Hunted Train Station Sanjay Kamble द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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Hunted Train Station


 Hunted train station



Sanjay Kamble



 जोर पकड़ चुकी बारिश की बूंदें खिड़की की टूटी जाली से आते हुए कमरे की हवा में एक ठंडा सा भय घोल रही थीं। बाहर कुत्तों की रूदन भरी आवाजें, और बीच-बीच में सुनाई देती उल्लू की 'हू... हू...' रात को और डरावना बना रही थी।

यह कमरा, जो एक छोटा सा ऑफिस था, अब एक अपराध का गवाह बन चुका था।

दरवाजे के पास एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी टूटी पड़ी थी, जिस पर खून के छींटे साफ नज़र आ रहे थे। फर्श पर कागज़ बिखरे थे, कुछ फटे हुए, कुछ खून से सने। एक कोने में एक लैम्प उलटा पड़ा था, उसका बल्ब टूटकर चकनाचूर हो चुका था। ऐसा लग रहा था मानो यहां कुछ ही देर पहले जानलेवा झड़प हुई हो।

कमरे के बीचों-बीच एक लाश पड़ी थी—मुंह के बल, पीठ से बहता हुआ ताज़ा खून धीरे-धीरे फर्श पर फैलने लगा था।

     
दीवार के सहारे खड़ा वह आदमी बिलकुल स्थिर था—मानो उसकी सांसें भी किसी गहरी सोच में थम गई हों। उसका चेहरा अंधेरे की वजह से नजर नहीं आ रहा था, लेकिन आंखों में क्रूरता का ठंडा अक्स साफ दिखाई दे रहा था।

उसके हाथ में एक तेज धार वाला छूरा था। छूरे पर अब भी गर्म खून की परत जमी थी, जो धीरे-धीरे ठंडी होती जा रही थी।

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा जिससे उसके पैरों के जुतों की आवाज सन्नाटे में भी गूंजने लगी। वह घुटनों के बल झुका और छूरे को लाश के शर्ट से पोंछने लगा और साफ होने के बाद वो छूरा ऐसे चमक उठा जैसे कोई पुराना हथियार फिर से चमका रहा हो।

खड़ा होकर बेहद शांत और ठंडी आवाज़ में बोला—

 “तुझे क्या लगा... इतना सब कुछ करने के बाद तु आसानी से बच जाएगा?”


उसके स्वर में न कोई डर था, न पछतावा। सिर्फ एक अजीब-सी तसल्ली, जैसे किसी अधूरे हिसाब की फाइल बंद हो गई हो। उसकी नजर दीवार पर टंगी घड़ी पर गई। १०:५० हो चुके थे। वह चौंक गया जैसे उसे कुछ याद आया हो। वह आदमी तेजी के साथ उस अंधेरे कमरे से निकल बाहर के घने अंधेरे में कहीं गायब हो गया। 


बारिश कुछ हल्की पड़ने लगी। बाहर की दुनिया को अब भी इस कमरे के भीतर के रहस्यमई मौत का अंदाज़ा नहीं था।


******


      उसी रात 



करीब 1:30 बजे थे। शहर की बाहरी सीमा पर स्थित वह पुराना रेलवे स्टेशन रात के इस समय लगभग वीरान पड़ा था। स्टेशन की पीली पड़ चुकी ट्यूब लाइटें झपक-झपक कर जैसे किसी अनकहे खतरे की ओर इशारा कर रही थीं। हवा में अजीब सी खामोशी थी.

  एक ऐसी चुप्पी, जो अक्सर किसी तूफान से पहले पसरी होती है। तूफान से पहले मतलब पिछले कई दिनों से शहर में खौफनाक घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा था। कोई सिरफिरा, पागल खूनी शहर की वीरान गलियों में अपना शिकार ढूंढते हुए आजाद घूम रहा था। क्या मर्द, क्या औरत, क्या बच्चे। किसी पर भी रहम नहीं

   उस स्टेशन पर इक्का-दुक्का लोग अब भी नज़र आ रहे थे। कोई प्लेटफार्म की दूसरी तरफ एक बंद दुकान के नीचे खड़ा सिगरेट सुलगाकर सफेद धुएं को हवा में उडेल रहा था, तो कोई थके कंधों के साथ प्लॅटफॉर्म के इस तरफ कोने में पसरा पड़ा था। वही कुछ दूर एक दुबला-पतला कुत्ता करवट बदलता हुआ, बेपरवाही से नींद में था। वैसे भी उस कुत्ते को अपने आसपास की अच्छी बूरी चीजों से क्या ही फर्क पड़ता।

