देव और असुर दोनों मिलकर समुद्र मंथन करते हैं।
यह बताता है कि जीवन में विकास, जन्म और परिवर्तन सिर्फ एक पक्ष से नहीं होते।
दोनों शक्तियाँ आवश्यक हैं।
यदि केवल देव हों — तो मंथन ही नहीं होगा।
यदि केवल असुर हों — तो भी मंथन नहीं होगा।
सृजन हमेशा दो विपरीत शक्तियों के तनाव से जन्म लेता है।