राजू घर आया तो माँ ने खाना परोसा हुआ था।
“अच्छा हुआ तू आ गया, चल खाना गरम है। दोनों खाते हैं। बेटा, पहले हाथ-मुँह धो ले…” माँ ने राजू से प्यार से कहा।
राजू बाहर जो अभी सब देख कर आया था, उसकी वजह से घबराया हुआ था, पर घर आकर थोड़ा शांत हो गया था। माँ को ठीक देखकर उसे अच्छा लगा।
“तू ठीक है ना माँ?”
“हाँ, मैं ठीक हूँ। चल अब जल्दी आ जा, खाना खाते हैं।”
राजू हाथ-मुँह धोने चला गया। दोनों ने अच्छे से खाना खाया।
“माँ, आज इतना सब कैसे बना लिया?” बिस्तर पर लेटकर राजू ने माँ से पूछा।
“हाँ, वो सेठानी ने आज पगार दे दी थी, इसलिए… तुझे अच्छा लगा आज सब कुछ?” सुधा ने उसके पास लेटकर उसके बालों में हाथ फेरा।
“हाँ माँ, आज बाबा की याद आ गई। जब बाबा होते थे तो ऐसे ही अच्छा खाना बनाती थी…”
राजू की बात पर सुधा की आँखों में नमी उतर आई। उसने राजू को चादर ओढ़ाकर उसके माथे पर प्यार किया।
“चल, सो जा।”
राजू ने आँखें बंद कर लीं, पर आज जो कुछ हुआ था वह सब अभी उसके मन में चल रहा था। फिर भी, थोड़ी ही देर में वह गहरी नींद में सो गया।
राजू… उठो राजू… माँगो, मुझसे क्या माँगना है…”
राजू को नींद में ऐसा लगा जैसे कोई उसे पुकार रहा हो। थोड़ी देर तक वह बिस्तर पर कस्मसाते हुए करवटें बदलता रहा, पर जब दूसरी बार फिर वही आवाज़ बिल्कुल उसके कानों के पास सुनाई दी तो वह चौंककर तेजी से उठ बैठा।
अँधेरे में आँखें खोलकर इधर-उधर देखने लगा।
“क… क… कौन है?” डरते हुए उसने चारों तरफ देखा।
माँ बेखबर सोई पड़ी थी।
“मैं कहता हूँ, कौन है? देखो, मुझे परेशान मत करो। मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?”
“अरे, तुम ही ने तो शिकायत की थी ना कि तुम्हें अच्छी ज़िंदगी क्यों नहीं मिली… मुझे तुम्हारे पास भेजा गया है, ताकि तुम्हारी सारी इच्छाएँ पूरी कर सकूँ। बोलो, क्या माँगना है? अच्छा घर, पैसा, कपड़े… या हीरे-जवाहरात?” हल्की-सी हँसी के साथ जवाब आया।
“तुम हो कहाँ? पहले मेरे सामने आओ…”
राजू डरते-डरते बिस्तर से उठा और आवाज़ के पीछे कमरे से बाहर निकल आया। आँगन के बीचों-बीच वही छोटी-सी मूर्ति रखी थी, जिससे एक रोशनी निकल रही थी। राजू हैरान रह गया। वह उसके पास गया और उसे उठाकर उलट-पलट कर देखने लगा।
“क्या मैं जो माँगूँगा, तुम मुझे वह सब दोगे?”
“हाँ, सब मिलेगा… बस तीन चीज़ें माँगो, जिनकी तुम्हें सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।”
राजू बहुत खुश हो गया। उसका दिल खुशी से ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
“क्या तुम मुझे बहुत सारे पैसे दे सकते हो… ताकि मैं अपनी माँ का इलाज करा सकूँ?”
राजू अंदर से घबराया हुआ भी था, पर डरते-डरते उसने कह ही दिया।
“राजू, अपने बिस्तर के नीचे जाकर देखो…”
राजू धीरे-धीरे बिस्तर के पास गया। चादर का कोना उठाकर देखा—नए-नए नोटों का बंडल वहाँ रखा था। उसकी आँखें चमक उठीं।
“तुम कौन हो… और मेरे लिए यह सब क्यों कर रहे हो?” राजू ने पूछा।
“मैं एक जिन्न हूँ और बरसों से इस मूर्ति में क़ैद हूँ। उस दिन तुमने जो पत्थर आसमान में फेंका था, उसी में मैं अपनी सज़ा काट रहा था। एक जादूगर ने अपने लालच में मुझे इस पत्थर में क़ैद कर दिया था। लेकिन अगर मैं किसी की मदद कर दूँ, तो मैं आज़ाद हो जाऊँगा। तुम मुझसे दो और चीज़ें माँग सकते हो, ताकि मैं जल्दी से आज़ाद हो जाऊँ…”
राजू को उसकी कहानी बड़ी दिलचस्प लगी, पर उसने सोचा—कहीं यह आज़ाद हो गया और इसने सब कुछ वापस छीन लिया तो?
यह सोचकर राजू ने कहा, “हाँ… देखो, बाकी की चीज़ें मैं थोड़ा सोचकर माँगूँगा। माँ से पूछकर बताऊँगा। तुम कुछ दिन इंतज़ार करो।”
“ठीक है, जैसी तुम्हारी आज्ञा। अब तुम मेरे मालिक हो।”
इतना कहते ही मूर्ति हवा में गायब हो गई।
राजू अंदर आकर पैसों को देखने लगा। पैसे वहीं थे। वह बहुत खुश हुआ, पर उसने दोबारा चादर डाल दी और वहीं लेटकर सो गया।