लेकिन प्लेटफार्म की आख़िरी दीवार के पास, पुराने पीपल के पेड़ की छाया में, एक शख्स अलग ही कहानी बुन रहा था। 

करीब 30 साल का, गेहुंआ रंग, आँखें गहरी और सतर्क। उसने हल्की कलर की शर्ट पहन रखी थी, काली पैंट और उस पर सलीके से पॉलिश किए हुए जूते। सिर पर खिंची हुई काली टोपी, जो उसके चेहरे को आधा ढँक रही थी। लेकिन उसकी आँखें, पुरी तरह चौकन्नी, रात के अंधेरे में छुपे किसी भी राज को चीरने की ताकत समेटी। उनमें एक बेचैनी थी।

वह स्टेशन की दीवार से सटे इमली के पेड़ के नीचे एक जर्जर पत्थर पर कुछ इस अंदाज़ में बैठा था जैसे इस स्टेशन का हर कोना उसकी नजर की गिरफ्त में आ सके। वहां खड़ा कोई भी इंसान चाह कर भी उसे नहीं देख सकता क्योंकी उस जगह काफी अंधेरा था पर वह सब कुछ देख रहा था। उसकी निगाहें हर आने-जाने वाले पर स्थिर थीं, जैसे हर चेहरा किसी फाइल का पन्ना हो, जो वह मन ही मन पढ़ रहा हो।

  उस स्टेशन की जमीन पर काफी अजीब चीजें बिखरी पड़ी थी। कुछ साबूत तो कुछ आधे कटें नींबू, लकड़ी की छोटी टोकरी में उबले चावल पर बिखरा गुलाल, नारीयल , काली गुड़िया, ऐसी काफी सारी चीज़ें स्टेशन के पास कुछ पटरीके नजदीक रखी नजर आ रही थी। पर उस पत्थर के पास खड़े उस शख्स को इन सारी चीजों से डर नहीं लग रहा था।  

साधारण जासूसों की तरह उसके पास कोई फाइल, कैमरा या नोटबुक नहीं थी। पर उसकी आँखें ही उसकी रिपोर्ट बना रही थीं। कोई आहट होती, कोई गाड़ी सीटी मारती या कोई परछाईं खिसकती—उसका सिर हल्का सा हिलता, नज़रें वहीं जम जातीं।

उसके होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी, जैसे वह जानता हो कि कुछ होने वाला है। और वो भी उसी बात का इंतजार कर रहा था। 

पर क्या?

अचानक पास की पटरियों पर कोई हल्की-सी चुपचाप सीटी की आवाज़ गूंजी। कोई ट्रेन नहीं थी… फिर?

उसने टोपी को हल्का-सा उपर खिसकाया, और अपनी बाईं तरफ दूर तक फैले अंधेरे में एकटक घूरने लगा।

शायद, उस रात स्टेशन के प्लेटफार्म केवल वो, बेंच पर कंबल ओढ़े सो रहा आदमी और सोता कुत्ता इतने ही नहीं जाग रहा थे।

कुछ और भी था...
कुछ, जो देखने वालों को नहीं दिखाई देता...
पर वह देख रहा था।

 आसमान में पुनम के चांद की धुंधली चादर ओढ़ी मद्धम रोशनी रेलवे ट्रैक पर रेंगती हुई जैसे अंधेरे की पीठ सहला रही थी। तभी अंधेरे में दुबककर खडे उस शख्स की निगाह दूर कहीं रेलवे लाइन के ऊपर एक हलचल पर जा टिकी।

धुंधली सी एक परछाईं…
सुनसान पटरी के बीचोंबीच, धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ती हुई।

वह पलभर के लिए सिहर गया।
"इतनी रात को... कोई रेलवे ट्रैक पर से चलता आ रहा है ?" 

