150 रुपये की कीमत Raju kumar Chaudhary द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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150 रुपये की कीमत

तिजोरी का सच


ज़रूरी काम निपटाने के लिए मैंने जल्दी से अपनी तिजोरी की ओर कदम बढ़ाए।


मेरे मन में एक ही डर था  कहीं अनीता गुस्से में तिजोरी तोड़कर सारा सोना लेकर तो नहीं चली गई?


हाथ काँप रहे थे। मैंने पासवर्ड डाला।

तिजोरी खुली।


मैं ठिठक गया।


अंदर रखा सारा सोना वैसा ही था एक भी गहना गायब नहीं।

लेकिन सोने के नीचे एक नीली फाइल रखी थी… जो मैंने कभी नहीं देखी थी।


मैंने फाइल निकाली। उसमें बैंक पासबुक, कुछ रसीदें और एक लिफाफा था।


पासबुक पर नाम लिखा था  “अनीता राकेश”।


मेरी भौंहें सिकुड़ गईं। मैंने पन्ने पलटे… और जैसे-जैसे बैलेंस देखता गया, मेरा गला सूखता गया।


तीन साल में जमा रकम  ₹1,87,500।


मैंने तुरंत हिसाब लगाया।


150 रुपये रोज़ × 365 दिन × 3 साल = 1,64,250 रुपये।


मतलब… उसने लगभग हर दिन पूरे पैसे खर्च नहीं किए थे।

वह बचाती रही।


लेकिन कैसे?


क्या वह खुद भूखी रहती थी?

क्या बच्चे को पूरा खाना नहीं देती थी?


मेरा दिल धड़कने लगा।


मैंने लिफाफा खोला। उसमें एक पत्र था  मेरे नाम।


“राकेश,

जब तुम यह पढ़ रहे होगे, तब तक मैं इस घर में नहीं रहूँगी।


तुम हमेशा कहते थे कि मैं बहुत ‘समझदार’ हूँ, क्योंकि मैं 150 रुपये में घर चला लेती हूँ।

सच यह है कि मैं हर दिन खुद का हिस्सा कम करती रही  ताकि तुम्हें कभी शिकायत न हो।


जब बच्चा बीमार होता था, मैं अपने लिए दूध नहीं लाती थी।

जब मुझे दवा की ज़रूरत होती थी, मैं आधी खुराक लेती थी।


तुम्हारी बचत सोने में बढ़ती रही…

और मैं चुपचाप अपनी बचत बैंक में जमा करती रही।


यह पैसा तुम्हारे खिलाफ नहीं है।

यह मेरे और मेरे बच्चे की सुरक्षा के लिए है।


मैंने नौकरी के लिए फिर से आवेदन किया है। इस बार मैं किसी पर निर्भर नहीं रहूँगी।


तुम बुरे इंसान नहीं हो, राकेश।

बस तुम्हें कभी समझ नहीं आया कि पत्नी खर्च नहीं, साझेदार होती है।


अगर कभी सच में समझ आ जाए, तो हमें ढूँढ लेना।


 अनीता”


मेरे हाथ से पत्र गिर गया।


तीन साल तक मैं खुद को “समझदार” समझता रहा।

असल में मैं कंजूस नहीं, स्वार्थी था।


मैंने कभी नहीं पूछा कि वह कैसे मैनेज करती है।

मैंने कभी नहीं सोचा कि एक गर्भपात झेल चुकी औरत को कितनी देखभाल चाहिए।


मैंने सोने को सुरक्षित रखा…

और अपने रिश्ते को असुरक्षित छोड़ दिया।


उस दिन पहली बार मुझे अपनी तिजोरी खाली लगी 

क्योंकि उसमें सोना था,

पर मेरा परिवार नहीं।


मैंने तुरंत फोन मिलाया।

अनीता का नंबर बंद था।


मैंने उसके पुराने ऑफिस में कॉल किया।

वहाँ से पता चला कि वह दूसरे शहर में इंटरव्यू के लिए गई है।


मैं कुर्सी पर बैठ गया।

तीन साल में पहली बार मुझे 150 रुपये की असली कीमत समझ आई।


वह सिर्फ पैसे नहीं थे।

वह मेरी सोच की सीमा थी।


उस रात मैंने तिजोरी बंद नहीं की।

मैंने अपनी डायरी खोली… और पहली बार लिखा:


“आज से बचत सोने की नहीं, रिश्तों की होगी।”


अगले दिन मैंने बैंक जाकर अपनी सैलरी का संयुक्त खाता खुलवाने का आवेदन दिया।

फिर टिकट बुक की  उसी शहर के लिए जहाँ अनीता गई थी।


इस बार मैं उसे लेने  फी मांगने जा रहा था।


क्योंकि मुझे समझ आ गया था 

घर 150 रुपये से नहीं,

सम्मान से चलता है।





स्याही से नहीं, दिल की धड़कनों से लिखता हूँ,

हर कहानी में अपना एक हिस्सा रखता हूँ।

कभी इश्क़, कभी संघर्ष, कभी सपनों की उड़ान,

हर भाषा में बस जज़्बातों का ही बयान।

अगर शब्दों में सुकून और तूफ़ान दोनों चाहते हो,

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