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बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - अध्याय 9 — पहली ट्रायल रेस

पंद्रह दिन बाद, ग्रीन ज़ोन एरीना, अहमदाबाद।

सुबह की धूप अभी नरम थी, पर ट्रैक पर खड़ी गाड़ियों के इंजन पहले ही गरम हो चुके थे। यह सुपरकार्स की रेस नहीं थी—मड-रेसिंग के लिए ट्यून की गई ताक़तवर हैचबैक गाड़ियाँ थीं।

नील सब चला चुका था, कुछ नया नहीं था।

पिट लेन में हलचल थी—हेलमेट, दस्ताने, रेडियो चेक। हर ड्राइवर स्टीयरिंग पर हाथ कसे हुए था।

नील चुप था। हेलमेट पहनते हुए उसने शीशे में खुद को देखा—चेहरा पतला, आँखों के नीचे हल्के साये, पर हाथ स्थिर थे। यही काफ़ी था।

कुछ किलोमीटर दूर प्रतुल मोतवाणी अपने घर के प्राइवेट थिएटर में बैठा था। सामने दीवार भर की स्क्रीन पर लाइव फीड चल रही थी।

हाथ में कॉकटेल था, बर्फ़ के टुकड़े गिलास से टकराकर धीमी आवाज़ कर रहे थे। उसने एक सिप लिया और बुदबुदाया, “चलो… देखते हैं।”

ट्रैक पर कारें लाइन में लग चुकी थीं। स्टार्ट लाइट्स लाल थीं। नील की उँगलियाँ स्टीयरिंग पर हल्की-सी हिलीं। शरीर शांत था, दिमाग़ तेज़।

हरी बत्ती जली और नील ने क्लच छोड़ा। कार आगे झपटी।

पहला मोड़ उसने बिना जोखिम के लिया—साफ़ लाइन, परफेक्ट एंगल।

दूसरा, तीसरा—वह तेज़ नहीं दिख रहा था, पर बिल्कुल सही था।

पहले लैप के अंत तक वह दूसरे नंबर पर था।

दूसरे लैप में उसने धीरे-धीरे बढ़त ली और पहले स्थान पर आ गया।

कमेंटेटर की आवाज़ उभरी, “ड्राइवर ब्लू बहुत डिसिप्लिन्ड रेस चला रहा है, कोई फ़ालतू मूव नहीं।”

प्रतुल स्क्रीन के और पास झुक गया। उसकी भौंह हल्की-सी उठी। नील के नाम के आगे ब्लू इंडिकेटर तीन से दो, फिर एक पर आ चुका था।

तीसरे लैप तक नील आगे बना रहा, लेकिन अब उसकी साँसें बदल रही थीं। हेलमेट के भीतर हवा भारी लगने लगी। सीना थोड़ी जल्दी उठ-गिर रहा था।

“अभी नहीं,” उसने खुद से कहा।

उसने ब्रेकिंग पॉइंट आधा मीटर पहले लिया—सुरक्षित, पर हर सुरक्षित फ़ैसले की अपनी कीमत होती है। शरीर पर भार पड़ रहा था—गाड़ी की शक्ति का और ब्रेक का।

चौथे लैप में काफ़ मसल्स में जलन शुरू हुई। पैर में चुभती सुइयाँ, कलाई में खिंचाव। उसने ध्यान नहीं दिया। दर्द गिनने का वक़्त नहीं था। कार अब भी लाइन पर थी, शॉट्स अब भी सधे हुए थे। कोई गलती नहीं।

अंतिम लैप। भीड़ खड़ी हो गई।

नील अभी भी पहले नंबर पर था। और तभी—उसकी जांघ जैसे पत्थर बन गई।

एक पल, बस एक पल। थ्रॉटल पर दबाव उतना गहरा नहीं पड़ा। कार ने जवाब दिया, पर आधा सेकंड देर से।

पीछे से एक कार निकल गई।

फिर दूसरी।

नील ने दाँत भींचे—नहीं। उसने पूरा ज़ोर लगाया, पर शरीर अब सुन नहीं रहा था।

तीसरी कार भी आगे निकल गई।

उसने अगला मोड़ बिल्कुल सही काटा, पर ताक़त खत्म हो रही थी।

चौथी कार ने भी उसे पार कर लिया। वह पाँचवें पर खिसक चुका था।

फिनिश लाइन नज़दीक थी। नील ने आख़िरी कोशिश में पूरी शक्ति झोंक दी और चौथे नंबर की कार पर दबाव बनाया, उसे पार कर वो फिर चौथे स्थान पर आ गया।