उसकी भौंहें तन गईं। सावधानी से अपनी टोपी थोड़ा आगे खींची और निगाहें उस परछाई पर गड़ा दीं।

आकृति अभी भी धुंधली थी, पर उसकी चाल में एक अजीब सी स्थिरता थी। न तेज, न धीमी। जैसे वह किसी और ही दुनिया की रफ्तार में चल रही हो। स्टेशन के पीले पड़ चुके बल्बों की मटमैली रोशनी जैसे ही उस पर पड़ी — वो हैरान हो गया।

क्योंकी वो एक औरत थी। और किसी औरत का रात के डेढ़ 2:00 बजे खाली पटरी पर चलते हुए उस वीरान रेलवे स्टेशन पर आना सामान्य नहीं था। खुले आसमान में अकेले उडते किसी बाज के जैसी तेज निगाहों से उस औरत की हालत का अंदाजा लगाने लगा।

***

उम्र कोई 27-28 की रही होगी। कंधे झुके हुए — जैसे बरसों की मार और अपमान ने उसकी रीढ़ की हड्डी से साहस चुरा लिया हो। चेहरा बेहद शांत। इतना शांत कि जैसे उसने अब हर शोर से नाता तोड़ लिया हो। न आंखों में घबराहट, न ही किसी किस्म की जल्दी… बस एक उदासी, किसी धीमे ज़हर की तरह उसकी रगों में बहने वाली।



उसने हल्की गुलाबी रेशमी साड़ी पहनी है, जिस पर कढ़ाई वाले फूल बने थे — पल्लू पर गुलाब और छोटी-छोटी बेलें, जिनसे अक्सर आम स्त्रियाँ अपने छोटे-छोटे त्योहार सजाया करती हैं। लेकिन उस वक्त, वो रंग जैसे उस पर फब नहीं रहे थे… या यूं कहो, कि उस रंग के पीछे की कहानी बहुत फीकी पड़ चुकी थी।

उसके लंबे, घने बाल...कमर से नीचे तक बेतरतीब बहते हुए, जैसे रात की परछाइयों को समेट लाए हों।
पैर नंगे , पर वह किसी दर्द के बिना सीधे ट्रैक पर चली आ रही थी।

और फिर... कंधे से खीसकते पल्लू को एक हाथ से ठीक करते ही उसके हाथों की हरी चूड़ियाँ मद्धम चाँदनी में झिलमिला उठीं। माथे पर छोटा लाल कुमकुम का टीका — उस उजले चेहरे पर जैसे कोई फिकी पडचूकी याद। उसके चेहरे पर गहरी खूबसूरती थी, लेकिन वो उदासी समेटे हुए लग रही थी। उसकी आंखों में एक वीरान झील का सन्नाटा था।

वह शख्स अपनी जगह जड़ हो गया।

उसकी सांसें थम गईं।

"लगता है नई नवेली दुल्हन है। पर इतनी रात गए इस तरह "
वह सोच में पड़ गया।

"शायद आत्महत्या करने जा रही है?
या घर छोड़कर..?"

लेकिन फिर उसके दिमाग में दूसरा ख्याल आया —
"अगर मरने ही जा रही होती, तो ये इतनी नफासत से सज-धजकर क्यों आती?" 

महिला की साड़ी का पल्लू हवा में इस तरह लहरा रहा था जैसे किसी नदी की हल्की धाराएं हो..

वह शख्स धीरे-धीरे खड़ा होने ही वाला था, लेकिन फिर रुक गया। उसकी आंखों में अब सिर्फ जिज्ञासा नहीं थी — उसमें कई सारे सवालों के साथ खिंचाव भी।

“पहले देखता हूं, ये कहां जाती है... और इतनी रात को यहां क्यों आई है…”

उसने अपनी जगह नहीं छोड़ी। पर अब उसकी उंगलियां पत्थर की सतह को कसकर जकड़ चुकी थीं।

वो औरत अब प्लेटफार्म पर आ चुकी थी पर चलना अब भी जारी था। तभी उसने देखा की इतनी देर से प्लॅटफॉर्म की दुसरी तरफ बंद दुकान के सामने खड़ा वह शख्स अब चलते हुए प्लॅटफॉर्म की इस तरफ पहूंच गया है। और दोबारा एक जगह पर खड़ा सिगरेट सुलगा रहा है। उसे नजरंदाज कर उसकी आंखें दोबारा उस महिला को तलाशने लगी पर तभी इतनी देर आराम से सो रहा कुत्ता अचानक गुर्राकर उठा — उसकी आंखें लाल हो चुकी थीं और वह उस औरत की तरफ देखकर भौंकने लगा । लेकिन इससे उस महिला की चाल में कोई फर्क नहीं पड़ा।

उसने बगैर कुत्ते की ओर देखे चलना जारी रखा। पर उसकी तरफ देखते हुए कुत्ता लगातार भोंक रहा था पर बिना हिचकिचाए वह सामने एक पुरानी लकड़ी की बेंच के एक छोर पर बैठ गई। चुपचाप। बिल्कुल शांत।

