मैं हो रहा हूॅं kunal kumar द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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मैं हो रहा हूॅं

कहते है जीवित बचे रहना बहुत बड़ी बात है पर कोई ये नहीं जानता उसकी भी एक कीमत है।
___________________________

“तू फिर उसी पेड़ के पास बैठा है?” माँ ने पूछा। लड़का मुस्कुराया नहीं।
बस धीरे से गर्दन हिला कर कहा “हाँ।”
“वहाँ क्या है?”
लड़का चुप रहा। कुछ देर बाद बोला — “वहाँ आवाज़ नहीं आती।”

गाँव में सब जानते थे कि वह लड़का थोड़ा अलग है। वो और लड़कों की तरह शोर नहीं करता, लड़कियों की तरह खुलता नहीं, और बुज़ुर्गों की तरह चुप भी नहीं रहता। वो बस देखता था, जैसे कोई दुनिया को बाहर से देख रहा हो।

“नाम क्या है उसका?” चौपाल में किसी ने पूछा।
“नाम?” दूसरे ने कहा — “नाम से क्या होता है? वो वही है… जिसके साथ… बचपन में…”
गाँव में वाक्य अक्सर पूरे नहीं होते।

एक रात थी जिसे वह कभी याद नहीं करना चाहता था पर भूल भी नहीं पाया। उस रात आसमान में चाँद नहीं था, पर अंधेरा किसी आकाश से नहीं आया था।
“चुप रहना।”
वह आवाज़ आज भी उसके भीतर रहती थी। उसने तब नहीं समझा कि उसके साथ क्या हुआ। बस इतना समझा कि उसके शरीर से उसकी सहमति ले ली गई थी और खून के धब्बे देह पर आत्मा पर छोड़ दी गई थी।

सुबह सब कुछ सामान्य था। मिट्टी वही, चूल्हा वही, माँ की आवाज़ वही। पर उसे लगा — वह अब अपने भीतर नहीं रहता।
बलात्कार के बाद भी कुछ लोग बच जाते है 
पर ये अहसास ठीक वैसा है जैसे कभी कभी नींद में हम 
किसी को जोर जोर से पुकारते है पर आवाज नहीं निकलती
आत्मा जैसे जकड़ी हुई हो।

“तू इतना चुप क्यों रहता है?” पिता ने पूछा।
लड़का बोला — “अगर मैं बोलूँ तो क्या सब बदल जाएगा?”
पिता हँसे। उन्हें लगा यह पढ़ाई का असर है।

स्कूल में उसने पहली बार एक शब्द सुना — “अस्तित्व।”
शिक्षक ने कहा — “मनुष्य पहले अस्तित्व में आता है, फिर अर्थ खोजता है।”
लड़के ने पूछा — “अगर कोई पहले ही टूट जाए तो?”
कक्षा हँस पड़ी। शिक्षक ने विषय बदल दिया।

धीरे-धीरे वह किताबों में रहने लगा। किताबें उसे जवाब नहीं देती थीं पर सवालों को सम्मान देती थीं।

“तू कवि बन रहा है क्या?” एक दोस्त ने चिढ़ाया।
वो बोला — “शायद।”

उसकी कविताओं में कोई घटना नहीं होती थी। बस खाली जगहें होती थीं। और लोग कहते “गहरी हैं।”
उसे हँसी आती। उसे पता था गहराई नहीं, खड्ड है।

एक दिन उसने माँ से पूछा — “अगर कोई अपना नहीं रहे तो क्या वह जीता है?”
माँ ने रोटी बेलते हुए कहा — “तू ज़्यादा मत सोचा कर।”

पर सोच उसके लिए विकल्प नहीं थी। सोच उसका एकमात्र बचा हुआ हिस्सा था।

वो अक्सर तालाब के किनारे बैठता। पानी में झाँकता पर अपना चेहरा नहीं देखता। उसे लगता चेहरा उसका नहीं है।