इंजन की आवाज़ धीमी पड़ी और कार रुक गई।

दर्शक बॉक्स की खाली कुर्सियों के बीच बैठे रामनिक भाई ने मैंगो जूस का घूँट लिया, पास बैठे विदेशी रेस विशेषज्ञों की नोटबुक्स पर एक नज़र डाली और प्रतुल को फ़ोन मिलाया।

प्रतुल ने गिलास नीचे रखा और कॉल रिसीव किया। स्क्रीन पर रिज़ल्ट चमक रहा था।

“रेस बढ़िया रही, नहीं?” रामनिक भाई बोले। “तमारो फेवरेट लड़को फोर्थ आव्यो।”

प्रतुल के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई। “સારું છે,” उसने कहा। “जान अभी है उसमें। अगली रेस में देखेंगे।”

ट्रैक पर नील हेलमेट उतार रहा था। पसीना आँखों में जा रहा था, साँसें तेज़ थीं, पर चेहरा शांत था। न निराशा, न ग़ुस्सा। इस रेस ने उसे उसकी बदली हुई हदों की याद दिला दी थी। जीतने के लिए उसे अपने शरीर पर बहुत काम करना था—और जल्द ही।

यह ट्रायल हार नहीं थी। यह चेतावनी थी।

और नील वरदराजन चेतावनियों को हल्के में नहीं लेता था।

रेस के बाद की पार्टी प्रतुल के शहर वाले घर में थी—खुला लॉन, धीमी रोशनी और बैकग्राउंड में चलती हल्की जैज़। प्रतुल के कुछ ट्रेडिंग और फाइनेंस वाले मित्र आमंत्रित थे और उसी सुबह की रेस के टॉप पाँच रेसर्स को भी बुलाया गया था। वही चेहरे, वही कपड़े, पर रेस की थकान अब शराब में घुल रही थी।

प्रतुल महँगा सिगार पकड़े लंदन से आए रेसर एंड्र्यू नाइट से बात कर रहा था। एंड्र्यू पहले नंबर पर रहा था और उसके चेहरे पर अभी भी जीत की चमक थी।

नील पास ही एक कोने में सोडा लेकर बैठा था। बर्फ़ के टुकड़े गिलास में हल्की आवाज़ कर रहे थे। उसके आसपास शोर था, पर वह उसमें शामिल नहीं था।

प्रतुल ने एंड्र्यू से “एक्सक्यूज़ मी” कहा और नील के पास आकर रुका। “अरे नील, थोड़ी हार्ड ड्रिंक लो?”

नील ने फीकी मुस्कराहट के साथ सिर हिलाया। “नहीं। अब बस एक ही नशा है—रेस का।”

एक पल को जैसे पार्टी का शोर थमा, फिर बाकी रेसर्स की हूटिंग और हँसी गूँज उठी। किसी ने ताली बजाई, किसी ने सीटी।

भीड़ में दीपा मुखर्जी दिखी—तंदरुस्त काया, लंबे खुले बाल, लाल लेदर जैकेट, ब्लू डेनिम जीन्स और कमर पर मोटी डिज़ाइनर बेल्ट। हाथ में व्हाइट वाइन। उसकी चाल में आत्मविश्वास था, आँखों में शरारत।

उसने प्रतुल की ओर देखते हुए कहा, “मिस्टर मोतवाणी, मैंने सुना है आप ये सब किसी एक लड़की के लिए कर रहे हैं।”

प्रतुल ने बिना झिझक जवाब दिया, “सच है।”

दीपा ने भौंह उठाई। “आप इतने बड़े आदमी हैं। आपको लड़कियों की क्या कमी?” कहते-कहते उसने जैकेट की ज़िप हल्की-सी नीचे सरका दी—बस उतना कि इशारा समझ आ जाए।

एंड्र्यू हँस पड़ा। “Oh, stop it, girl.”

हँसी फैल गई।

प्रतुल एक क़दम आगे बढ़ा और दीपा के सामने आकर रुक गया। दीपा ने उसकी ओर देखा, होंठों पर आधी मुस्कान। प्रतुल ने उसकी ज़िप को उँगलियों से पकड़कर ऊपर कर दिया। आवाज़ शांत थी, पर शब्द सख़्त।

“अपना टैलेंट दिखाओ—रेस ट्रैक पर। मुझे वही चाहिए।”

दीपा ने कंधे उचका दिए और वाइन का घूँट लिया, जैसे खेल खत्म हो गया हो।

प्रतुल मुड़कर खिड़की के पास चला गया। बाहर शहर की लाइट्स चमक रही थीं। पीछे पार्टी चलती रही—हँसी, गिलास, संगीत।

नील भी उठकर उसके बगल में आकर खड़ा हो गया।

प्रतुल सिगार का कश ले रहा था। धुआँ ऊपर उठकर अँधेरे में घुल गया। “ये लोग नहीं समझेंगे,” उसने कहा, आवाज़ में थकान थी। “जब सच्चा प्यार होता है न, तो उसके सिवा कुछ नहीं दिखता। आँखें बंद करता हूँ तो मुझे सिर्फ़ वही नज़र आती है। मेरी जिगरा।”

उसने नील की ओर देखा। “तुम्हें क्या नज़र आता है, नील?”