प्लेटफार्म पर टंगी बड़ी सी गोल घड़ी 2:00 बजने का इशारा कर रही थी। 

पर उस औरत की आँखें अब भी कहीं दूर अंधेरे में टिकी हुई थीं — दूर जाती हुई रेलवे की खाली पटरी की तरफ। पर वो ऐसे नहीं देख रही थी जैसे कोई ट्रेन आने का इंतज़ार कर रही हो।
वो देख रही थी… जैसे कुछ याद कर रही हो, अपने अतित के कुछ पन्ने, या बीती यादें। पर इस बीच खाली प्लॅटफार्म पर कुत्ते के भौंकने की वह आवाज काफी डरावनी लग रही थी। 

काफी देर से भौंक रहे उस कुत्ते की तरफ महिला ने एक नजर घुमाई। पर उसकी वो एक नज़र…

जैसे सैकड़ों बर्फीले कांटे उस कुत्ते की आत्मा में उतर गए हों।
कुत्ता दो कदम पीछे हट गया — उसकी पूंछ नीचे झुक गई, और वह थरथराते हुए उपर आसमान की तरफ देखकर रोने लगा।

कुत्ते का वह रुदन सिर्फ आवाज़ नहीं थी, कुछ अजिब था। 


पर तभी वह आदमी — जो अब तक अंधेरे कोने में बैठा तमाशा देख रहा था — अब और चुप नहीं रह सका।

वह धीरे-धीरे उठा।

प्लेटफॉर्म पर एक बार चारों तरफ नज़र दौड़ाई और बेंच के एक छोर पर बैठी उस अकेली महिला की तरफ देखते हुए आगे बढ़ने लगा। वो जो अब भी स्थिर, शांत और गुमसुम बैठी थी। पर उससे कुछ दूर खड़ा वह कुत्ता, अब सिसकियों में रो रहा था

यह दृश्य किसी दिमागी भ्रम जैसा नहीं था —
यह सजीव होकर भी मृत-सा।

कुत्ते की यह रूदन उसके दिमाग को जैसे कुरेदने लगी। वह शख्स आगे बढ़ा। तेज कदमों से चलते हुए प्लैटफॉर्म पर रोने वाले कुत्ते की ओर बढ़ा और उसे दूर हटकाने की कोशिश की।

"हट! चल भाग यहाँ से..." 

आदमी की इस हरकत पर कुत्ते ने दांत दिखाए, थोड़ी देर गुर्राया… पर फिर भौंकता गया और अंधेरे में कहीं गायब हो गया लेकिन भौंकने की आवाज अब भी आ रही थी।

अब प्लेटफॉर्म पर फिर सन्नाटा था।

लेकिन यह सन्नाटा... अब वैसा नहीं था।

अब यह सन्नाटा बोझिल था। एक नजर उस औरत की तरफ देख कर वह आदमी उसी बेंच के दूसरे सिरे पर बैठ गया।

महिला और उसके बीच कुछ दूरी थी —
लेकिन उस दूरी में भी कोई अदृश्य दीवार थी… या शायद पुल।

उसने गर्दन घुमाकर महिला की ओर देखा।

वह अब भी उसी मुद्रा में बैठी थी — चेहरा सीधा, आंखें खाली ट्रैक की ओर।

लेकिन उसकी पलकें भी नहीं झपक रही थीं। जैसे वो किसी गहरी सोच में डूबी थी।

तभी ठंडी हवा ने उसके बालों को हल्का सा छुआ…
तो उसे महसूस हुआ — जैसे उसके कानों में किसी पुरानी ट्रेन की सीटी गूंज गई हो। लेकिन बगैर उसकी तरफ देखें शख्स ने पूछा


आदमी : शायद आप इस शहर में नई है ?

औरत : ( हैरानी से) अपने मुझसे कुछ कहां ?