“तू इतना लिखता क्यों है?” एक लड़की ने पूछा।
वो बोला — “क्योंकि जिस दिन लिखना छोड़ दूँगा उस दिन शायद मैं सचमुच हो जाऊँगा।”
“मतलब?”
“मतलब जो हुआ था वह तब सच हो जाएगा।”
लड़की चुप रही। क्योंकि वह समझ नहीं पाई। और उसने समझाने की कोशिश भी नहीं की।

उसकी कविताएँ धीरे-धीरे गाँव से बाहर जाने लगीं। लोग कहते “बहुत दार्शनिक है।”

एक रात उसने लिखा —
 “सड़क के उस पार से रोज़
एक माँग उठती थी,
धीमी पर लगातार,
जैसे भूख
भाषा सीख रही हो।

मैं जानता था यह कोई भ्रम नहीं,
यह ज़रूरत है।
फिर भी मैंने आँखें मूँद लीं, 
तालू काट लिए और उसे
डर, अँधेरा, षड्यंत्र कहकर
आगे बढ़ गया।

मैं कायर नहीं था
होता
तो शायद रुक भी जाता पर
मैं सुविधाजनक था।
और सुविधाजनक होना
एक भ्रामक मोतियाबिंद है
काला मोतियाबिंद,
जिसमें लोग खो देते हैं
अपनी संपूर्ण दृष्टि।
और इस तरह 
किसी और की
नोची गई आँखें
मेरे अँधेपन से
कम महत्त्वपूर्ण लगने लगीं।

वैसे
सड़क के उस पार जाता
तो ज़िम्मेदारी दिखती।
और ज़िम्मेदारी से 
मैं हमेशा बहुत सभ्य तरीक़ों से बचता आया हूँ।

अब उस तरफ़ से
कुछ नहीं उठता
न कोई माँग,
न कोई चीख,
सिवाय एक सड़ी-गली टीस के।
टीस,
जिसमें दर्ज है
उस दिन की उम्मीद—
 मेरे आने की,
बचा लेने की।

ख़ैर,
वह मर चुकी है,
और उसके बदले
वह एक गंध हो गई ।
एक ऐसी गंध
जो कसाईखानों में,
वैश्याओं के मोहल्लों में
सामान्य हो जाती है।

यह गंध
पाप की नहीं,
उपेक्षा की है 
और उपेक्षा
मेरे द्वारा की गई सबसे घिनोना कृत है ।

शायद इसलिए मैं हुआ सबकुछ 
भाई , दोस्त , प्रेमी , पुत्र लेकिन
अंदर से रहा केवल 
एक निर्वासित देवता ।”

वर्षों बाद वह शहर गया। मंच मिला। ताली मिली। पहचान मिली।
पर एक सवाल अब भी वही था — “क्या मैं सचमुच हूँ या बस उस घटना का एक विस्तार हूँ?”

एक श्रोता ने पूछा — “आपकी कविता का स्रोत क्या है?”
वो मुस्कुराया( बहुत देर बाद पहली बार)
 और बोला — “एक रात जिसका कोई गवाह नहीं।”

उसने आगे कहा — “मैं कवि इसलिए नहीं बना कि मुझे शब्द पसंद थे। मैं कवि इसलिए बना क्योंकि मुझसे मेरा शरीर ले लिया गया था और मुझे कुछ तो चाहिए था जिसे मैं अपना कह सकूँ।”

तालियाँ बजीं। लोग भावुक हुए। कुछ रोए।
पर वह जानता था वे कविता पर रो रहे हैं, घटना पर नहीं।

उस रात वह फिर तालाब के किनारे बैठा। अब वह शहर में था पर पानी वही था।
उसने खुद से पूछा — “क्या अब मैं अपने भीतर लौट सकता हूँ?”
कोई उत्तर नहीं आया।
बस हल्की हवा चली और उसे लगा 
शायद अस्तित्व कोई स्थायी जगह नहीं बल्कि एक सतत प्रयास है, अपने टूटे हुए हिस्सों को नाम देने का।

उसने पानी में अपना चेहरा देखा 
थोड़ा मुस्कुराया फिर 
उसने मिट्टी में लिखा — “मैं हुआ था।”
फिर मिटा दिया।
और हँसते हुए दुबारा लिखा — “मैं हो रहा हूँ।”