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बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - अध्याय 10 — दूसरी ट्रायल रेस

एक महीना बीत चुका था।

सुबह की सड़कें अभी पूरी तरह जागी नहीं थीं।

नील दौड़ रहा था—कंधों से चिपकी पसीने में भीगी शर्ट, कदमों की ताल स्थिर। साँसें अब बिखरती नहीं थीं; भीतर जातीं और बाहर आतीं, गिनती में। उसने कलाई घुमाकर स्टॉपवॉच देखी—लैप टाइम पिछली बार से बेहतर था। थकान थी, पर नियंत्रण भी।

वह एक जूसवाले की दुकान पर रुका। गन्ने की मशीन घूम रही थी।

नील ने गिलास थामा, दो घूँट लिए, और तभी उसे लगा—भीड़ में कोई उसे देख रहा है। नज़र उठी। एक पल के लिए कोई साया दिखा… फिर लोग खिसक गए, साया भीड़ में घुल गया। नील ने जूस ख़त्म किया, जूसवाले को नोट पकड़ाया। यह ध्यान भटकाने का वक़्त नहीं था। उसने गिलास रखा और फिर दौड़ पड़ा।

दो दिन बाद—आख़िरी रेस

इस बार भीड़ पिछली बार से ज़्यादा थी। निशुल्क एंट्री थी और स्थानीय लोग जमा हो चुके थे।

दूर अपने घर में प्रतुल आज बैठा नहीं था—चहल-कदमी कर रहा था।

ट्रैक पर धूल उड़ रही थी। कुछ लैप बीत चुके थे और मैदान छँट चुका था। अब मुकाबला दो का था—एंड्र्यू नाइट और नील। बाकी तीन पीछे छूट चुके थे, रेडियो पर सिर्फ़ दो नाम घूम रहे थे।

एंड्र्यू आगे था। नील पीछे—बहुत पास।

टेलगेटिंग इतनी क़रीबी कि ब्रेक लाइट की परछाईं नील के हेलमेट पर पड़ रही थी। नील कोई जल्दबाज़ी नहीं कर रहा था। हर मोड़ पर वही लाइन, वही एंगल। दबाव बनाए रखना—बस इतना।

एंड्र्यू ने आईने में देखा। दाँत पीसे। एक पल के लिए उसका दायाँ हाथ हिला—अधीरता। अगले मोड़ पर उसने ज़रूरत से ज़्यादा आक्रामक कट लिया।

बस वही पल था।

नील की कार को झटका लगा। पिछला हिस्सा हल्का हुआ, टायर ने पकड़ छोड़ी। कार मिसबैलेंस हुई—और पलट गई। दो पलटियाँ खाकर सीधी हुई और ट्रैक के बगल के मैदान पर निशान बनाती रुक गई।

धूल। शोर। एक सेकंड की ख़ामोशी।

नील की दुनिया उलटी थी। हेलमेट के अंदर साँसें तेज़। उसने आँखें खोलीं, हाथ-पैर हिलाए—दर्द था, पर सब काम कर रहा था। उसने खुद को सीधा किया। इग्निशन। एक बार नहीं—दूसरी बार। इंजन खाँसा, फिर जाग उठा।

भीड़ शोर मचाने लगी।

नील गाड़ी को वापस ट्रैक पर लाया। स्टेयरिंग भारी थी, पर जवाब दे रही थी। उसने रफ़्तार बढ़ाई—साफ़, नियंत्रित। आगे एंड्र्यू अभी भी लीड में था, पर अब अंतर काफ़ी बढ़ चुका था।

फिनिश लाइन।

नील ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी थी। पर गाड़ी पलटना भारी पड़ा। वह दूसरे नंबर पर आया।

इंजन की आवाज़ धीमी पड़ी। उसने गाड़ी रोकी। हेलमेट उतारा। चेहरे पर खरोंचें थीं, पर आँखों में ठहराव। यह जीत नहीं थी—पर यह संदेश था।

स्टैंड्स में किसी ने ताली बजाई। किसी ने सीटी। कहीं दूर किसी ने नाम लिया—नील।

नील ने ट्रैक की ओर देखा। धूल बैठ रही थी।

हार हुई थी, पर भीतर एक अजीब-सी शांति थी।

क्योंकि उसने कोई गलती नहीं की थी। और आज, उसके लिए यही काफ़ी था।

दो घंटे बाद, प्रतुल का घर

कमरे के बाहर काँच के दरवाज़ों के पास नील कुर्सी पर बैठा था। अंदर ब्लाइंड्स आधे गिरे हुए थे। सिर्फ़ परछाइयाँ दिख रही थीं—एक लंबी, एक चौड़ी।

आवाज़ें दबाई हुई थीं, पर गुस्सा छिप नहीं रहा था।

अंदर से अंग्रेज़ी में तीखी बहस।

“…that was a clean move!”

“…don’t lecture me about rules!”

