वरदान - 6 Renu Chaurasiya द्वारा पौराणिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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वरदान - 6

बड़ी रानी जो अब अस्थायी रूप से राजसिंहासन पर बैठी थी, उसके मन में एक गहरी चिंता घर कर गई थी। उसे भय सताने लगा कि जैसे ही राजकुमार राजवर्धन बड़ा होगा, प्रजा और राजा के वफ़ादार मंत्री उसे राजा घोषित कर देंगे। तब उसके हाथ से सारी सत्ता छिन जाएगी।
इस भय ने ही उसे और भी निर्दयी और चालाक बना दिया। उसने सबसे पहले अपने रिश्तेदारों और भाइयों को दरबार के बड़े पदों पर बैठा दिया—कोई सेनापति बन गया, कोई कोषाध्यक्ष, तो कोई न्यायमंत्री। इस तरह महल और राज्य की बागडोर धीरे-धीरे उसके परिवार के हाथों में पहुँचने लगी।
जो भी मंत्री, दरबारी या सैनिक राजा के समय से वफ़ादार थे और छोटी रानी व राजकुमार के पक्षधर थे, उन्हें एक-एक करके दरबार से बाहर निकाल दिया गया। किसी को झूठे आरोपों में फँसाकर अपमानित किया गया, किसी को दूर-दराज़ की सरहद पर भेज दिया गया।
यहाँ तक कि महल के नौकर-चाकर भी बदल दिए गए। पुरानी दाइयाँ, सेविकाएँ और रसोइए एक-एक कर बाहर कर दिए गए, और उनकी जगह बड़ी रानी के अपने लोग नियुक्त हुए। अब महल की दीवारें भी बड़ी रानी की आँखों और कानों से घिरी हुई थीं।
छोटी रानी भोली और सीधी-सादी थी। उसे यह सब केवल साधारण बदलाव लगता रहा। उसे तनिक भी आभास नहीं था कि यह सब उसके और उसके पुत्र के लिए एक जाल बुनने जैसा था। लेकिन बड़ी रानी अच्छी तरह जानती थी—उसका असली शिकार अभी बाकी था।"उस दिन जब गहरा सन्नाटा महल पर छाया हुआ था, तभी द्वार पर एक दासी हड़बड़ी में आई। वह वही निश्चल, पर विश्वासपात्र दासी थी जो रानी के आसपास रहती थी। उसकी आँखों में भय और बेचैनी थी; वह चोंचलेपन से बोली—
“महारानी… मैं सच बताती हूँ—मैंने महाराज को मार डाला है। छोटी रानी के कहने पर मैंने रोज़ महाराज के भोजन में विष मिलाती । मैं हर दिन थोड़-थोड़ करके डालती रही—छोटी रानी ने मुझे बताया था कि ये बवाई है पर अब मुझे पता चला गया है कि वो विस था 
कमरे में सन्नाटा छा गया; बड़ी रानी ने जैसे ठंडी मुस्कान के साथ पुछा—अब तू क्यों बता रही हो राजा के मरने के बाद।"जिस दिन से हमारे महाराज का देहांत हुआ है तब से मेरे दिल को चैन नहीं पड़ रहा है मुझे मेरे पापों की सजा मिलनी चाहिए ।परन्तु में अकेली नहीं मरना चाहती में उस छोटी रानी की चलो को अब ओर बर्दास्त नहीं कर सकती ।
बड़ी रानी की आँखों में संतोष का अजीब सी चमक दिखाई दे रही थी । उसके चेहरे पर गुस्सा का बदब दिखाई देवराह था ।उसने अपने सेनिको को आदेश दिया इसे पकड़कर में घसीट कर दरबार मैं पेस करो ।
  
दरबार पूरी तरह से भरा हुआ था —मंत्री, सेनापति, दरबारी और आम प्रजा —सिंहासन के सामने खड़े थे। बड़ी रानी सिंहासन पर बैठी थी , उसके चेहरे पर दृढ़ता चमक रही थी। छोटी रानी अपने बेटे राजवर्धन के साथ जंजीरो से जकड़ी खड़ी थी।
वह भयभीत और असहाय दिखाई देती थी । उसे तो पता भी नहीं था कि क्या हो रहा है।
महाराजा की अनुपस्थिति और राजकीय शोक के बीच में उसे ओर उसके बेटे को यहां अपराधी तरह क्यों खड़ा किया गया है।
बड़ी रानी ने सबकी ओर देखते हुए ऊँची आवाज में कहा

“सभी को शान्ति बनाए रखनी चाहिए।
 आज मुझे एक अत्यंत गंभीर विषय पर न्याय की आवश्यकता है।
 यह राज्य सत्य और धर्म पर टिका है, और कोई भी अपराधी—चाहे वह राज परिवार का सदस्य ही क्यों न हो— सजा सबको मिलेगी अन्याय बर्दाश्त नहीं कर सकता।”
दरबार में हल्की सरसराहट होती है। कुछ चेहरे ख़बरों की प्रतीक्षा में तने हुए खड़े थे।

“मैं आज एक खुलासा कहना चाहती हूँ
ये अत्यंत ही घृणित और क्रूर अपराध हुआ है ,और उस अपराध में ..छोटी रानी का हाथ है।
 माहौल में सन्नाटा छा जाता है। 
छोटी रानी काँपते स्वर में पूछती है,
“महारानी— आप ये क्या कह रही है । मैने कौनसा अपराध किया जिसके लिए मुझे ओर मेरे पुत्र की यह अपराधी की तरह यहाँ लाया गया है। उसने कपड़े हुए स्वर में पूछा।

