वरदान - 7 Renu Chaurasiya द्वारा पौराणिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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वरदान - 7

"बड़ी रानी ने तुरंत निर्णय लिया । उसने अपने भरोसेमंद सैनिकों को आदेश दिया—छोटी रानी और उसका पुत्र अब महल में नहीं रह सकते। बिना किसी दूसरे विचार के वे सैन्य दस्ता लेकर उस कक्ष की ओर बढ़े जहाँ छोटी रानी और राजवर्धन रहते थे।छोटी रानी को चेतावनी तक न दी गई। राजवर्धन को उसकी माँ की गोद से अलग किया गया—उसके हाथों को बाँधा गया और वह बेबसी से आँसू बहाने लगा। छोटी रानी झट से उठकर विरोध करने लगी, पर सिपाहियों ने कठोरता से उसे दबोच लिया।बड़ी रानी ने दरबार के सामने घोषित कर दिया—‘राज्य की सुरक्षा और शांति के लिए यह आवश्यक कदम है।’ उसके शब्दों में अधिकार था, और दरबार का भय ऐसा कि कोई मुंह भी नहीं खोल सका।छोटी रानी और राजवर्धन को जंजीरों से जकड़ कर महल के भीतर काल कोठरी की ओर ले जाया गया। वहाँ पहुँचाकर उन्हें कैद में डाल दिया गया—दीवारें ठंडी और तंग थीं, हवा सूनी और सन्नाटे से भरी। छोटी रानी ने बार-बार मुक्त होने की कोशिश की,वो रोती रही आवाज लगा ती रही पर कोठरी की लोहे की जंजीरों ने उसकी आवाज़ को अंदर ही अंदर दबा दिया। राजवर्धन अपनी माँ के आँचल से सटकर काँप रहा था—उसके मासूम चेहरे पर भय साफ दिखाई दे रहा था । छोटी रानी के दिल में अनगिनत प्रश्न और दर्द पनप रहे थे—किसने उन्हें यहाँ पहुँचाया, और किसने उनके अधिकार छीन लिए।"अंधेरी, सीलन भरी कोठरी में छोटी रानी और नन्हा राजवर्धन एक कोने में बैठे थे। दीवारों पर टिमटिमाती मशाल की रोशनी लहराती और फिर बुझने लगती। चारों ओर घुटन थी, और लोहे की मोटी सलाखों से ठंडी हवा सीटी बजाती हुई अंदर आ रही थी।छोटी रानी अपने बेटे को सीने से लगाकर धीरे-धीरे सुलाने की कोशिश कर रही थी, पर राजवर्धन की आँखों में नींद कहाँ थी। वह मासूम भय से काँपते हुए फुसफुसाया—‘माँ, हम यहाँ क्यों हैं? हमने क्या गलती की?’रानी की आँखों से आँसू बह निकले। उसने बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—‘नहीं बेटा, हम निर्दोष है। यह सब भाग्य की कठोर परीक्षा है। एक दिन सत्य अवश्य सामने आएगा।’राजवर्धन उसकी गोद में सिमट गया, और धीरे-धीरे आँसुओं के बीच नींद की झपकी लेने लगा। रानी पूरी रात उसके माथे पर हाथ रखे रही, उसकी रक्षा करती रही।"महल के बाहर यह समाचार फैल चुका था कि छोटी रानी और राजकुमार को कैद कर लिया गया है। प्रजा स्तब्ध थी—जो राजा प्रजा के लिए देवता के समान था, उसकी संतान और पत्नी पर इतना बड़ा अत्याचार हुआ, यह सुनकर लोगों के हृदय विद्रोह से भर गए।कई बुज़ुर्ग महिलाएँ मंदिरों में जाकर भगवान से प्रार्थना करने लगीं—‘हे प्रभु, मासूम राजकुमार की रक्षा करना।’इसी बीच राजा के कुछ वफादार मंत्री और सैनिक भी गुप्त रूप से एकत्र होने लगे। वे फुसफुसाकर कहते—‘यह अन्याय है। परंतु अभी विरोध करने का समय नहीं है। हमें धैर्य रखना होगा और उचित समय पर राजकुमार को बचाना होगा।’बड़ी रानी के डर और सत्ता के कारण खुले विरोध की हिम्मत किसी ने नहीं की, परंतु राज्य के हृदय में एक चिंगारी जल चुकी थी।अगले एक माह तक छोटी रानी पर अनगिनत यातनाएँ की गयीं और उसे कलंकित कर दिया गया। दरबार में झूठे आरोप लगाए गए कि उसने अपने ही पुत्र को मारा-पीटा है; समाचार नगर-नगर फैलाए गए ताकि प्रजा का मन उसके विरुद्ध भड़का रहे। उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया — छोटी रानी को दिन-रात प्रताड़ित किया गया—उसे तंग कक्षों में रखा गया, भोजन-जल की व्यवस्था बिगाड़ दी गयी और उसकी इज्जत से खेला गया। जब भी वह किसी के सामने अपनी निर्दोषी का दावा करती, बड़ी रानी के वफादारों ने उसे चुप करा दिया; उसकी हर बात को तालियाँ और ठहाके में दबा दिया गया। लोगों के बीच इसकी अफ़वाह जोरों से चलायी गयी कि रानी ने अपने ही पुत्र का संहार किया—एक ऐसा आरोप जो उसके नाम पर दाग बन गया।