आदमी : ( मजाकिया अंदाज में) जी नहीं, वो खाली पटरी और इस खाली प्लेटफार्म से बात कर रहा हूं। अरे आप ही यहां पर है तो आप ही से बात करूंगा ना। 

औरत बगैर कुछ कहे खाली पटरी की तरफ देखने लगी 

आदमी : इस शहर में जिस तरह के हालात है वह देखते हुए यहां पर रहने वाला कोई भी आम शहरी इतनी रात गए, इस खाली प्लेटफार्म पर आने की हिम्मत नहीं कर रहा। और उसमें भी अगर महिला हो तो यह सपने में भी सोचने की कोशिश नहीं करेगी।

औरत : ( बीना हिचकिचाए ) और यही बात मैं आपसे भी पूछ सकती हूं , के इतनी रात गए इस खाली प्लेटफार्म पर आप टहल रहे हैं। शहर में जो हालात चल रहे हैं, वह पता होने के बावजूद। पता है ना उस कातिल ने सिर्फ औरतों की ही नहीं बल्कि आदमीयों की भी हत्या बर्बता के साथ की है।

आदमी : तो आप मुझे डराने की कोशिश कर रही है ?

औरत : बिल्कुल नहीं। बस आगाह कर रही हूं। मतलब जिस डर से आप मुझे वाकिफ कराना चाहते हैं , उसी डर से आपको भी वाकिफ हो जाना चाहिए।

आदमी : आप तो काफी बहादुर है, लेकिन मेरा काम ही ऐसा है कि मुझे हर किस्म के डर का सामना करना पड़ता है। 

औरत : ऐसा कौन-सा काम करते हो ?

आदमी : प्राइवेट डिटेक्टिव हूं। पैसे वाले लोग के लिए सिक्योरिटी के साथ जानकारी जुटाना मेरा काम है। 

औरत : ठीक है, पर ऐसे वीरान रेलवे स्टेशन पर ऐसी कौन सी जानकारी जुटा रहे हो।

आदमी : है कुछ ऐसी जानकारी जो किसी अजनबी के साथ साझा नहीं कर सकता।

औरत : मतलब आप मुझ पर शक कर रहे हैं । या आपको लगता है कि आप जिसकी तलाश कर रहे हैं वह मैं हूं। 

आदमी : हो भी सकता है। और नहीं भी। वैसे आप बड़ी बहादुर हो। 

औरत : ( अपनी गुमसुम निगाहें दूर अंधेरे में टिकाएं हुए कहा) बहादुरी डर के ऊपर निर्भर होती है। और डर तब तक लगता है जब हमें अपनी जान की फ़िक्र होती है। 

आदमी : आपकी बातों से लगता है जिंदगी में आपने कोई बडी ठोकर खाई है ?

औरत : (उस गहरे अंधेरे से बगैर अपनी नज़रें हटाए हल्के से मुस्कुराते हुए कहा) जिंदगी में कोई एक ठोकर नहीं, कई ठोकरें खाई है। और उन्हीं ठोकरों ने दिल से डर को खत्म कर दिया।

उसकी आवाज में कोई हिचकिचाहट नहीं थी फिर भी आंखें नम हो गई। 

आदमी : काफी बुरा लगा सुनकर। पर जो भी हो। पुरानी बातें भूलकर आगे बढ़ना ही पड़ता है। एक ना रूकने वाले सफर की तरह।


औरत : (नम आंखों में छलकते आंसुओं की बुंद को हल्के से उंगली से पोंछते हुए) सही कहा आपने । किसी न रुकने वाले सफर पर चलना ही पड़ता है। सब कुछ ठीक था। घर था, अपने लोग थे, एक परिवार था। पर एक लालच मुझे यहां तक ले आया। मुंबई के रेलवे स्टेशन के पास ही रहती थी। वही उससे आंखें मिलीं और ऐसा ही एक सफर शुरू हुआ। वही सफर यहां कोल्हापुर ले आया। सोचा था सारी मुरादें पूरी होंगी। वो मुझे खुश रखेगा। उस एक चाहत में सब कुछ छोड़ कर यहां चली आई थी। एक जिस्म दो जान हो गए थे। मुझे जो भी पसंद था वह बीना मांगे ले आता। कुछ ही दिनों में सिर्फ मेरी खातिर उसने अपने आप को पूरी तरह से बदल दिया था। उसके कपड़े, उसका रहन-सहन, यहां तक की खाना भी मेरी पसंद का ही मंगवाता।

आदमी : क्या बात है ! अच्छा जुडाव हो गया था आपसे !