बड़ी रानी आँखो में गुस्सा कहती है
“तुम चुप रहो, बहन।
 मैं यहाँ जूठे- आरोप लगाने नहीं बैठी हूँ । 
हमारे पास प्रमाण हैं—तुम्हारे महल की एक भरोसेमंद दासी ने स्वयं स्वीकार किया कि उसने महाराज के भोजन में विष मिलाया था।
 और उसने यह सब छोटी रानी के कहने पर किया।
 क्या इससे बड़ा प्रमाण और चाहिए?”
दरबार में भारी हलचल मच गई। कुछ दरबारी एक-दूसरे की ओर देखते हैं; कुछ सिहर उठते हैं। छोटी रानी यह सुन कर धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ती है ,उसका शरीर पत्ते की तरह कांप रहा था ।
उसके प्रद जैसे का कर उसके शरीर से छीन लिए हो 
उसकी आवाज़ गले में फँसी सी लगती है ,
“यह झूठ है!
 वह दासी झूठ बोल रही है—क
 मैंने ऐसा कुछ नहीं किया —महारानी, यह षड्यंत्र हैं 
बड़ी रानी ..आंखों में कठोरता लिए हुए उसकी ओर देखती है।
“यदि तुम निर्दोष हो तो सच्चाई प्रकट करो । 
परन्तु तुम दोषी हो, और राज्य तुम एक ओर छल करने का मौका नहीं देना चाहता ।
तुमने राज्य और जनता के प्रति एक बड़ा अपराध किया है । 
मैं मांग करती हूँ कि दासी से औपचारिक पूछताछ कराई जाए और रानी की समझ में रहकर सत्य पर पहुंचा जाए।”
कुछ वफ़ादार मंत्री संकोच से एक-दूसरे की ओर देखते हैं—वे जानते हैं कि बड़ी रानी के हाथ अब सत्ता के तारों को मजबूती से पकड़ चुके हैं। 

कुछ लोग इच्छा से निगाहें झुका लेते हैं। 
एक वरिष्ठ मंत्री :
“महारानी—यदि प्रामाणिकता पाई जाती है, तो निश्चित रूप से कड़ी कार्यवाही होगी। पर हमे प्रक्रियात्मक ढंग से ही निर्णय लेना चाहिए।”
बड़ी रानी : ठीक है। 
दासी को प्रस्तुत कराओ। 
आज ही दरबार में ही उसका बयान लिया जाए—न्याय तभी ठीक होगा जब सत्य सबके समक्ष आ जाए।”
दरबारियों ने आदेश मान लिया; 
जनता के बीच अनुमानों और फुसफुसाहटों का शोर उठता है।
 कुछ लोग छोटी रानी के ग़लती में विश्वास कर लेते हैं, तो कुछ उसका समर्थन करते हुए दर्द से माथा पकड़ लेते हैं। महल में हवा बदल गई—विश्वास का धरातल हिलने लगा था 
सैनिक दासी को दरबार में लाते हैं। 
उसके चेहरे पर भय और पसीना है, लेकिन होंठों पर झूठी दृढ़ता दिखाई देती है । 
सबकी नज़रें उसी पर टिक जाती है
बड़ी रानी : बताओ, दासी! सबके सामने सच कहो। किसके आदेश पर तुमने महाराज के भोजन में विष मिलाया?”

दासी काँपती हुई, लेकिन आवाज़ ऊँची करते हुए:
“महारानी… मैं अपराधिनी हूँ। पर मैंने यह अकेले नहीं किया। छोटी रानी ही मुझे रोज़ आदेश देती थी। उसी ने कहा था—‘राजा को धीरे-धीरे विष दो।’ मैंने वैसा ही किया।”
दरबार में हलचल मच जाती है। लोग दबी आवाज़ में बातें करने लगते हैं। 
छोटी रानी चीख उठती है। यह झूठ है! यह सब झूठ है! मैंने ऐसा कुछ कभी नहीं कहा। महाराज मेरे प्राण थे, मैं कैसे उन्हें मारने का सोच सकती हूँ? यह षड्यंत्र है, यह मेरे ख़िलाफ़ रचा गया षड्यंत्र है!”
छोटी रानी राजकुमार को अपनी बाँहों में कसकर पकड़ लेती है। 
राजवर्धन मासूम आँखों से दरबार को देख रहा है, पर भय से उसकी पकड़ और मज़बूत हो जाती है।
बड़ी रानी : अपराधी हमेशा अपने पाप से इनकार करता है। दासी ने अपने मुँह से सब कुछ कह दिया है। अब न्याय का निर्णय दरबार को करना है।”
एक मंत्री संकोच से:
“महारानी, यह आरोप अत्यंत गंभीर है। परंतु केवल एक दासी की बात पर निर्णय करना उचित नहीं होगा। हमें और प्रमाण चाहिए। यह मामला राज्य के भविष्य और राजकुमार के सम्मान से जुड़ा है।”
कुछ मंत्री बड़ी रानी की ओर देखते हैं, मानो उसकी सत्ता से भयभीत होंअब चुप रहना ही उनको ठीक लगा । प्रजा की ओर से भी फुसफुसाहटें उठती हैं—जो छोटी रानी सबकी चाहती थी आज उसपर आरोप लगाया जा रहा था।

छोटी रानी रोते हुए “हे देवताओं! आप ही साक्षी हैं, मैंने ऐसा पाप कभी नहीं किया। यह सब षड्यंत्र है, मेरी जान और मेरे पुत्र की जान लेने का षड्यंत्र!”