प्रेम न हाट बिकाय - भाग 37 DrPranava Bharti द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 37

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    वैसे तो शीनोदा अपनी परंपराओं के साथ अपनी माँ के स्वभाव से परिचित था ही लेकिन न जाने उसके मन में यह क्यों था कि शादी के उसकी बाद माँ ज़रूर उसके पास आ जाएंगी | वह एक कोमल स्वभाव की प्यारी सी स्त्री थीं लेकिन संभवत:वे भी अपनी परंपराओं में जकड़ी थीं | जिस शहर में उनका छोटा बेटा और पुत्र वधू रहते थे, उसी में वे अपने पति के साथ रहती थीं और उनके बाद भी अपने उसी मकान में रहना उन्हें अच्छा लगता था | वैसे उन्होंने अपनी भारतीय बहू का स्वागत, सम्मान कुछ अधिक ही लाड़-दुलार से किया था| 

शीनोदा को शिक्षा में रुचि थी, अन्य स्थानों को देखने, नए लोगों से मिलने, उनसे परिचय करने में रुचि थी लेकिन छोटा भाई पिता के साथ व्यवसाय में काफ़ी कम उम्र में रुचि लेने लगा था | उसकी पत्नी और वह अपने पिता की वसीयत यानि फलों होलसेल का खूब फैला हुआ बड़ा सा व्यवसाय संभालते थे | उसने शीनोदा से भी पिता की संपत्ति और व्यवसाय में से हिस्सा बाँटने की बात की थी लेकिन उसे तो कोई रुचि ही नहीं थी इसलिए उसने बहुत बड़प्पन व शालीनता से अपने छोटे भाई को पिता की विरासत का सब कुछ दे दिया था|  

    साल भर में जब रंजु गर्भ से रह गई, शीनोदा ने माँ से यह खुशी साझा की| सुनकर वे खुशी से फूली न समाईं | उनके दूसरे बेटे के विवाह को कई वर्ष हो गए थे किन्तु बहू साची की गोद नहीं भरी थी|यह माँ बनने और अपनी भावी पीढ़ी को देखने की भावना शायद विश्व भर में होती है | इसी भावना के वशीभूत होकर उन्होंने अपने रिश्तेदारों व दोस्तों में एक बड़ी सी पार्टी देने का ऐलान कर दिया|रंजु ने पति को बताया था कि भारत में बहू की डिलीवरी सास के घर में होती है और सास ही बहू का ध्यान रखती हैं|उसको इस समय एक माँ की ज़रूरत थी न कि किसी पार्टी की लेकिन अलग देश के साथ, अलग सोच, अलग परम्पराएँ–---कहाँ आसान होता है इतनी जल्दी बदलाव ! 

    शीनोदा जानता था कि उसकी माँ का उसके घर आकर रहना बहुत मुश्किल था बल्कि  असंभव था |मुश्किल होता है अपने संस्कारों व आदतों में इतनी जल्दी बदलाव करना, यदि होते भी हैं तो उसके लिए कष्टकर होता है जिनमें बदलाव की अपेक्षा की जाती है |   इसलिए उसने रंजु से भारत उसकी माँ के पास चलने की बात की | इस बात से रंजु खुश हो गई, स्वाभाविक था माँ के पास उसको अधिक सुविधा रहने वाली थी|माँ की दी हुई पार्टी के बाद ये दोनों भारत आए |इस बार बंबई से आए थे इसलिए पहले अहमदाबाद  

आकर फिर रंजु के घर कोटा गए |किसी से कोई बात नहीं की थी उन्होंने यहाँ पर इसलिए अचानक बेटी दामाद को देखकर रंजु के माता-पिता प्रसन्न हो उठे |

शीनोदा पत्नी रंजु को उसके मायके कोटा छोड़कर वापिस जापान चला गया|पहले दोनों पति-पत्नी आना के पास अहमदाबाद आए, उसके साथ सारी बातें साझा कीं और फिर कोटा गए थे| यह रंजु के गर्भ का पाँचवाँ मास था|डिलीवरी के समय शीनोदा पत्नी के पास रहना चाहता था इसलिए अपने कार्य की व्यवस्था व अन्य व्यवस्थाओं के लिए उसका कुछ समय के लिए जापान जाना जरूरी था | 

     शीनोदा ने अहमदाबाद की ‘एस.पी.आई यूनिवर्सिटी’ से भारत व जापान की अर्थ-व्यवस्था का तुलनात्मक अध्ययन किया था इसलिए उसको यह काम बड़ी आसानी से मिल गया और वह जापान में एक ‘रिसर्च एसोसिएट’ के रूप में सैटेल हो गया जिसके लिए उसे भारत और जापान के विभिन्न विषयों में तुलनात्मक अध्ययन करना था और उसे जापान की यूनिवर्सिटी में सबमिट करना था| जापान जाकर वह इस सबमें व्यस्त रहा और अंत में इस बात से आश्वस्त हो गया कि उसकी इच्छानुसार उसे प्रोजेक्ट-वर्क मिल गया था |उसने गांधी विद्यापीठ से एक वर्ष का गाँधीयन कोर्स करने के बाद तुलनात्मक शोध पर जो काम किया था, वह उसके लिए फलदाई रहा | अपनी व्यवस्था करके वह भारत आ गया | अभी डिलीवरी में समय था, वह विवेक से बात करके अहमदाबाद आया और उसने यहाँ पर एक अच्छी  सोसाइटी में आना के घर के पास ही विवेक की सहायता से एक घर भी खरीद लिया और कोटा पत्नी के पास लौट गया|तीन दिनों बाद विवेक के पास अपनी खुशी साझा करने  के लिए उसका फ़ोन आया| वह एक प्यारी सी बिटिया का पिता बन गया था|उसने विवेक   को बताया कि रंजु को संभालने में डॉक्टर्स से ज़रूर कोई भूल हुई थी |उसकी बिटिया व  पत्नी कमज़ोर हैं | 