नील की आँखों के सामने दामिनी का चेहरा उभर आया—जैसे उसे आखिरी बार देखा था। उसका उभरा हुआ पेट, उसकी हल्की हँसी, और वह शांत ताक़त। अचानक उसकी आँखें भीग गईं।

उसने कुछ नहीं कहा। बस हल्के से सिर झुका दिया।

प्रतुल ने उसके कंधे पर हाथ रखा और हल्का-सा दबाया। कुछ पल दोनों चुप रहे—खिड़की के बाहर शहर, पीछे शोर, और बीच में एक सच्चाई जो शोर से कहीं ज़्यादा भारी थी।

मुंबई — इंद्राणी का पेंटहाउस

कमरे में टीवी की धीमी आवाज़ चल रही थी।

एंटोन सोफ़े पर आधा लेटा था, पर उसकी नज़र स्क्रीन पर नहीं थी। इंद्राणी का फ़ोन उसकी हथेली में था। स्क्रीन की रोशनी चेहरे पर पड़ी हुई थी। बैंकिंग ऐप खुला था। उँगलियाँ तेज़—पर सटीक। एक ट्रांज़ैक्शन। फिर दूसरा। कन्फ़र्मेशन आया। एंटोन ने बिना पलक झपकाए मैसेज खोले और एक-एक करके डिलीट करने लगा।

कदमों की आहट सुनते ही उसने फ़ोन लॉक किया, उसे ठीक से साइड टेबल पर रखा और सीधा होकर टीवी देखने लगा—जैसे वही उसका असली काम हो।

दरवाज़ा खुला। इंद्राणी अंदर आई और एक फ़ाइल फ़ोल्डर सोफ़े पर पटक दिया। “प्राइवेट एजेंसी की रिपोर्ट।”

एंटोन ने फ़ोल्डर उठाया और पन्ने पलटने लगा। पहले पन्ने पर प्रतुल की तस्वीर थी। पीछे कुछ रेसर्स के सिलुएट—उनमें से एक साइड-शॉट साफ़ दिख रहा था। नील।

“Is this Neel?” एंटोन ने पूछा।

इंद्राणी का चेहरा कस गया। “लग तो रहा है,” उसने दाँत पीसते हुए कहा। “भिखारी फिर से रेसिंग करने लगा है।” एक पल रुकी। “मुझे लगा था मैंने उसे पूरी तरह तोड़ दिया है, लेकिन—”

एंटोन ने फ़ोल्डर एक ओर फेंक दिया। वह उठा, इंद्राणी के पास आया और उसे बाहों में ले लिया। आवाज़ धीमी थी—आश्वस्त। “Forget about him.”

इंद्राणी ने उसकी छाती से सिर टिका दिया।

“मैं एक इंस्पेक्टर को जानता हूँ,” एंटोन टूटी-फूटी हिंदी में बोला। “देख लूँगा। You go take a long hot shower.”

उसने इंद्राणी का बाथरोब खोलकर उतार दिया। इंद्राणी शर्मायी, एंटोन रुका नहीं, उसका हाथ पकड़ा और दीवार से सटे आईने के सामने खड़ा कर दिया।

अपना नग्न अक्स देखकर इंद्राणी ने आँखें बंद कर लीं और खुद को समेट लिया।

“तुम किसकी डॉल हो?” एंटोन उसके कान में फुसफुसाया।

“तुम्हारी।” इंद्राणी धीरे से बोली।

एंटोन ने उसके हाथ पकड़कर पीछे की ओर घुमा दिए। “Now look at yourself.”

शर्मसार इंद्राणी ने आँखें खोलीं और तुरंत एंटोन से लिपट गई।

एंटोन ने उसके बाल पकड़कर पीछे खींचा, “Go clean up.”

इंद्राणी हल्की-सी मुस्कान के साथ बाथरूम की ओर चली गई।

एंटोन ने अपना फ़ोन उठाया और कॉन्टैक्ट्स स्क्रॉल करने लगा। स्क्रीन पर इंस्पेक्टर तावड़े, अहमदाबाद का नंबर चमक रहा था।