एक कुर्सी खिसकने की आवाज़।

टेबल पर कुछ ज़ोर से रखे जाने की धप्प।

नील ने सिर झुकाकर अपने हाथों की लकीरों को देखा। चेहरा शांत था। वह सुन रहा था, पर शामिल नहीं था।

अचानक दरवाज़ा झटका खाकर खुला।

एंड्र्यू नाइट बाहर निकला। हाथ में एक चेक था, कस कर पकड़ा हुआ। उसका चेहरा लाल था—गुस्से से, अपमान से।

जाते-जाते उसने नील की ओर देखा, एक पल ठिठका, और बीच की उँगली दिखाकर आगे बढ़ गया। कदम तेज़, दरवाज़ा ज़ोर से बंद।

नील ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। बस हल्की-सी साँस छोड़ी।

अंदर से प्रतुल की आवाज़ आई, “नील भाई, अंदर आ।”

नील उठकर भीतर गया।

प्रतुल टेबल के पास खड़ा था। सामने खाली कुर्सी, मेज़ पर बिखरे कागज़। उसने एक गिलास उठाया और एक ही घूँट में पानी पी गया।

नील ने हल्के अंदाज़ में कहा, “ये भाईसाहब तो बहुत गुस्से में थे।”

प्रतुल ने हाथ झटक दिया। “रेहवा दे यार। खुद चीटिंग से रेस जीता, और मुझे नियम-कानून सिखा रहा था। थोड़ा पैसा दिया, कल्टी किया।”

कुछ पल की चुप्पी।

प्रतुल आगे बढ़ा, नील के पास आकर रुका। उसकी आवाज़ अब ठंडी थी, तय।

“That’s not important.”

उसने नील के कंधे पर हाथ रखा—मजबूती से, जैसे वजन सौंप रहा हो।

“तू है मेरा खिलाड़ी। तू लेके जाएगा मुझे… मेरी जिगरा के पास।”

एक सेकंड की सीधी नज़र।

“तैयार है ना?”

नील के होंठों पर हल्की मुस्कान आई। थकान अब भी थी, पर आँखों में आग थी।

“हमेशा।”

कमरे के बाहर धूप ढल रही थी।

अंदर—फैसला हो चुका था।

शाम ढल चुकी थी।

नील प्रतुल के घर से बाहर निकला ही था कि सड़क के मोड़ पर एक पुलिस वैन आकर रुकी। दो सिपाही उतरे। बिना औपचारिकता, बिना सवाल।

“नील वरदराजन?”

उसे जवाब देने का समय भी नहीं मिला। बाजू पकड़कर वैन की ओर ले जाया गया।

लॉक-अप की गंध अलग होती है—सीलन, पसीना, बासी हवा।

नील को एक छोटे से कमरे में बैठाया गया। टेबल के उस पार इंस्पेक्टर तावड़े। मध्यम कद, मोटी मूँछ, आँखों में स्थायी अविश्वास।

तावड़े ने फाइल खोली।

“मैंने तफ्तीश की है तेरी,” उसने धीमे कहा।

नील ने सावधानी से कहा, “सर, आपको कोई ग़लतफ़हमी—”

अचानक हाथ उठा। एक तेज़ थप्पड़।

नील का सिर झटका खा गया। जबड़े के पास त्वचा फट गई। हल्का-सा खून निकल आया।

“जब मैं बोलूँ, तब बोलना,” तावड़े गरजा।

नील खून का स्वाद भीतर निगल गया।

तावड़े ने मूँछों पर ताव दिया।

“तेरी बहन इंद्राणी बताती है, तू मुंबई में ड्रग्गी था।”

नील की साँस एक पल को अटक गई। अब उसे समझ आ गया—यह सामान्य पूछताछ नहीं है। यह सेट-अप है।

तावड़े कुर्सी से उठकर उसके करीब आया, मेज़ पर झुक गया।

“पहले ड्रग्स… अब उस फॉरेक्स फ्रॉड वाले प्रतुल भाई की गाड़ियाँ चला रहा है। कहाँ जाने वाले हो तुम लोग? स्मगलिंग? ड्रग्स? क्या प्लान है?”

नील चुप रहा।

तावड़े गुर्राया, “बोल। वरना और भी तरीके आते हैं हमें।”

नील ने होंठ के पास से खून पोंछा। आवाज़ सपाट थी।

“मुझे वकील चाहिए।”

कमरे में एक पल के लिए ख़ामोशी फैल गई।

तावड़े की आँखें सिकुड़ीं। उसने फाइल बंद की।

“तुझे देखता रहूँगा अब,” वह बोला, “गिद्ध की तरह।”

वह मुड़ा और कमरे से बाहर निकल गया।

अगली सुबह

नील फिर प्रतुल के घर में बैठा था।

दोनों चुप।

नील के होंठ के पास सूखा हुआ खून था, हल्की मरहम-पट्टी लगी हुई। आँखें नींद न लेने के कारण हल्की लाल।

एक नौकर ने कॉफ़ी रखी और चुपचाप हट गया।

प्रतुल ने कप उठाकर एक चुस्की ली। “ये साला तावड़े मुझसे चिढ़ता है। सॉरी… मेरी वजह से तुम्हें—”

नील ने हाथ उठाकर रोक दिया। “नहीं, प्रतुल भई। इसमें मेरे भी दुश्मन शामिल हैं।”

उसने अपना फोन निकाला और मेज़ पर रख दिया। स्क्रीन पर एक तस्वीर थी—इंद्राणी और एंटोन, किसी पार्टी में, करीब खड़े।

नील कुछ पल चुप रहा। “मेरी सौतेली बहन… और उसका…”

वह रुक गया।

प्रतुल ने वाक्य पूरा किया। “उसका आशिक?”

