अभी तक आपने पढ़ा कि अनन्या ने वीर की असलियत अपनी आँखों से देख ली। जिस व्यक्ति ने उसे गंगा की तरह पवित्र रहने की शर्त दी थी, वही ख़ुद रोज़ अय्याशी में डूबा हुआ था। वीर के कमरे में दूसरी लड़की को देखकर अनन्या का भ्रम पूरी तरह टूट गया और उसने उसे झूठा क़रार देते हुए साफ़ कह दिया कि अब वह अपने पति अनुराग के पास लौटेगी। अब इसके आगे-
अनन्या जैसे ही जाने के लिए मुड़ी, वीर उसके सामने आकर खड़ा हो गया।
उसने कहा, "अनु, तू झूठ कह रही है, मैं जानता हूँ। आज मैं अपना अधूरा मिलन ज़रूर पूरा करूंगा," कहते हुए उसने दरवाज़ा बंद करने के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाया, सामने एक पुलिस इंस्पेक्टर अंदर आता हुआ दिखाई दिया। उसे देखते ही वह चौंक गया।
उसने आश्चर्य से कहा, "अनुराग, तू ...?"
अनन्या भी चौंक गई। वह दंग थी, अनुराग यहाँ कैसे और कब आया?
अनुराग ने सीधे वीर के हाथों में हथकड़ी पहनाते हुए कहा, "तुझे तो मैं उस दिन ही पहचान गया था जब तू कार में अनु से बात करने आया था।"
अनन्या को काटो तो खून नहीं।
अनुराग ने अनन्या की तरफ़ देखते हुए कहा, "मेरे पुलिस स्टेशन से मुझे बुलाने का कोई कॉल नहीं आया था अनु। मैं जानता था, मेरे जाने के बाद तुम इससे मिलने ज़रूर आओगी। पापा-मम्मी को भी मैंने ज़िद करके घूमने भेजा था। इस समय तो वे जाना ही नहीं चाहते थे। विदाई के समय वीर की हरकतों को देखकर मुझे उसी दिन शक हो गया था और तुम्हारे लगातार बहते आंसुओं ने उस शक को विश्वास में बदल दिया था। मैं सब कुछ जानता हूँ अनु। तुम मेरी पत्नी हो और मैं तुम्हारा पति। इस नाते तुम्हारी रक्षा करना मेरा कर्तव्य है। आज इस पापी के दिन पूरे हो गए। इसने ना जाने कितनी लड़कियों के साथ ...; खैर, जाने दो, अब इसका स्थान जेल में है।"
अनुराग ने हवलदार को आवाज़ लगाई, "ऐ राणा, चल ले जा इसे और डाल देना सलाखों के पीछे।"
वीर हाथ मलता रह गया, यह उसके कर्मों की सजा थी। हवलदार उसे जीप में बिठा कर ले गया।
अनुराग ने अनन्या का हाथ पकड़ते हुए कहा, "चलो अनु, हम अपने घर चलते हैं।"
अनन्या एक टक रोती आंखों से अनुराग को देखे जा रही थी। उसके आंसुओं में पश्चाताप के साथ माफ़ी की गुहार भी दिखाई दे रही थी।
अनुराग ने कहा, "अनु, चिंता मत करो, बस आज यदि तुम्हारी हाँ हो, तो वही सुहाग का सामान जो मैं लेकर आया था, वह पहनकर तैयार रहना।"
डरते हुए अनन्या ने कहा, "अनुराग, यह सब प्लीज पापा को मत ।"
"अरे अनु, यह हमारे पति-पत्नी के बीच का मामला था, निपट गया। अब यह सब भूल जाओ।"
इसके बाद वे दोनों कार में बैठकर घर आने के लिए निकले। पूरे रास्ते अनन्या प्यार भरी नजरों से अनुराग को देख रही थी।
अनुराग ने कहा, "अनु, मुझे इस तरह देखती रहोगी, तो एक्सीडेंट हो जाएगा।"
घर पहुँच कर अनन्या ने कहा, "आप बैठिए, मैं अभी आती हूँ।"
अनन्या उसी समय नहा धोकर तैयार होकर लाल जोड़े में सज कर अनुराग के सामने आ गई।
अनुराग उसे देखते ही उठकर खड़ा हो गया। फिर उसके बाद वे दोनों यह भी भूल गए कि अभी रात नहीं, दिन है। अनुराग की बाँहों में आज अनन्या को पूरे जहाँ की ख़ुशी मिल रही थी। वह मन ही मन अपने पापा को थैंक यू कह रही थी कि उन्होंने उसके लिए कितना अच्छा जीवनसाथी चुना है।
अनन्या भले ही अग्नि के समक्ष लिए सात फेरों के महत्त्व और गंभीरता को न समझ पाई हो, परंतु उसका पति अनुराग अग्नि के पवित्र सात फेरों की बहुत इज़्ज़त करता था। सात जन्मों का न सही, लेकिन इस जन्म का साथ तो निभाना ही है। गलतियाँ तो इंसान से ही होती हैं और उस गलती को माफ़ कर देने वाला बहुत बड़े दिल का मालिक होता है।
रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
समाप्त