औरत : हां बहुत। मुझे भी उसका साथ बहुत पसंद था। एक पल के लिए भी मैं उसे अकेला नहीं छोड़ती थी। वह बड़े से फ्लैट में रहता था इसलिए हमें किसी का डिस्टरबेंस नहीं था। लेकिन एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने सब कुछ बदल दिया।

आदमी : हां, तुमसे ऊब गया होगा। इसलिए सड़क पर छोड़कर चला गया।

औरत : तुम बिल्कुल गलत हो। ना वह मुझसे उब गया था ना मैं उससे। हम दोनों एक दूसरे से अलग नहीं होना चाहते थे। लेकिन उसके घर वालों को यह मंजूर नहीं था। 

 आदमी : यार ये घरवालें भी ना अजीब होते हैं। उन्हें अपने ही परिवार के सदस्य की खुशी बर्दाश्त नहीं होती। फिर क्या हुआ ?

औरत : उसके मां-बाप ने पहले तो उसे समझाया बुझाया। पर वह मानने के लिए तैयार नहीं था। ना हीं मैं। हमारा जुड़ाव देख उसके पापा किसी आदमी को ले आए। दिखने में ही काफी अजीब था। उसने बहुत परेशान किया। कमरे में बंद कर के रखा, दोनों को मारा पीटा, लेकिन फिर भी हम एक-दूसरे को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। बात मारपीट तक नहीं रही। भुखा प्यासा रखा। कई दिनों तक खाने को भी कुछ नहीं देते थे। मैं भूख से बिलखती रहती, खाना मांगने पर मुंह में राख, मिट्टी ठूंस दी जाती। उनके सामने खुब रोई , गिड़गिड़ाई पर उसे रहम नहीं आया। वह मुझे वहां से निकाल देना चाहते थे। लेकिन आप ही बताओ मैं कहां जाती। अनजान शहर, अंजान रास्ते, अंजान गलियां। पर रोज रोज की पिटाई , वह दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा था। फिर मैंने उसे छोड़ने का फैसला किया। अब ना कोई रास्ता नजर आ रहा है। ना किसी से कोई उम्मीद है।  


आदमी : काफी बुरा हुआ तुम्हारे साथ। और इसीलिए अपनी जान देने आई थी ?


औरत : जान देने ! ये तुम से किसने कहा..? 


आदमी : अरे तो रेलवे की पटरी के ऊपर से चलते हुए यहां स्टेशन तक आई हो, अगर किसी ट्रेन के नीचे आ जाती तो तुम्हारे कितने टुकड़े होते, पता है ?

औरत : ( थोड़ा आत्मविश्वास से ) क्या तुम मेरा मजाक उड़ा रहे हो । 


आदमी : ( गंभीरता से ) मजाक मैं नहीं , पर आप समझ रही है।
 ( एकदम से मजाकिया अंदाज में) अरे मैं अब समझा। इस प्लेटफार्म पर आखिरी ट्रेन रात 11:00 बजे छूट जाती है। इसका मतलब आपको पता था के अब कोई ट्रेन आने वाली नहीं है इसलिए बेखौफ़ होकर चल रही थी। अब समझ गया।


औरत : मतलब आप अब भी मेरा मजाक उड़ा रहे हो।

आदमी : ( थोड़ा हैरानी से) नहीं तो। पर आप ऐसा क्यों कह रही हो। 

औरत : कुछ नहीं। बस ऐसे ही 

 कुछ देर तक दोनों ही गुमसुम से बैठे रहे, तभी प्लेटफार्म की दूसरी तरफ वही कुत्ता उन की तरफ देखकर जोर-जोर से भौंकने लगा। यह देखकर उस आदमी को अजीब लगा।


आदमी : ये कुत्ता काफी देर से परेशान कर रहा हैं।( फिर उसे नजरंदाज करते हुए) वैसे अब कहां जाने का इरादा है।

औरत : समझ में नहीं आ रहा कहां जाऊं, क्या करूं, वापसी के सारे दरवाजे तो बंद हो चुके हैं।

 औरत के हताश निराश चेहरे की तरफ देखते हुए उसने पूछा।


आदमी: वैसे गलत मत समझना, लेकिन क्या आप मेरे साथ रहना चाहोगी। 

औरत : ( चौंककर ) फिर से मजाक कर रहे हो।


आदमी : बिल्कुल नहीं। 

औरत: तो मेरी बेबसी का फायदा उठाना चाहते हो ? 