छोटी रानी के हृदय पर यह सबसे बड़ा आघात था। वह अपने पवित्र माँत्व और पुत्र के प्रति प्रेम को बार-बार दोहरा कर भी न्याय नहीं पाई; पर उसकी आँखों में आँसू और मन में निश्चय और दृढ़ता बनता गया कि सत्य एक दिन खुल कर रहेगा। बच्चे को एक अलग कोठरी में रखा गया था । राजवर्धन को जिस कोठरी में रखा गया था, वहाँ भी उसकी पीड़ा थी—परन्तु वो एक बच्चा था इसलिए उसके साथ कोई कठोरता नहीं की गई लेकिन वो तो एक 5 बरसिया मासूम बचा था  उसकी मां से अलग करना ही उसके लिए कठोरता थी।इधर पुराने राजा के वफादार मंत्रियों  गुप्त चारों से समाचार मिला ये सब खेल बड़ी रानी ने राजकुमार की सिंहासन के रास्ते से हटाने के लिए रचा एक षड्यंत्र है और अगले कुछ ही समय में राजकुमार और उसकी मां को मृत्यु दंड देने की सदिश रची जा रही हैं।जब सेनापति और मंत्रियों को ये सूचना दी गई तो अब उन्होंने राजकुमार और रानी को बचाने की ठान ली अब हम रानी ओर राजकुमार की किसी भी हाल में उस कल कोठरी से निकालेगे इसके लिए हमें चाहे अपने प्राण की आहूति ही क्यों न देनी पड़े  ।रात के गहरे सन्नाटे में, जब महल के पहरेदार नींद में सुस्ताने लगे, सेनापति और वह वफ़ादार सैनिक चुपके से  कालकोठरी पहुँचे। उन्होंने पहरेदारों को गुप्त संकेत से हटाया और ताले खोल दिए।दरवाज़ा चरमराया, और भीतर बैठी छोटी रानी ने अचानक उन्हें देखा। उसकी आँखों में आशा और भय दोनों चमक उठे।पुराना सेनापति हाथ जोड़कर“महारानी, घबराइए मत। मैं आपके धर्मात्मा पति का सेवक हूँ। आज रात हम आपको और राजकुमार को यहाँ से निकाल ले जाएँगे। देवता गवाह हैं, आप निर्दोष हैं।”छोटी रानी की आँखों से आँसू बह निकले। मेरा पुत्र उसके इतना कहते ही एक सैनिक राजवर्धन अपनी गोदी में उठा लिया उसने उसे रानी को सोप दिया ।रानी ने अपने पुत्र को अपनी गोद में कसकर भींचा और काँपती आवाज़ में बोली—“हे सेनापति, अगर आज आपने हमें न बचाया होता, तो हमारा वंश यहीं मिट जाता।”सेनापति ने अपनी तलवार उठाई और दृढ़ स्वर में कहा—“जब तक मेरे प्राण हैं, कोई आपका बाल भी बाँका नहीं कर सकता।”रात की ओट में, माँ-बेटे और सेनापति के साथ कुछ वफ़ादार सैनिक महल से बाहर निकल गए। वे अँधेरी गलियों और गुप्त सुरंगों से होकर शहर की सीमा तक पहुँचने लगे।लेकिन ज्यादा देर तक यह रहस्य छिपा न रहा। जैसे ही बड़ी रानी के आदमी पहरे पर लौटे और कोठरी खाली पाई, शंख बजा दिए गए।सैनिकों की पुकार:“कैदी भाग गए! छोटी रानी और राजकुमार भाग गए!”महल में हाहाकार मच गया। बड़ी रानी क्रोध से काँप उठी और तुरंत अपने सैनिकों को आदेश दिया—“उन्हें ढूँढो! चाहे धरती खंगालनी पड़े, माँ-बेटे को पकड़कर मेरे सामने लाओ। जीवित या मृत—मुझे फर्क नहीं पड़ता।”आदेश पाकर तत्काल कोई सैनिक घोड़े पर सबर होकर निकल पड़े। इधर मां-बेटा, सेनापति और कुछ वफ़ादार सैनिक घने जंगल में भाग रहे थे। रात का अंधेरा, जंगली जानवरों की आवाज़ें और पीछे से आती तलवारों की खनक सबके दिलों को दहला रही थी।बड़ी रानी के सैनिकों ने मशालों के साथ जंगल घेर लिया। हर ओर से दौड़ते घोड़े, चिल्लाने की आवाज़ गूँजने लगी। सेनापति “महारानी! आप और राजकुमार इस राह से भागिए। मैं इन्हें रोकता हूँ।”छोटी रानी रो पड़ी—“नहीं सेनापति! मैं आपको अकेला नहीं छोड़ सकती।”पर सेनापति ने तलवार खींच ली और माँ-बेटे को आगे धकेलते हुए गरजा—“ये मेरा धर्म है! अगर आज मैंने आपके पुत्र को न बचाया तो राजा की आत्मा मुझे कभी क्षमा नहीं करेगी। भागिए!”कुछ ही पलों बाद तलवारों की टकराहट और चीखें जंगल में गूँज उठीं। सेनापति ने शौर्य दिखाया, लेकिन संख्या अधिक थी—अंततः वह वीरगति को प्राप्त हुआ।