प्रेम न हाट बिकाय - भाग 41 DrPranava Bharti द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 41

41--

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      हर साल शीनोदा का आना और आना के घर सभी पुराने दोस्तों का जुड़ना, खूबसूरत पल हुआ करते | आना की  तो पूरी सोसाइटी जानती ही थी शीनोदा और रंजु को |शीनोदा ने भी सभी से संबंध बनाकर रखे थे|कोशिश करता कि सबसे मिलकर, साथ खा-पीकर इन्जॉय  करके वापिस जापान लौटे| बासु दी, रेखा बहन, कुंजबाला दीदी और जो भी आ पाते सबके सब एक साथ इकट्ठे हो जाते | इन सालों में कई बार संभव होने पर अहमदाबाद से बाहर गए हुए मित्र भी आ जाते|यह सब काम करता वही विदेशी शीनोदा जो सबको बुला ही लेता और यदि संभव होता तो सब आ भी जाते | वैसे ही शोर-शराबा, आनंद की लहर इस घर में लहराती जैसे उनके पढ़ाई के दिनों में पसरी रहती थी | सालों बीतते रहे और ये सभी रिश्ते बिना किसी अपेक्षा के खूबसूरत माला में मोती से सजे ही रहे|लोग आश्चर्य भी करते कि आखिर ये कैसे रिश्ते हैं जो बरसों से एक माला की तरह पिरे हुए हैं, जिनका न देश एक है, न जाति, न धर्म !बस, इंसान हैं ये दो हाथ, दो पैरों वाले|लोगों को इससे परेशानी होती रहती लेकिन इन रिश्तों में कोई बदलाव नहीं आया|ये ही जीवन के रिश्ते होते हैं जो स्वाभाविक रूप से बनते हैं|ये ईश्वर की ब्रह्मांड से बनकर आते हैं, दुआ बनकर हमारे जीवन के साथ जुड़ते चले जाते हैं और सदा-सर्वदा हमारे साथ जुड़े रहते हैं |   

    बहुत दिनों से व्यस्तताओं के चलते बातों के सिलसिले कुछ कम हो गए थे | सबके बच्चे अधिकतर बाहर थे। कभी कोई गायब हो जाता, कभी कोई | हाँ, शीनोदा उसी प्रकार अपने प्रोजेक्ट्स लेकर आता रहता | विवेक, मि.बासु सब अपने काम से सेवा-निवृत्त हो चुके थे, जब भी मौका मिलता वे मित्रों से ज़रूर मिलते और जब सुविधा होती अपनी तीसरी पीढ़ी के पास पहुँच जाते | अचानक मि.बासु का फ़ोन आना के पास आया | उनकी पत्नी यानि बासुदी काफ़ी बीमार हो गईं थीं | उनकी बेटी उनके पास थी, फ़ोन से पता चला वे किसीको  अधिक पहचान नहीं रही थीं |वे अपने बेटे के पास सिंगापुर में थीं, पता ही नहीं चल पाया कब आईं, कब इतनी बीमार हो गईं ?शरीर व मन के बीमार होने का प्रभाव पूरे वातावरण पर, एक-दूसरे से जुड़े हुए लोगों पर पड़ता ही है | आना ने विवेक से पूछा था कि क्या वे बासुदी को मिलने चलेंगे ? लेकिन विवेक ने साफ़ मना कर दिया | वे दरसल घबराते थे और इस प्रकार रोगी को देखने का साहस नहीं कर पाते थे | आना ने रेखा बहन से बात की और उनसे समय निश्चित करके आना और रेखा बहन बासुदी को मिलने चले गए थे | 