आदमी : आप अब भी गलत समझ रही हो। 


औरत : ( हताशा से भरे स्वर में) मैं बिल्कुल सही समझ रही हूं। खाली प्लेटफार्म पर एक बेबस महिला की बेबसी का फायदा उठाना चाहते हो।

आदमी: अगर फायदा ही उठना होता तो वैसे भी पूरा प्लेटफार्म खाली पड़ा है। कुछ भी कर सकता हूं। 

औरत : ( शांत लहजे में पूछती है।) वैसे भी तुम्हारा हुलिया देखकर ही लग रहा है। तुम ही वह खूनी हो जो शहर में लोगों के कत्ल करते हुए घूम रहा है। 

आदमी : मेमसाब मैंने कहा ना की मैं एक प्राइवेट डिटेक्टिव। और पिछले कई दिनों से शहर में एक सिरफिरा पागल खूनी घूम रहा है। उसकी तलाश मुझे यहां तक ले आई है। और किस्मत देखो, आप जैसी खूबसूरत महिला से मुलाकात हो गई


औरत : ( थोड़ा शरमा कर ) वैसे तुम्हारा घर कहां है ? और अपने घर वालों से क्या कहोगे ?


आदमी: फिलहाल मेरी कोई फैमिली नहीं है। लेकिन लगता है जल्द ही मेरे भी फैमिली होगी 
  

अब कुत्ता और जोर-जोर से भौंकने लगा जिसकी वजह से उस खाली प्लेटफार्म पर उसकी वह आवाज काफी डरावनी लग रही थी।

औरत : (हल्के से मुस्कुराई ) मुझे भी ऐसा ही लगता है। 

दोनों के चेहरे पर एक सुंदर सी हंसी छाई थी। सामने रिमझिम पडती बारिश की तरफ देखते हुए आदमी ने कहा।

आदमी: देखा किस्मत कब कहां किससे मिला दें कह नहीं सकते। दरअसल, कुछ हफ्ते पहले एक केस मिला था।
एक आदमी, जो अक्सर काम के सिलसिले में शहर से बाहर रहता था। उसे शक था कि उसकी पत्नी किसी और के साथ नाजायज रिश्ते में है।
उसने मुझे हायर किया। मैंने अपना काम किया। सबूत दिए। तस्वीरें, सब कुछ। केस क्लोज।

उसकी की आंखों में थोड़ी कठोरता उतरती 

आदमी: लेकिन कुछ ही दिनों बाद खबर आई... उसके दोनों बच्चों की बेरहमी से हत्या कर दी गई।


औरत : हे भगवान , फिर क्या हुआ ? 

आदमी : और फिर... उसकी पत्नी भी मारी गई।

औरत की आंखें नम होने लगती हैं

औरत: कितना भयानक था वो सब।

आदमी ने धीरे से सिर झुकाते हुए कहा। 

आदमी: मैंने अपनी तरफ से जांच की तो पता चला की... मेरे क्लाइंट ने पत्नी के सामने दो ऑप्शन रखे थे, या तो हमारे साथ रहो। या अपने प्रेमी के साथ। पत्नी परिवार के साथ रहना चाहती थी तो उसने प्रेमी के साथ है रिश्ते तोड़ दिए।

औरत : उस महिला ने ठीक ही किया। सब कुछ ठीक हो गया। 

आदमी : मुझे भी ऐसा ही लगा था कि सब ठीक हो गया। लेकिन कुछ दिन बाद मैंने अखबार में एक खबर पढी जिससे मैं अंदर तक हिल गया। मेरे उस क्लाइंट के दोनों बच्चों कि किसी ने बेरहमी से हत्या कर दी। उसके साथ उसकी पत्नी भी लापता हो गई थी। हत्या इस तरह की गई थी कि सारा शक पति पर चला जाए। 

औरत : कोई इतना बेरहम कैसे हो सकता है। आखिर बच्चों ने क्या किया था। उसे परिवार से अलग ही होना था तो चली जाती है अपने प्रेमी के साथ। 

आदमी: (गंभीरता से) पुलिस ने आदमी को यानी मेरे क्लाइंट को हिरासत में लिया, इसलिए मैंने पहले इकट्ठा किया सब कुछ पुलिस को दिए और पुलिस ने नये सिरे से छानबीन शुरू की।   
 पुलिस अब उस महिला के साथ उसके प्रेमी की भी तलाश में जुट गई। और एक दिन उस महिला की लाश भी एक विरान जगह है मिल गई ।


औरत गंभीरता से कहती है 

औरत: अच्छा हुआ, अपने बच्चों को मार कर प्रेमी के साथ भाग गई थी ना, अच्छा हुआ उसने उसे भी मार दिया

आदमी गहरी सांस लेकर फिर बताता है।


आदमी: मुझे भी ऐसा ही लगा था कि वह प्रेमी के साथ भाग गई थी। असल में वह महिला प्रेमी से रिश्ता तोड़ना चाहती थी। पगलाए प्रेमी ने कसम खाई थी कि जिस परिवार के लिए तू मुझे छोड़ रही है मैं उस परिवार को ही खत्म कर दूंगा। अपने परिवार को बचाने के लिए वह अपने प्रेमी के साथ विवाश होकर गई थी। और उस प्रेमी ने उसे ही मार दिया। 



औरत चौंक गई

औरत: फिर क्या हुआ?

