कुछ लोग ज़िंदगी में इसलिए नहीं आते कि तुम्हें खुश करें — वो इसलिए आते हैं ताकि तुम खुद को पहचानो।
मेरा नाम ज़ारा है।
और मैंने ज़िंदगी में एक ही गलती की — एक ऐसे इंसान से मदद माँगी जिससे मैं सबसे ज़्यादा नफ़रत करती थी।
उसका नाम था — अर्जुन सिंह।
पूरी दिल्ली यूनिवर्सिटी जानती थी कि वो कितना ठंडा है। कितना घमंडी है। कितना खामोश है — उस खामोशी से जो जवाब देने से ज़्यादा चुभती है।
और मैं उससे दो साल से नफ़रत कर रही थी।
तो फिर वो रात क्या थी — जब मेरी सबसे पुरानी दोस्त, मेहर, ने मुझे लैब की सीढ़ियों पर रोते हुए देखा — और मैंने, बिना सोचे, अर्जुन का हाथ थाम लिया?
बस इसलिए — ताकि मेहर सोचे कि मैं ठीक हूँ।
ताकि वो ये न जाने कि मेरी Research डूब रही है। मेरे Professor ने मुझे दो हफ़्ते दिए हैं। मेरा PhD का सपना एक धागे पर टँगा है।
और उस पल — अर्जुन वहाँ था। बस वहाँ था।
उसने मेरा हाथ झटका नहीं।
ये मुझे सबसे ज़्यादा हैरान किया।
जब मेहर चली गई, तो उसने मेरी तरफ देखा। उन आँखों से जो हमेशा किसी को नहीं देखती थीं।
"तुम चाहती हो कि मैं भूल जाऊँ?" उसने पूछा।
"मैं चाहती हूँ," मैंने कहा, "कि तुम झूठे प्रेमी बन जाओ।"
एक पल की खामोशी।
फिर उसने कहा — "क्यों?"
और मैंने सच बोल दिया — शायद इसलिए क्योंकि रात थी। शायद इसलिए क्योंकि मैं थकी हुई थी। शायद इसलिए क्योंकि उसकी आँखों में कुछ था जो जज नहीं करता था।
"क्योंकि अगर मेहर को लगा कि मेरी ज़िंदगी ठीक है — तो वो मेरी Research की तरफ नहीं देखेगी। और अगर उसने मेरी Research देखी — तो उसे पता चलेगा कि मैं हार रही हूँ।"
अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।
फिर — "ठीक है।"
ठीक है।
बस दो शब्द।
और मेरी ज़िंदगी पलट गई।
अगले दिन से हम साथ दिखने लगे — यूनिवर्सिटी के कैफ़े में, Library की उस खिड़की के पास जहाँ धूप आती है, Seminar के बाहर।
लोगों ने देखा।
लोगों ने बात की।
मेहर ने फ़ोन किया और चिल्लाई — "ज़ारा! अर्जुन सिंह?! वो अर्जुन?!"
और मैंने झूठ बोला। पहली बार।
पर जो बात मैं नहीं समझ पाई — वो ये थी कि झूठ बोलना इतना आसान क्यों था?
हमने Rules बनाए।
हफ़्ते में तीन बार साथ दिखना। कोई Personal सवाल नहीं। कोई झगड़ा नहीं — कम से कम Public में।
पर अर्जुन ने एक शर्त और रखी।
"मेरी Research में मेरी मदद करो।"
मैंने कहा — "तुम्हें मेरी मदद की ज़रूरत नहीं।"
उसने कहा — "मुझे किसी की ज़रूरत नहीं, यही मेरी Problem है।"
उस रात मैं बहुत देर तक सोती रही।
दिन बीतने लगे।
और धीरे-धीरे मुझे पता चला —
अर्जुन सुबह Coffee नहीं पीता — वो सिर्फ उसे हाथ में लेकर खिड़की के पास खड़ा होता है और बाहर देखता है।
अर्जुन के Earphones में हमेशा कुछ नहीं चलता — वो सिर्फ दुनिया से दूर रहने का बहाना है।
अर्जुन ने आज तक किसी को अपने घर नहीं बुलाया — इसलिए नहीं कि वो घमंडी है, बल्कि इसलिए कि उसे डर है कि कोई आएगा और फिर चला जाएगा।
एक शाम हम Library में थे।
मैं अपनी Research के Data को देख रही थी और आँखें भर आई थीं — चुपचाप, बिना आवाज़ के।
अर्जुन ने देखा।
उसने कुछ नहीं कहा।
बस अपनी किताब बंद की। मेरे सामने रखी। और बोला — "बताओ। शुरू से।"
"तुम्हें क्या मतलब?"