नील ने सिर हिलाया।

कुछ सेकंड की चुप्पी।

प्रतुल ने फोन उठाया, तस्वीर गौर से देखी। उसके चेहरे का भाव बदल गया—हल्का-सा ठंडा। “ये मुझे भेजो,” उसने शांत स्वर में कहा। “अब तुम्हारा दुश्मन… मेरा दुश्मन।”

उसने नील की ओर देखा। अब उसकी आँखों में सिर्फ़ निजी दांव नहीं था—रणनीति थी।

फिर बात बदली। “चल छोड़ ये सब। तुझे कुछ दिखाता हूँ।”

वह पास की दराज़ से एक चाभी निकालता है और बाहर की ओर बढ़ता है। नील उसके पीछे।

दोनों गार्डन से होते हुए घर के पिछले हिस्से की ओर बढ़ते हैं। शाम की धूप ढल रही थी, घास पर लंबी परछाइयाँ खिंची थीं।

नील ने चलते-चलते एंकल मॉनिटर की ओर इशारा किया।

“आप ऐसे घर से बाहर निकल सकते हैं?”

प्रतुल बिना रुके बोला, “हाँ भाई, थोड़ा पेरिमीटर अलाउड है। इंसान थोड़ी धूप तो सकेगा ही। पाँच-सात मिनट में ये बीप करने लगेगा, फिर अंदर चलेंगे।”

वह एक बड़े मेटल गैराज के सामने रुका और रिमोट दबाया।

आटोमेटिक दरवाज़ा कर्कश ध्वनि के साथ ऊपर उठने लगा।

नील की आँखें फैल गईं।

अंदर खड़ी थी—वोल्ट्रोन मैक्स 45 GT।

मैट ग्रे बॉडी, नीची और चौड़ी। एयरो-किट इतनी आक्रामक कि सामने का हिस्सा ज़मीन को चूमता हुआ लगे। कार्बन-फाइबर स्पॉइलर, साइड-स्कर्ट्स हवा को चीरने के लिए तराशी हुई। बड़े डिस्क ब्रेक, लाल कैलिपर्स। बोनट के नीचे 4.5 लीटर ट्विन-टर्बो V8, जिसे रेसिंग के लिए री-मैप किया गया था। 0 से 100 तीन सेकंड से कम में।

गैराज की हल्की रोशनी में कार किसी जानवर की तरह प्रतीक्षा करती दिख रही थी।

प्रतुल ने चाभी हवा में उछाली।

नील ने बिना सोचे पकड़ ली।

वह ड्राइवर सीट पर बैठा। सीट ने मानो शरीर को जकड़ लिया—जैसे कार पहले से पहचानती हो कि उसे कौन चलाएगा। उसने इग्निशन ऑन किया।

इंजन गरजा।

पूरा गैराज काँप उठा। दीवारों में कंपन दौड़ गया। धातु की गूँज भीतर तक उतर गई।

प्रतुल चहक उठा।

“यही है हमारी सवारी।”

नील ने स्टीयरिंग को हल्के से थामा। कंपन हथेलियों से होकर बाजुओं तक गया। उसके भीतर कुछ जागा—कुछ जो महीनों से दबा हुआ था।

यह सिर्फ़ मशीन नहीं थी।

यह अवसर था।

यह जवाब था।

नील ने एक्सेलरेटर हल्का-सा दबाया। इंजन ने गहरे भरोसेमंद स्वर में जवाब दिया।

उसके शरीर में नई ऊर्जा दौड़ गई।

वो अब तैयार था।

उसने इग्निशन बंद किया और बाहर निकल आया। चाभी प्रतुल की ओर बढ़ा दी।

प्रतुल ने चाभी लेते हुए कहा,

“आज से तीन फरवरी तक तू यहीं रहेगा।”

नील मुस्कुराया।

“जो हुकुम, मालिक।”

दोनों ठहाका मारकर हँस पड़े।

प्रतुल ने कंधे से हाथ हटाते हुए कहा,

“चल, तुझे देसी ठर्रा पिलाता हूँ—स्कॉच के साथ मिक्स करके। मेरी पर्सनल कॉकटेल।”

नील हँसते हुए बोला,

“अब ये भी ट्रेनिंग का हिस्सा है क्या?”

प्रतुल की हँसी और तेज़ हो गई।