आदमी : इतनी सारी हत्याएं करके वह बचकर भागने की फिराक में है। 

औरत : मतलब वह‌अब भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है। 

आदमी : हां। कल रात वह मेरे घर मुझसे मिलने आया था। उन दोनों बच्चों की हत्या के साथ अपनी प्रेमिका की भी हत्या का जुर्म मेरे सामने कबूला। 


औरत: उसे अपनी गलती का अहसास हो गया शायद।



आदमी: नहीं। मुझे धमकाने आया था कि और दो कत्ल बाकी है। और कल वह उसके पति की भी हत्या कर भाग जाएगा। 

औरत : काफी हिम्मतवाला लगता है।

आदमी : हिम्मवतवाला नहीं , सिरफिरा।

औरत : तो क्या वह भाग गया ?

आदमी रुकता है। और अपनी बाईं तरफ कुछ दूर मुंह में पकडी सिगरेट का सफेद धुंआ उड़ाते स्टेशन की सीढ़ियों से बाहर जा रहे आदमी की तरफ देखता है।

औरत भी उसी शख्स की तरफ देखते हुए हल्की आवाज़ में धीरे से पुछती है।

औरत : तो यही वो खूनी है। 

आदमी : नहीं। ये मेरा क्लायंट है जिसकी पत्नी और बच्चों की हत्या हुई।

औरत: मतलब वो खूनी शहर छोड़कर भाग गया ?

 औरत की बात सुनकर उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान छा गई और नजरें पीछे प्लॅटफार्म पर जाती है। उस आदमी की ओर जो थोड़ी दूरी पर कंबल ओढ़े पड़ा है। उस कंबल पर अब खून के धब्बे साफ़ दिख रहे हैं। औरत ने भी जब वह देखा, तो वह सन्न रह गई। 

आदमी धीमे से उस जमीन कंबल ढकी लाश की तरफ देखकर कहता है। 

आदमी: कल रात मेरी हत्या कर के ११ बजे की आखरी ट्रेन से भागने वाला था। पर ट्रेन छुट गई और भिखारियों के भेस में प्लॅटफार्म पर छुप गया था। 

उसने औरत की तरफ देखकर दोबारा कहा।

 आदमी : वादा करो अब तुम भी दोबारा किसी के शरीर में प्रवेश करके किसी और शहर में नहीं जाओगी। पता नहीं वहां के लोग तुम्हारी मासूम आत्मा के साथ कैसा सुलुक करेंगे। 


उस पर औरत ने उसका हाथ पकड़ कर कहा।

" हां। वादा करती हूं।"

उस पर आदमी ने कहा।

 आदमी : किस्मत भी क्या खेल खेलती है ना।"

औरत: वो कैसे ? 

 आदमी: तुम ने मुंबई रेलवे स्टेशन पर एक मुसाफिर के शरीर में प्रवेश किया और यहां कोल्हापुर आ गई और फिर एक तांत्रिक ने उस मुसाफिर के शरीर से निकालने के लिए तुम्हें लाठी डंडों से मारा, मुंह में राख ठूंसी ओर उसके शरीर से तुम्हें निकाल दिया।‌ फिर भटकते हुए तुम इस रेलवे स्टेशन पर आई जहां मेरी आत्मा उस सिरफिरे प्रेमी का पीछा कर 
रही थी। जो भी हो, अब तुम मुझे मिल गई। और मैं नहीं चाहता की इस स्टेशन पर तुम किसी और मुसाफिर के शरीर में घुस कर किसी दूसरे शहर में चली जाओ और तुम्हारी मासूम आत्मा को दोबारा परेशानी उठानी पड़े। 

औरत : ठीक है। नहीं जाऊंगी।‌ वादा करती हूं।

और बात करते करते दोनों की आत्माएं हवा में तैरते हुए रेलवे स्टेशन के करीब इमली के उसी पेड़ की तरफ जाने लगती है।


समाप्त.