     बासु साहब और उनकी बेटी जिसे घर में ‘मून’ कहते थे, उन्हें देखकर खुश हो गए|मून के पति यानि  बासु दीदी के दामाद डॉक्टर थे और माँ ‘बासु दीदी’ का बहुत ध्यान रखते थे| उन्होंने पहले तो उनके बैड-रूम में ही उनके लिए अस्पताल सा ही बना दिया था लेकिन जब वे वहाँ अकेली पड़ने लगीं, उनका इंतजाम घर के ड्राइंग-रूम में ही कर दिया गया | उनके लिए कितना सारा स्टाफ़ कलकत्ता से बुलवाया गया था | कोई कमी न थी, खूबसूरत बासु दीदी आँखें खोलकर देख रही थीं लेकिन बोल नहीं पा रहीं थीं |कितनी कोशिश की गई कि वे कम से कम से अपने दोस्तों को पहचान लें लेकिन नहीं पहचान पाईं, न ही कुछ बोल पाईं, बात कर पाईं | उनके होठ चुप थे लेकिन आँखों की कोरों में आँसू अटके स्पष्ट दिखाई दे रहे थे|         

   कुछ वर्षों के बीतते बीतते अनिल का भाई बॉबी भी अपनी शिक्षा पूरी करके बाहर ही सैटल  हो गया | विवेक, आना के बच्चे बड़े हो चुके थे। उनकी भी पढ़ाई हो चुकी थी | दृष्टि इंटीरियर डिजाइनर हो गई थी और उसने अपने साथी इंटीरियर डिजाइनर से विवाह कर लिया था|दोनों ने नौकरी करने की जगह ऑफिस खोलकर अपना काम शुरू कर दिया था| दृष्टांत का विवाह भी हो गया था और वह भारत से बाहर सैटल हो गया था|सबके ही बच्चे अपने-अपने कामों में व्यस्त हो चुके थे लेकिन शीनोदा पहले की  तरह ही आता–जाता रहा, उसका काम भी इसी प्रकार का था| रंजु बेशक जापान में ही अपनी बच्चियों के साथ रही, लेकिन शीनोदा का एक घर जापान में तो दूसरा भारत में, वह भी विवेक, आना के परिवार में बना रहा| ठीक-ठाक ही चल रही थी ज़िंदगी की गाड़ी ! शायद इसीको सुख कहते हैं जब बच्चों का सही प्रकार से सैटल होने को देखना ही माता-पिता की संतुष्टि होती है | 

   विवेक को भी छोटी-मोटी तकलीफ़ें शुरू तो हो चुकी थीं वैसे वह यूँ तो ठीक ही थे लेकिन जीवन में जैसे घटनाएँ घटित  होनी होती हैं, हो ही जाती हैं |बहुत बरसों बाद अनुज परिवार के साथ बहन को मिलने आया था और दृष्टांत भी उन्हीं दिनों यहाँ पर था | सबसे बड़ी बात थी कि शीनोदा रंजु के साथ यहीं था |उसके श्वसुर बॉबी के पास रहने चले गए थे कि विवेक अचानक ही बीमार हो गए और ऐसे बीमार भी कुछ खास नहीं लेकिन अस्पताल गए तो वापिस ही नहीं लौटे|विवेक के जाने के समय सभी उसके इर्द-गिर्द थे|उन सबमें शीनोदा भी सपत्नीक था | आना अकेली पड़ गई लेकिन उन नाजुक क्षणों में आना के पास ये सभी ‘अंकन्डीशनल’ रिश्ते उसका हाथ पकड़े हुए थे|इन रिश्तों के न कोई नाम थे और न ही कोई अपेक्षा-उपेक्षा ! 

 दुनिया में दर्द देने वाले न जाने कितने होते हैं लेकिन ऐसे समय में पीड़ा समेटने वाले, साथ खड़े होने वाले भी आना के पास इतने हैं, उसने भरे दिल व भरी श्वासों से ईश्वर के प्रति  कृतज्ञता ज्ञापित की| कहाँ थी वह अकेली ?जो भी घटित होता है, उसको कोई रोक ही नहीं सकता, वह तो अवश्य होना है लेकिन सबके सहारे वह कष्टपूर्ण समय सरलता से निकल जाए, यही महत्वपूर्ण है |

उसने अपने क्षण के एकाकीपन से निकलते हुए अपने जीवन के साथ युद्ध करने के स्थान पर उसके साथ चलने की आवश्यकता पर सोचा और  रंजु के लिखे हुए पेज़ निकालकर जो जान चुकी थी, उसके आगे जानने की कोशिश करने का प्रयत्न करने लगी जिसमें रंजु ने विवाह के बारे में बताने की चेष्टा की थी –