोई कीमती खजाना हो जिसे वह दुनिया से छुपाकर रखना चाहता हो।

"साहब..." काया ने धीरे से फुसफुसाया, उसकी आवाज़ में अभी भी वह मदहोशी बाकी थी। "अब आगे क्या होगा? हम कब तक ऐसे छिपकर मिलते रहेंगे? मुझे डर लगता है कि यह सुख कहीं एक सपने की तरह टूट न जाए।"

भूपेंद्र ने उसके माथे को चूमा और उसकी बांहों पर हाथ सहलाते हुए कहा, "डरो मत काया। अब तुम मेरी ज़िंदगी की वह हकीकत हो जिसे मैं कभी खोना नहीं चाहता। रहा भविष्य का सवाल, तो धीरे-धीरे मैं तुम्हें इस घर में वह मुकाम दिला दूँगा कि कोई तुम्हें उंगली दिखाने की हिम्मत नहीं करेगा। वंशिका सिर्फ नाम की पत्नी रह जाएगी, और इस घर की असली रानी तुम होगी।"

काया ने ऊपर उठकर भूपेंद्र की आँखों में देखा। "सच साहब? आप इतना बड़ा जोखिम उठाएंगे मेरे लिए?"

"तुम्हारी इस देह और इस मासूमियत के लिए तो मैं कुछ भी कर सकता हूँ काया," भूपेंद्र ने उसकी गर्दन के उतार-चढ़ाव को निहारते हुए कहा। "तुम्हारी बनावट में जो खिंचाव है, जो गर्माहट है... वह मैंने आज तक कहीं महसूस नहीं की। तुम सादगी में भी जितनी आग लगाती हो, उतनी तो बड़े-बड़े सलीके वाली औरतें भी नहीं लगा पातीं।"

काया ने शर्माकर अपना चेहरा फिर से उसके सीने में छुपा लिया और धीरे से बोली, "और आप... आप तो बिल्कुल किसी मतवाले राजा की तरह हैं। आपकी मर्दानगी के सामने मेरी सारी हिम्मत जवाब दे जाती है। रात को जब आपने मुझे रसोई में दबोचा था, तभी मुझे समझ आ गया था कि मैं अब खुद को आपसे बचा नहीं पाऊंगी। आपके हाथों के स्पर्श में जो ताकत है, वह मुझे बेबस कर देती है।"

भूपेंद्र का गर्व उसकी इन बातों से और बढ़ गया। उसने काया की ठुड्डी पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाया। "बेबस ही तो रहना है तुम्हें मेरे सामने। और मुझे तुम्हारी इस बेबसी से प्यार है।" उसने काया की कमर के लचीलेपन को सहलाया और उसे फिर से अपनी ओर भींचा। काया की सिसकी फिर से कमरे के सन्नाटे को तोड़ने लगी। "अभी तो शुरुआत है काया... आज मैंने दफ्तर से छुट्टी सिर्फ इसीलिए ली है ताकि मैं तुम्हारी रूह तक को अपनी यादों से भर दूँ।"

काया ने मदभरी नज़रों से उसे देखा और उसकी गर्दन में अपनी बाहें डाल दीं। "तो फिर देर किस बात की है साहब? आज का दिन आपका है, और मैं भी पूरी तरह आपकी हूँ।"
उनकी बातें फिर से खामोशी में बदलने लगीं। कमरे की हवा फिर से भारी होने लगी थी। वे दोनों एक बार फिर उस समंदर में डूबने के लिए तैयार थे जहाँ समाज, मर्यादा और नैतिकता की लहरें पहुँच नहीं सकती थीं। भूपेंद्र ने झुककर फिर से काया के होंठों को अपने अधिकार में ले लिया, और काया ने भी पूरी शिद्दत से उसका साथ दिया।
उस कमरे के भीतर वे राजा और रानी थे, बाहर की दुनिया का शोर उनसे कोसों दूर था।




क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

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