"तुम्हारी Research। शुरू से बताओ। जहाँ से तुमने सोचना शुरू किया था।"
और मैंने बताया।
दो घंटे।
उसने सुना।
पूरा — हर शब्द।
और जब मैं रुकी, तो उसने कहा — "तुम्हारी सोच गलत नहीं है, ज़ारा। तुम्हारा तरीका गलत है।"
पहली बार किसी ने मेरी सोच को गलत नहीं कहा।
पहली बार किसी ने मुझे उम्मीद दी — बिना मुझसे कुछ माँगे।
मैं समझ नहीं पाई कि वो पल कब बदल गया —
जब मैंने उसे देखना शुरू किया।
सच में देखना।
वो अर्जुन नहीं रहा जिससे मैं नफ़रत करती थी।
वो बन गया — वो इंसान जो रात के दो बजे मेरे Data की गलतियाँ ढूंढता था।
वो इंसान जो मुझसे कभी नहीं पूछता था कि "तुम ठीक हो?" — क्योंकि वो देख लेता था।
वो इंसान जो एक दिन, बिना कुछ कहे, मेरे लिए वो किताब ले आया जो मैंने तीन हफ़्ते पहले ज़िक्र की थी।
मेहर को पता चल गया।
एक दिन उसने मुझे कैफ़े के बाहर रोका और कहा — "ज़ारा, क्या ये सच है?"
मेरे पाँव ज़मीन में गड़ गए।
"क्या?"
"तुम दोनों का। ये... ये Real है?"
मैं झूठ बोलने के लिए मुँह खोलने वाली थी —
पर मैंने अर्जुन की तरफ देखा।
वो थोड़ी दूर खड़ा था।
और उसकी आँखें मुझ पर थीं।
वो जवाब का इंतज़ार नहीं कर रहा था।
वो बस — देख रहा था।
मुझे।
और मैंने कहा — "नहीं, मेहर। ये झूठ था।"
उस रात अर्जुन ने मुझे Message किया।
सिर्फ एक — "ठीक किया।"
मैंने जवाब नहीं दिया।
मैं रोती रही।
इसलिए नहीं कि मैंने सच बोला।
बल्कि इसलिए कि — जब मैंने कहा "ये झूठ था" — तो वो झूठ लग रहा था।
तीन दिन बाद, मेरी Research का Presentation था।
मैं तैयार थी — इस बार, सच में।
अर्जुन की मदद से।
उन रातों की मदद से जब हम दोनों लड़ते-झगड़ते, बहस करते, हँसते हुए एक-दूसरे की बात समझते थे।
Professor ने कहा — "ज़ारा, इस बार तुम्हारा काम... अलग है। बेहतर है।"
मैंने मुस्कुराया।
और मेरी आँखें Library की उस खिड़की पर टिक गईं — जहाँ अर्जुन बैठता था।
वो खाली थी।
मैं शाम को उसके घर गई।
पहली बार।
उसने दरवाज़ा खोला और एक पल के लिए बस देखता रहा।
"तुम यहाँ क्यों हो?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "मैंने तुमसे नफ़रत करना भूल गई।"
वो कुछ नहीं बोला।
पर उसके होंठ थोड़े काँपे।
"और?"
"और मुझे नहीं पता ये क्या है। पर मैं डरी हुई हूँ। और मुझे पता है — तुम भी डरे हुए हो।"
एक लंबी खामोशी।
फिर उसने दरवाज़ा थोड़ा और खोला।
"अंदर आओगी?"
हम उस रात घंटों बात करते रहे।
Coffee के बिना।
किसी Rules के बिना।
किसी झूठ के बिना।
और मुझे पहली बार समझ आया —
कि कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में नफ़रत की तरह आते हैं।
पर रुकते हैं — प्यार की तरह।
मेहर ने अगले दिन फ़ोन किया — "ज़ारा, कल रात तुम कहाँ थीं?"
मैंने सच कहा — "अर्जुन के घर।"
एक पल की खामोशी।
फिर मेहर हँस पड़ी।
"तो ये अब झूठ नहीं है?"
"नहीं," मैंने कहा। "अब नहीं।"
कुछ महीने बाद —
मेरी Research Published हुई।
अर्जुन का नाम Acknowledgments में था।
पर उससे भी ज़्यादा — वो उस कमरे में था जब मुझे पता चला।
उसने कुछ नहीं कहा।
बस मेरी तरफ देखा।
और उसकी आँखों में वो था — जो शब्दों में कभी नहीं आता।
"तुमने मुझसे एक बार कहा था," मैंने उस शाम कहा, "कि तुम्हें किसी की ज़रूरत नहीं — यही तुम्हारी Problem है।"
उसने मुझे देखा।
"हाँ।"
"तो अब?"
एक लंबी साँस।
"अब मुझे एक की ज़रूरत है।"
"किसकी?"
वो मुस्कुराया — पहली बार। सच में।
"जो मुझसे नफ़रत करना भूल गई।"
ये कहानी उनके लिए है — जो किसी से नफ़रत करते-करते उससे प्यार करना सीख गए।
और जो डरते-डरते भी — दरवाज़ा खोलने गए।
— समाप्त —