      अपने ‘इन-लॉज़’ के कहने पर उसने शहर का सबसे बड़ा, महंगा और प्रसिद्ध अस्पताल पसंद किया था लेकिन एक जापानी को देखकर उससे अनाप-शनाप पैसे लेकर भी उसने उसकी पत्नी व बच्ची की ऐसी देख-रेख नहीं की जिसकी उन्हें आवश्यकता थी|आफ्टरऑल वह उसकी पत्नी और बेटी की ज़िंदगी का सवाल था|अगर वह जापान में  होता तो --- वह काफ़ी गुस्से में आ गया था और उसे लग रहा था कि उसे डॉक्टर को ‘स्यू’ कर देना चाहिए | 

    बेचारे रंजु के माता-पिता घबरा गए थे | हम भारतीय तो इस व्यवस्था के आदी हैं और आराम से उन चीजों को ‘चलता है’ कहकर अपनी पूरी ज़िंदगी गुज़ार लेते हैं| इसीलिए हमारी व्यवस्था में वह बदलाव नहीं आ पाता जो वास्तव में आना चाहिए |नियम बहुत से बनते हैं और टूटते हैं, वैसे नियम बनते तो टूटने के लिए ही हैं न !

    शीनोदा इन सब बातों से बहुत परेशान हो उठता |जब कोई किसी गलत बात, घटना या व्यवहार हो जाने पर कोई कहता;”इट्स ओके ---”वह हमेशा खीजकर पूछता;

“व्हाई इट्स ओके ---?”यह ‘व्हाई’ उससे चिपक गया था जैसे |कोई उसे कुछ समझा न पाता कि भई, हम तो इसी व्यवस्था में जीने के आदी हैं, सो चला लो|जो भी करके तुम तो चले जाओगे, भुगतेंगे हम ! और ज़िंदगी भर भुगतेंगे|

     हमेशा यही होता था जब भी किसी को कोई दिक्कत होती विवेक याद आते | रंजु के माता-पिता भी को भी विवेक याद आए और उन्होंने विवेक और आना से कहा कि भाई! अपने इस जापानी दोस्त को समझाओ, ये हमारी बेटी को ब्याह ज़रूर करके ले गया है पर हमें मरवाएगा |जहाँ रहते हुए ज़िंदगी बीत गई, वहीं यह लड़ाई करवा देगा और हमें बदनाम करवा देगा|हम सच से कितने भयभीत रहते हैं !! 

    इतनी बड़ी बात भी नहीं थी लेकिन न जाने वहाँ क्या हुआ होगा कि कोटा से कई दिन  लगातार फोन्स आते रहे |जब भी बात होती शीनोदा पूरी कथा सुनाने बैठ जाता | 

“यार ! इसे समझाना टेढ़ी खीर है –क्या किया जाए ?”

    शीनोदा जबसे भारत आया था और अब तक, सारी यात्रा के अगर कोई साक्षी थे तो वे विवेक और अनामिका ही थे |ऐसी न जाने कितनी-कितनी बातें उसने इन दोनों से पूछी थीं जिनका उत्तर देने में इनको ही बगलें झाँकनी पड़ी थीं | भाषा को समझ, बोल लेना एक बात है और किसी स्थान की संस्कृति और परंपराओं को समझना और उन पर चलना दूसरी और कठिन बात है |मनुष्य जिन जड़ों में जन्म लेता है, कहीं भी चला जाए, कितना भी दूसरी संस्कृति में ढलने का प्रयास करे लेकिन अंत में महसूस करता है कि वह उन जड़ों से जकड़ा हुआ ही रहा है उम्र भर | वह समय ज़िंदगी का कुछ टुकड़ों में बंटा रहता है जिनमें वह सोचता या महसूस करता है कि वह अपनी उन जड़ों से मुक्त हो गया है लेकिन ऐसा होता कहाँ है ?

   तय किया गया कि शीनोदा बेटी और पत्नी को लेकर कुछ दिनों के लिए आना के पास चला आए और दूसरे डॉक्टर्स से सलाह लेनी हो या जिन चीजों की ज़रूरत हो, वे कर ली जाएँ|

   रंजु की माँ तो वैसे ही आना—आना सुनकर परेशान हो चुकी थीं | आखिर कैसे इस परिवार से पीछा छुड़ाया जाए?